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Nobel Prize in Medicine 2026: जर्मनी के पीटर हेगेमैन, जॉर्ज नागेल और अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ को मिला मेडिसिन का नोबेल

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Nobel Prize in Medicine 2026: चिकित्सा (मेडिसिन) के क्षेत्र में एक ऐसा क्रांतिकारी आविष्कार हुआ है, जो मानव मस्तिष्क के कई अनसुलझे रहस्यों से पर्दा उठा सकता है।

वर्ष 2026 का मेडिसिन नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों जर्मनी के पीटर हेगेमैन व जॉर्ज नागेल और अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ को दिया गया है।

इन वैज्ञानिकों ने मिलकर ‘ऑप्टोजेनेटिक्स’ (Optogenetics) नाम की एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे केवल रोशनी की मदद से दिमाग की कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) को नियंत्रित और संचालित किया जा सकता है।

आसान शब्दों में समझें: क्या है यह तकनीक?

हमारा दिमाग अरबों न्यूरॉन्स से मिलकर बना है। कौन-सा न्यूरॉन हमारी भावनाओं, यादों या आदतों के लिए जिम्मेदार है, यह जानना अब तक वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत कठिन पहेली था।

ऑप्टोजेनेटिक्स तकनीक के जरिए वैज्ञानिक अब किसी खास दिमागी कोशिका पर रोशनी डालकर उसे ‘ऑन’ या ‘ऑफ’ कर सकते हैं।

यानी जैसे हम किसी कमरे की लाइट का स्विच दबाकर उसे चालू या बंद करते हैं, ठीक वैसे ही रोशनी डालकर विशिष्ट न्यूरॉन्स के काम करने के तरीके को लाइव देखा और समझा जा सकता है।

एक मामूली शैवाल (Algae) से कैसे हुई शुरुआत?

इस ऐतिहासिक खोज का सफर एक बेहद सूक्ष्म जीव से शुरू हुआ।

पीटर हेगेमैन यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि ‘क्लैमाइडोमोनास’ नाम का एककोशिकीय शैवाल रोशनी की दिशा में कैसे तैरता है।

2000 के शुरुआती दशक में हेगेमैन और जॉर्ज नागेल ने इस शैवाल की सतह पर ‘चैनलरोडॉप्सिन’ (Channelrhodopsin) नाम का एक विशेष प्रोटीन खोज निकाला।

 * इस प्रोटीन की खासियत यह है कि जब इस पर नीली रोशनी पड़ती है, तो इसमें एक छोटा सा रास्ता (चैनल) खुल जाता है।

 * इसके बाद आवेशित कण (इलेक्ट्रिकल चार्ज) कोशिका के भीतर जाते हैं और एक विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं।

 * यानी यह प्रोटीन रोशनी मिलते ही कोशिका को प्रतिक्रिया देने के लिए सक्रिय कर देता है।

बाद में, कार्ल डाइसेरोथ और उनकी टीम ने इस लाइट-सेंसिटिव प्रोटीन को आनुवंशिक रूप से दिमाग की कोशिकाओं में ट्रांसप्लांट करने में सफलता हासिल की।

इसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे—जिस कोशिका में यह प्रोटीन डाला गया, वह रोशनी के प्रति संवेदनशील हो गई और उसे नीली लाइट से कंट्रोल करना आसान हो गया।

मानसिक बीमारियों और अंधेपन के इलाज में नए सवेरे की उम्मीद

नोबेल कमेटी का मानना है कि इस खोज ने न्यूरोसाइंस (तंत्रिका विज्ञान) की दिशा ही बदल दी है।

* मानसिक रोग: डिप्रेशन, एंग्जायटी, और पार्किसंस जैसी बीमारियों के इलाज में अब बहुत सटीक रिसर्च संभव हो सकेगी, क्योंकि अब वैज्ञानिक जान सकते हैं कि कौन से न्यूरॉन्स का संतुलन बिगड़ने से ये बीमारियां होती हैं।

 * दृष्टि वापसी (Vision Restoration): इस तकनीक का उपयोग अब आंखों की बीमारियों पर भी किया जा रहा है।

शोधकर्ता यह जानने में जुटे हैं कि क्या ऑप्टोजेनेटिक्स की मदद से उन लोगों की आंखों की रोशनी वापस लाई जा सकती है, जिनकी देखने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

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