Vijayadashami katha: हर साल अश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में विजयादशमी यानी दशहरा का पर्व बेहद हर्षोल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
जब भी विजयादशमी की बात आती है, तो ज्यादातर लोग इसे केवल भगवान श्री राम द्वारा लंकापति रावण के वध और रावण दहन से जोड़कर देखते हैं।
लेकिन सनातन परंपरा और पौराणिक मान्यताओं में इस पर्व का एक और बेहद गहरा और महत्वपूर्ण पहलू है।
यह दिन ब्रह्मांड की रक्षा करने वाली जगज्जननी मां भगवती दुर्गा के महाअवतार और महिषासुर मर्दिनी बनने की पावन कथा से जुड़ा है।
श्रीमद्देवी भागवत पुराण और श्री दुर्गा सप्तशती में इस कथा का बहुत ही सुंदर और भव्य वर्णन मिलता है।
यह त्योहार हमें सिखाता है कि जब-जब धरती पर अधर्म, अत्याचार और अहंकार बढ़ता है, तब-तब ईश्वर किसी न किसी रूप में प्रकट होकर धर्म और सत्य की स्थापना करते हैं।
जब महिषासुर के अत्याचार से कांप उठे तीनों लोक
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में महिषासुर नाम का एक अत्यंत पराक्रमी और छल-कपटी असुर हुआ करता था।
उसने सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कठिन और कठोर तपस्या की।
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उससे वरदान मांगने को कहा।
महिषासुर ने अमर होने की इच्छा जताई, लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है।
तब महिषासुर ने चालाकी दिखाते हुए वरदान मांगा कि इस संसार का कोई भी पुरुष, देवता, दैत्य या दानव उसका वध न कर सके।
उसके मन में यह अहंकार बैठ गया था कि एक स्त्री इतनी बलशाली कभी नहीं हो सकती जो उसका मुकाबला कर सके। इसलिए उसने स्त्री से वध न होने की बात पर ध्यान ही नहीं दिया।
वरदान मिलते ही महिषासुर के अंदर अहंकार का अंधकार छा गया। वह अनियंत्रित और अत्याचारी हो गया।
उसने अपनी विशाल असुर सेना के साथ स्वर्ग लोक पर हमला कर दिया और इंद्रदेव को पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया।
महिषासुर ने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया। सभी देवता अपनी जान बचाकर जंगलों और कंदराओं में भटकने के लिए मजबूर हो गए।
महिषासुर के भय से मुनि, ऋषि और आम जनमानस कांपने लगे थे। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था और धर्म का लोप होने लगा था।
त्रिदेवों के तेज का महाचमत्कार: मां दुर्गा का प्राकट्य
जब देवताओं के पास अपनी रक्षा का कोई मार्ग नहीं बचा, तो देवराज इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता भगवान ब्रह्मा जी को साथ लेकर भगवान विष्णु और भगवान शिव की शरण में गए।
देवताओं ने अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों और महिषासुर के खौफ की पूरी व्यथा त्रिदेवों को सुनाई।
देवताओं की दयनीय स्थिति और महिषासुर के दुस्साहस को सुनकर भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्मा जी अत्यंत क्रोधित हो गए।
उस तीव्र क्रोध के कारण त्रिदेवों के मुख और शरीर से एक अभूतपूर्व, दिव्य और महातेजस्वी प्रकाश (ऊर्जा) निकला। देखते ही देखते सभी देवताओं के शरीर से निकला तेज भी उसमें जाकर मिल गया।
इस विशाल तेजोपुंज (प्रकाशपुंज) के मिलन से एक दिव्य देवी का प्राकट्य हुआ।
उनका रूप इतना अलौकिक, ओजस्वी और कांतिमान था कि पूरा ब्रह्मांड उनके तेज से आलोकित हो उठा।
* भगवान शिव के तेज से देवी का मुखमंडल बना।
* भगवान विष्णु के तेज से उनकी भुजाएं (हाथ) बनीं।
* भगवान ब्रह्मा के तेज से उनके चरण प्रकट हुए।
* यमराज के तेज से उनके केश (बाल) और चंद्रमा के तेज से उनके वक्षस्थल का निर्माण हुआ।
इस तरह समस्त देव शक्तियों के एकत्रीकरण से मां दुर्गा का रूप तैयार हुआ।
देवताओं ने सौंपे अपने सर्वश्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र
मां दुर्गा के प्राकट्य को देखकर निराश पड़े देवताओं में नए जीवन का संचार हुआ। असुरों के विनाश और मां को युद्ध के लिए पूरी तरह सज्जित करने के लिए सभी देवताओं ने अपने श्रेष्ठतम अस्त्र-शस्त्र और आभूषण उन्हें भेंट किए:
* भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर मां को दिया।
* भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से एक चक्र प्रदान किया।
* वरुण देव ने शंख और अग्नि देव ने शक्ति दी।
* पवन देव ने धनुष और बाणों से भरा तरकश सौंपा।
* देवराज इंद्र ने अपना वज्र और ऐरावत हाथी की घंटी दी।
* पर्वतराज हिमालय ने देवी की सवारी के लिए एक शक्तिशाली और पराक्रमी सिंह (शेर) भेंट किया।
अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर जब मां दुर्गा ने अपनी भीषण सिंहगर्जना (हुंकार) की, तो पूरी धरती और आकाश गूंज उठे। असुरों के दिलों में भय बैठ गया।
एक पल में अंत संभव था, फिर क्यों 9 दिनों तक चला युद्ध?
