120 Crore Jewels on Janmashtami: ग्वालियर के ऐतिहासिक गोपाल मंदिर में इस बार जन्माष्टमी का पर्व बेहद खास और राजसी अंदाज में मनाया जाएगा।
4 सितंबर को जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान राधा-कृष्ण का श्रृंगार किसी आम गहनों से नहीं, बल्कि सिंधिया राजवंश के दौर के लगभग 120 करोड़ रुपये से अधिक कीमत वाले बेशकीमती आभूषणों से किया जाएगा।
इन आभूषणों में शुद्ध सोना, चांदी, हीरे, पन्ने, माणिक और असली मोती जड़े हुए हैं।

बरसों पुरानी है परंपरा, लॉकर से निकल जाते हैं गहने
यह परंपरा बरसों पुरानी है। ये एंटीक और बहुमूल्य गहने सालभर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के सेफ वॉल्ट (लॉकर) में कड़ी सुरक्षा के बीच रखे रहते हैं।
केवल जन्माष्टमी के दिन ही इन्हें कड़ी सुरक्षा घेरे में बाहर निकाला जाता है।
जन्माष्टमी की सुबह लगभग 10 बजे नगर निगम आयुक्त द्वारा गठित विशेष समिति बैंक पहुंचेगी।
समिति की मौजूदगी में लॉकर खोलकर गहनों की गिनती की जाएगी और फिर उन्हें सशस्त्र पुलिस बल के साथ गोपाल मंदिर लाया जाएगा।

मंदिर पहुंचते ही कारीगरों द्वारा इन गहनों की विशेष सफाई की जाएगी, जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का अलौकिक श्रृंगार होगा।
गहनों में 62 असली मोती और 55 पन्नों वाला हार शामिल
भगवान के इस शाही रूप की चमक देखते ही बनती है।
श्री कृष्ण के मुकुट में पुखराज, माणिक और पन्ने जैसे नायाब रत्न जड़े हैं, जबकि राधा रानी का लगभग तीन तोले का रत्नजड़ित मुकुट आकर्षण का मुख्य केंद्र रहता है।
इन सभी आभूषणों में सबसे खास है सात लड़ियों वाला हार, जिसमें 62 असली मोती और 55 पन्ने लगे हैं।

अकेले इस हार की कीमत लगभग 35 करोड़ रुपये आंकी गई है।
वहीं, रत्नजड़ित मुख्य मुकुट की कीमत 25 करोड़ रुपये और सोने के मुकुट की कीमत करीब 1.25 करोड़ रुपये बताई जाती है।
डेढ़ लाख श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद
इस अलौकिक दर्शन को पाने के लिए केवल ग्वालियर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
इस बार लगभग 1.5 लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई जा रही है।

भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन और पुलिस ने पुख्ता इंतजाम किए हैं।
मंदिर को भव्य फूल बंगले, मनमोहक रंगोली और आकर्षक लाइटों से सजाया जाएगा।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में बड़ी-बड़ी एलईडी स्क्रीन लगाई जाएंगी ताकि लोग दूर से ही सुलभ दर्शन कर सकें।
सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे और भारी पुलिस बल तैनात रहेगा।

गोपाल मंदिर का गौरवशाली इतिहास
इस मंदिर का निर्माण सिंधिया राजवंश की महारानी बैजाबाई ने सन 1843 में करवाया था।
मराठा और यूरोपीय वास्तुकला के सुंदर संगम से बने इस मंदिर के गर्भगृह के दरवाजे शुद्ध चांदी से मढ़े गए हैं।

जन्माष्टमी पर यहां की चमक और अध्यात्म का माहौल देखते ही बनता है।
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