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बरकतउल्ला Vs वाग्देवी भोजपाल: कांग्रेस बोली- क्रांतिकारियों का अपमान, इतिहासकार का दावा- भोपाल में कभी रहे ही नहीं राजा भोज

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Barkatullah University Name Change: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक बार फिर नाम बदलने की राजनीति को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है।

इस बार विवाद के केंद्र में है भोपाल की मशहूर बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी (BU)।

यूनिवर्सिटी की कार्य परिषद (Executive Council) ने इसका नाम बदलकर “वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने का प्रस्ताव पास किया है।

इस एक फैसले ने प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। सत्ताधारी दल भाजपा और विपक्ष (कांग्रेस) इस मुद्दे पर आमने-सामने आ गए हैं।

आइए जानते हैं कि इस पूरे मामले पर कांग्रेस, सरकार, भाजपा और इतिहासकारों का क्या कहना है और यह विवाद इतना क्यों बढ़ गया है।

कांग्रेस का हमला: ‘यह स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है

इस पूरे मामले पर कांग्रेस ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। भोपाल से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इस फैसले की कड़े शब्दों में निंदा की है।

उनका कहना है कि मौलाना बरकतउल्ला आजाद भारत के एक महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। उनका नाम हटाना देश के लिए जान देने वाले नायकों का अपमान है।

आरिफ मसूद ने सरकार को घेरते हुए कहा: “सरकार को इस समय NEET परीक्षा में गड़बड़ी से परेशान बच्चों और छात्रों के भविष्य पर चर्चा करनी चाहिए थी, लेकिन शिक्षा मंत्री यूनिवर्सिटी का नाम बदलने में व्यस्त हैं।

अगर सरकार को ‘वाग्देवी’ या राजा भोज के नाम पर कुछ करना ही है, तो वे एक नई यूनिवर्सिटी बनाएं, हम सब उसका स्वागत करेंगे। लेकिन पिछले 38 साल से चल रही एक स्थापित संस्था का नाम बदलना पूरी तरह से गलत है।”

उन्होंने याद दिलाया कि जब पहले ‘भोज मुक्त विश्वविद्यालय’ बनाया गया था, तब किसी ने विरोध नहीं किया था क्योंकि वह एक नई संस्था थी।

मसूद ने इस मामले को लेकर राज्यपाल से मिलने का समय भी मांगा है।

क्या राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) का नाम भी बदलेगा?

विवाद सिर्फ बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भोपाल की ही टेक्निकल यूनिवर्सिटी RGPV (राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय) का नाम भी बदला जा सकता है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए आरिफ मसूद ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश के लिए अपनी शहादत दी थी, उनका शरीर टुकड़ों में मिला था।

अगर भाजपा सरकार उनका नाम भी हटाती है, तो देश की जनता यह साफ देख लेगी कि यह सरकार शहीदों और क्रांतिकारियों के योगदान की कद्र नहीं करती।

भाजपा का रुख: ‘जनता की भावनाएं सबसे ऊपर’

दूसरी तरफ, नाम बदलने के इस फैसले का भाजपा ने खुलकर बचाव किया है।

भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि उनकी सरकार हमेशा जनता की भावनाओं का सम्मान करती है।

नाम केवल शब्द नहीं होते, बल्कि वे हमारे गौरवशाली इतिहास और संस्कृति की पहचान होते हैं।

अगर समाज और जनता चाहती है कि यूनिवर्सिटी का नाम राजा भोज और वाग्देवी (ज्ञान की देवी) के नाम पर हो, तो सरकार निश्चित रूप से इस दिशा में कदम उठाएगी।

उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने क्या कहा?

जब यह विवाद बहुत ज्यादा बढ़ गया, तो मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने सरकार की स्थिति साफ की।

उन्होंने बताया कि नाम बदलने का फैसला अभी सरकार का नहीं है।

मंत्री परमार ने कहा: “बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी एक स्वायत्त (Autonomous) संस्था है। नाम बदलने का यह प्रस्ताव यूनिवर्सिटी की अपनी कार्य परिषद की बैठक में लिया गया है। यह प्रस्ताव अभी तक राज्य सरकार के पास नहीं पहुंचा है। जब यह प्रस्ताव हमारे पास आएगा, तो शासन इसका पूरा कानूनी और ऐतिहासिक अध्ययन करेगा। उसके बाद ही सरकार इस पर कोई अंतिम निर्णय लेगी।”

इतिहासकार का बड़ा दावा: ‘राजा भोज कभी भोपाल में रहे ही नहीं

इस पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब इतिहासकारों ने इसमें एंट्री ली।

मशहूर इतिहासकार शाहनवाज खान ने एक ऐसा दावा किया है जिसने बहस को एक नया रुख दे दिया है।

शाहनवाज खान का कहना है कि राजा भोज का भोपाल से सीधा जुड़ाव उस तरह का नहीं था जैसा बताया जाता है। उन्होंने दावा किया:

धार के राजा थे भोज: राजा भोज मूल रूप से धार (मध्य प्रदेश) के राजा थे, वहीं उनकी राजधानी थी। भोपाल में न तो वह कभी रहे और न ही यहाँ उनका कोई महल था।

बड़ा तालाब क्यों बना?: भोपाल के लिए राजा भोज का सबसे बड़ा योगदान यहाँ का ‘बड़ा तालाब’ (Upper Lake) है। इतिहासकार के मुताबिक, राजा भोज को एक त्वचा की बीमारी हुई थी।

उस समय के वैद्यों ने उन्हें सलाह दी थी कि वे सात नदियों के पानी को मिलाकर बने तालाब में स्नान करें। इसी इलाज के लिए इस विशाल तालाब का निर्माण कराया गया था, जिसके लिए भोपाल के लोग हमेशा उनके आभारी रहेंगे।

भोजपुर मंदिर भी बाहर: यहाँ तक कि प्रसिद्ध भोजपुर शिव मंदिर भी भोपाल की भौगोलिक सीमा से बाहर (रायसेन जिले में) आता है।

मौलाना बरकतउल्ला का भोपाल से नाता

इसके विपरीत, इतिहासकार ने मौलाना बरकतउल्ला के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि उनका जन्म भोपाल की सरजमीं पर ही हुआ था।

उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई भी भोपाल के जहांगीरिया स्कूल से की थी।

इसके बाद वे देश को आजाद कराने का सपना लेकर विदेश गए और वहां ‘गदर आंदोलन’ जैसी क्रांतिकारी गतिविधियों के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वे भारत की अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री भी बने थे।

इतिहासकारो का मानना है कि राजा भोज और मौलाना बरकतउल्ला, दोनों का ही अपने-अपने क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान है, इसलिए दोनों की तुलना करना ठीक नहीं है।

लेकिन भोपाल के मूल निवासी होने के नाते मौलाना बरकतउल्ला का दावा मजबूत है।

अब देखना यह होगा कि जब यह प्रस्ताव यूनिवर्सिटी से निकलकर सरकार की मेज पर पहुंचता है, तो डॉ. मोहन यादव की सरकार इस पर क्या फैसला लेती है।

फिलहाल, इस मुद्दे ने मध्य प्रदेश की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है।

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