Sarvapitri Amavasya 2026: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का समय पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने का माना जाता है।
पूरे 16 दिनों तक धरती पर रहने के बाद, सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितृ अपने लोक लौट जाते हैं।
इस दिन को पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
मान्यता है कि यदि आप पूरे पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के लिए कुछ न कर पाए हों या किसी कारणवश श्राद्ध की तिथि भूल गए हों, तो अमावस्या के दिन तर्पण और पिंडदान करने से सभी पितरों की आत्मा शांत हो जाती है।

पितरों की विदाई और सर्वपितृ अमावस्या की महत्ता
जब पितृ धरती से विदा लेते हैं, तो वे अपने परिवार को आशीर्वाद देकर जाते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या के दिन यदि पूर्वज तृप्त होकर लौटते हैं, तो घर में सुख-शांति, समृद्धि और संतान की उन्नति का वरदान मिलता है।
धरती से लौटते वक्त पितरों की प्रसन्नता के संकेत घर में अचानक मिलने वाले शुभ फलों जैसे— मानसिक शांति, रुके हुए कामों का बनना और क्लेश के खत्म होने से मिलते हैं।
इसीलिए इस दिन उनकी विदाई पूरे आदर-सम्मान के साथ की जाती है।

श्राद्ध का सही समय और तर्पण विधि
पितृपक्ष में तिथियों का बहुत महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध हमेशा दोपहर के समय यानी ‘अपराह्न काल’ में किया जाना चाहिए।
सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें।
जल में काले तिल, थोड़ा सा दूध और अक्षत मिलाकर पितरों को जल अर्पित करें (तर्पण दें)।
तर्पण करते समय मुख्य रूप से तीन पीढ़ियों का ध्यान किया जाता है:
* पिता पक्ष: पिता, पितामह (दादा) और प्रपितामह (परदादा)।
* माता पक्ष: माता, पितामही (दादी) और प्रपितामही (परदादी)।
इन सभी का नाम और गोत्र बोलकर जल अर्पित करने से पूरा परिवार पितृदोष से मुक्त हो जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या पर क्या दान करें
अमावस्या पर दिया गया दान सीधे पूर्वजों तक पहुंचता है।
इस दिन अन्न और काले तिल का दान बेहद शुभ माना गया है।
मौसम और आवश्यकता के अनुसार छाता, पंखा, जूते-चप्पल और कपड़ों का दान भी करना चाहिए।
इससे पितृ प्रसन्न होते हैं और घर में अन्नपूर्णा का वास होता है।
यदि आप दान करने में असमर्थ हैं, तो क्या करें?
शास्त्रों में हर परिस्थिति का समाधान है। यदि आप भारी-भरकम दान करने में सक्षम नहीं हैं, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है।
आप सिर्फ गाय को हरा चारा खिला सकते हैं। इसके अलावा कुत्तों, कौवों और चींटियों को भोजन देना बेहद शुभ माना जाता है। इसे ‘पंचबलि कर्म’ कहते हैं।

पंचबलि कर्म करने मात्र से ही श्राद्ध का फल मिल जाता है और पितृ तृप्त हो जाते हैं।
पौराणिक कथा: दानवीर कर्ण से क्यों जुड़ी है परंपरा?
पितृपक्ष में अन्न और जल दान की परंपरा के पीछे महाभारत काल की एक बड़ी कथा है।
जब दानवीर कर्ण की मृत्यु के बाद वे स्वर्ग पहुंचे, तो उन्हें भोजन में खाने के बजाय सोना और गहने दिए गए।
कर्ण ने आश्चर्यचकित होकर देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा।
इंद्रदेव ने बताया, “आपने जीवनभर सोना-चांदी दान किया, लेकिन अपने पूर्वजों के नाम पर कभी अन्न और जल का दान नहीं किया।”
तब कर्ण ने कहा कि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी नहीं थी। इसके बाद इंद्र ने कर्ण को 16 दिनों के लिए वापस धरती पर भेजा।

कर्ण ने इन 16 दिनों में पूर्वजों के नाम पर अन्न-जल दान किया और तर्पण किया। इसके बाद वे वापस स्वर्ग गए।
तभी से 16 दिनों के पितृपक्ष की परंपरा शुरू हुई।
10 अक्टूबर को आदर से करें पितरों को विदा
10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के अवसर पर अपने पूर्वजों को आदरपूर्वक विदा करें।
सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें, दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके तिल और दूध मिले जल से तर्पण करें।
जरूरतमंदों और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। ऐसा करने से परिवार पर पितरों की कृपा हमेशा बनी रहेगी और जीवन के संकट दूर होंगे।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है।
इसे पूर्ण सत्य या सटीक होने का दावा नहीं किया जाता है।
किसी भी विस्तृत जानकारी या विशेष विधि-विधान के लिए संबंधित विशेषज्ञ या ज्योतिषाचार्य की सलाह अवश्य लें।
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