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रंगभेद के खिलाफ लड़ाई से UN मानवाधिकार प्रमुख तक: जानिए 2026 की नोबेल शांति विजेता भारतवंशी नावी पिल्लै के बारे में

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Navi Pillay Nobel Peace Prize 2026: अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकारों की जीत वर्ष 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार भारतीय मूल की प्रमुख दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता नवनीतम “नावी” पिल्लै (Navanethem “Navi” Pillay) को देने का निर्णय लिया गया है।

नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में स्थित ‘नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी’ ने शुक्रवार को इसकी आधिकारिक घोषणा की।

नावी पिल्लै को यह विश्व प्रसिद्ध सम्मान शांति स्थापित करने, अंतरराष्ट्रीय कानून की नींव को मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर इंसानी अधिकारों की रक्षा के लिए दिया गया है।

रंगभेद के दौर से शुरू हुई ऐतिहासिक कानूनी जंग

दक्षिण अफ्रीका के डरबन में जन्मीं नावी पिल्लै की जड़ें भारत के तमिलनाडु राज्य से जुड़ी हैं। उनके दादाजी भारत से दक्षिण अफ्रीका जाकर बसे थे।

1967 में उन्होंने नेटाल प्रांत में पहली अश्वेत महिला वकील के तौर पर अपनी लीगल प्रैक्टिस शुरू की। उस दौर में दक्षिण अफ्रीका में गहरा नस्लीय भेदभाव (Apartheid) फैला हुआ था।

अश्वेत वकीलों को अदालतों में जजों के कक्षों में जाने तक की इजाजत नहीं होती थी।

इन तमाम पाबंदियों और चुनौतियों के बावजूद पिल्लै ने हार नहीं मानी।

उन्होंने नस्लवाद के खिलाफ आवाज उठाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों, राजनीतिक बंदियों और मजदूर नेताओं के मुकदमों की पैरवी की।

नेल्सन मंडेला के लिए कानूनी अधिकार की लड़ाई

नावी पिल्लै के शुरुआती करियर का एक बड़ा पड़ाव 1973 में आया, जब उन्होंने कुख्यात रॉबेन आइलैंड जेल में बंद राजनीतिक बंदियों के लिए एक अहम कानूनी याचिका दायर की।

इसी जेल में दक्षिण अफ्रीका के महान नेता नेल्सन मंडेला भी कैद थे।

पिल्लै की इस कानूनी पहल के कारण जेल प्रशासन को राजनीतिक कैदियों को वकीलों से मिलने और कानूनी सहायता प्राप्त करने का अधिकार देना पड़ा।

हालांकि, बंदी के रूप में पिल्लै और मंडेला की सीधी मुलाकात कभी नहीं हो सकी।

लेकिन जब 1994 में रंगभेद का अंत हुआ और नेल्सन मंडेला देश के पहले लोकतांत्रिक राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने 1995 में नावी पिल्लै की प्रतिभा और निडरता को पहचानते हुए उन्हें दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया।

वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली गैर-श्वेत महिला बनीं।

वैश्विक मंचों पर ऐतिहासिक भूमिकाएं और बड़ा फैसला

दक्षिण अफ्रीका के बाद नावी पिल्लै ने अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में मील के पत्थर कायम किए:

* रवांडा अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR): 1995 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा उन्हें इस न्यायाधिकरण का जज चुना गया, जहां बाद में वह इसकी अध्यक्ष भी बनीं।

* बलात्कार को नरसंहार माना: रवांडा जनसंहार के दौरान सुनाया गया उनका एक फैसला इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। उनके एक ऐतिहासिक निर्णय के तहत अंतरराष्ट्रीय कानून में पहली बार ‘युद्ध या जनसंहार के दौरान बलात्कार और यौन हिंसा’ को सामान्य अपराध न मानकर ‘नरसंहार (Genocide) का एक हथियार’ स्वीकार किया गया।

* अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) और UN: वह द हेग स्थित ICC की जज रहीं और बाद में संयुक्त राष्ट्र (UN) की मानवाधिकार उच्चायुक्त (High Commissioner for Human Rights) के रूप में वैश्विक स्तर पर शोषितों की आवाज बनीं।

शांति का नोबेल स्वीडन के बजाय नॉर्वे में क्यों मिलता है?

नोबेल पुरस्कारों से जुड़ी एक दिलचस्प और ऐतिहासिक बात यह है कि भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, साहित्य और अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में दिए जाते हैं, लेकिन शांति का नोबेल पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाता है।

इसके पीछे लगभग 130 साल पुराना इतिहास है।

1895 में जब अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी प्रसिद्ध वसीयत लिखी, तो उन्होंने साफ तौर पर निर्देश दिया था कि शांति पुरस्कार का चयन नॉर्वे की संसद (Storting) द्वारा चुनी गई पांच सदस्यीय समिति करेगी।

जब 1901 में नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हुई, तब स्वीडन और नॉर्वे एक राजनीतिक संघ (Union) के तहत आते थे और दोनों देशों का राजा एक ही था। हालांकि, दोनों देशों के पास अपनी स्वतंत्र संसद थी।

अल्फ्रेड नोबेल ने शांति पुरस्कार के लिए नॉर्वे को ही क्यों चुना, इसका कोई लिखित कारण उन्होंने नहीं छोड़ा था, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उस दौर में नॉर्वे की संसद शांतिपूर्ण समाधानों और अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में अधिक तत्पर मानी जाती थी।

1905 में स्वीडन और नॉर्वे अलग देश बन गए, लेकिन अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत का सम्मान करते हुए आज भी शांति का नोबेल ओस्लो से ही घोषित और वितरित किया जाता है।

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