यह सवाल अक्सर मन में आता है कि जो मां भगवती पूरे ब्रह्मांड की जननी हैं और जिनके एक मात्र संकल्प से सृष्टि का निर्माण और प्रलय हो सकता है, उन्होंने महिषासुर को एक पल में मार गिराने के बजाय 9 दिनों तक युद्ध क्यों किया?
इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और व्यावहारिक संदेश छिपा हुआ है:
* महिषासुर का छल और छद्म रूप: महिषासुर केवल बलशाली ही नहीं था, बल्कि वह छल-कपट में माहिर था। वह हर पल अपना रूप बदल लेता था—कभी भैंसा, कभी हाथी, कभी सिंह तो कभी दैत्य। मां दुर्गा ने महिषासुर के हर एक रूप और छल का जवाब अपने अलग-अलग रूपों से दिया।
* मानव मन की बुराइयों का नाश: दुर्गा सप्तशती और शास्त्रों के अनुसार, महिषासुर वध केवल एक दैत्य का वध नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर मौजूद 9 मुख्य बुराइयों (जैसे—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर/ईर्ष्या, अहंकार, आलस्य और अज्ञान) के विनाश का प्रतीक है।
* मां के 9 दिव्य रूपों का संदेश: युद्ध के नौ दिनों में मां दुर्गा के 9 स्वरूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री) की अलौकिक शक्तियां प्रकट हुईं।
यह इस बात का प्रमाण है कि जीवन में किसी भी बड़े संकट या बुराई से लड़ने के लिए हमें धैर्य, ज्ञान, साहस, विवेक और शक्ति जैसे हर गुण की आवश्यकता होती है।
दसवें दिन ‘महिषासुर मर्दिनी’ का अवतरण और विजयादशमी
नौ दिनों तक चले इस भयानक और घनघोर युद्ध में मां दुर्गा ने महिषासुर की विशाल सेना, उसके सेनापतियों और उसके द्वारा रचे गए हर चक्रव्यूह को ध्वस्त कर दिया।
जब महिषासुर अपने अंतिम रूप (विशाल महिष यानी भैंसे) में आया, तब दसवें दिन (अश्विन शुक्ल दशमी) मां दुर्गा ने अपने पैर से महिषासुर को दबाकर अपने त्रिशूल से उसकी छाती पर प्रहार किया और उसका वध कर दिया।
महिषासुर के अंत के साथ ही तीनों लोकों को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिली। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और मां की स्तुति करते हुए उन्हें ‘महिषासुर मर्दिनी’ के नाम से पुकारा।
जिस दशमी तिथि को मां दुर्गा ने महिषासुर पर पूर्ण विजय प्राप्त की, वही दिन ‘विजयादशमी’ कहलाया।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि बुराई चाहे कितनी भी छल-कपट से भरी और शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में जीत सत्य, धर्म और पवित्रता की ही होती है।
आज के दौर में कथा का संदेश
आज के आधुनिक समय में महिषासुर हमारे बाहर कम और हमारे मन के भीतर ज्यादा मौजूद है। हमारे अंदर का अहंकार, नकारात्मक सोच, दूसरों के प्रति ईर्ष्या और गलत आचरण ही आज का महिषासुर है।
विजयादशमी का यह पावन पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार देवताओं ने अपनी शक्तियों को एकजुट करके मां दुर्गा को प्रकट किया था, उसी तरह हमें भी अपने भीतर की अच्छी शक्तियों, सकारात्मक विचारों और ज्ञान को एकजुट करके अपने अंदर छिपी बुराइयों का अंत करना चाहिए। तभी सही मायनों में विजयादशमी मनाना सार्थक होगा।
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