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मध्यप्रदेश में नहीं लागू होगा 27% OBC आरक्षण: हाईकोर्ट ने 2019 के कानून को बताया असंवैधानिक, रुकी भर्तियों पर दिए बड़े निर्देश

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP High Court OBC Reservation: मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर सालों से चल रही कानूनी जंग में राज्य हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और बेहद अहम फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की दो जजों की बेंच ने साल 2019 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा लाए गए उस संशोधन कानून को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत OBC आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% किया गया था।

अदालत के इस फैसले के बाद अब स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश की सरकारी नौकरियों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए OBC वर्ग को 14% आरक्षण का ही लाभ मिलेगा।

इसके साथ ही, अदालत ने प्रदेश में लंबे समय से अटकी और उलझी हुई सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए सख्त और स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

13 प्रतिशत रोके गए पदों पर तीन महीने के भीतर होंगी नियुक्तियां

इस विवाद की वजह से MPPSC (मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग) और कर्मचारी चयन मंडल (ESB) की कई प्रमुख भर्तियों के नतीजे 87-13 फीसदी के फॉर्मूले पर घोषित किए गए थे, जिसमें 13 प्रतिशत पदों के परिणाम या नियुक्तियां होल्ड पर रख दी गई थीं।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि 87% घोषित पदों के अलावा, जिन 13% पदों के परिणाम रोके गए थे, उन पर अब अनारक्षित (General/Unreserved) वर्ग की चयन सूची से नियुक्तियां की जाएंगी।

कोर्ट ने MPPSC, मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल और अन्य सभी संबंधित विभागों को इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अधिकतम तीन महीने का समय दिया है।

इस फैसले से उन हजारों युवाओं को बड़ी राहत मिलेगी जो पिछले कई सालों से अपने अंतिम चयन परिणाम का इंतजार कर रहे थे।

50 फीसदी आरक्षण की तय सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता

अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो बेहद ऐतिहासिक मामलों—’इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ’ और ‘जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल’—का प्रमुखता से जिक्र किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि देश में आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती।

यदि किसी राज्य को 50 फीसदी की इस तय सीमा को तोड़ना है, तो उसके लिए अदालत के सामने बेहद असाधारण और विशेष परिस्थितियां साबित करनी होती हैं।

राज्य सरकार 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के समर्थन में ऐसी कोई असाधारण स्थिति या ठोस कानूनी आधार अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिसके आधार पर इस सीमा को बढ़ाया जा सके।

इसी वजह से अदालत ने 2019 के बाद से 14% से अधिक OBC आरक्षण के आधार पर दी गई नियुक्तियों को अमान्य माना है।

अदालत के इस निर्णय के बाद साल 2019 में कमलनाथ सरकार के समय शुरू हुआ यह विवाद एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।

EWS और क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण से जुड़ी अन्य याचिकाएं खारिज

अधिवक्ता धीरज तिवारी के अनुसार, यह फैसला ‘अशिता दुबे व अन्य बनाम मध्यप्रदेश राज्य व अन्य’ (W.P. No. 5901/2019) सहित इससे जुड़ी दर्जनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद आया है।

हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2026 को इस पूरे मामले में मैराथन सुनवाई पूरी करके फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 9 अक्टूबर 2026 को सार्वजनिक रूप से सुनाया गया।

अदालत ने 27% OBC आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कानून को रद्द किया, लेकिन इसके साथ दायर की गई आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और क्षैतिज (Horizontal) आरक्षण से जुड़ी अन्य राहत वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

राज्य की भावी भर्तियों और परीक्षाओं पर सीधा असर

हाईकोर्ट के इस फैसले का मध्यप्रदेश की पूरी प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था पर व्यापक असर पड़ेगा।

आने वाले दिनों में निकलने वाली नई भर्तियों, प्रवेश परीक्षाओं और लंबित चयन सूचियों में अब केवल 14 प्रतिशत OBC आरक्षण के आधार पर ही रोस्टर तैयार किया जाएगा।

विभागों को अब कोर्ट के विस्तृत आदेश का अध्ययन करके अटकी हुई भर्ती प्रक्रियाओं को तय सीमा के भीतर पूरा करना होगा।

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