CEC Keralam Vigilance Probe: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों एक बड़े विवाद के केंद्र में आ गए हैं।
उनके खिलाफ 20 साल पुराने एक मामले में जांच के आदेश दिए गए हैं।
यह मामला तब का है जब वह केरलम में लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव हुआ करते थे।
उन पर आरोप है कि उन्होंने एक प्रोजेक्ट का पेमेंट क्लियर करने के बदले 2 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी।
केरलम के मौजूदा गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने अब इस मामले में विजिलेंस जांच (सतर्कता विभाग की जांच) के आदेश दे दिए हैं।

आइए इस पूरे विवाद, इसके पीछे की कहानी और मौजूदा राजनीतिक हालात को आम और आसान भाषा में समझते हैं।
क्या है 2 करोड़ की रिश्वत का यह पूरा मामला?
यह कहानी करीब दो दशक पुरानी है, जब ज्ञानेश कुमार केरलम में अपनी सेवाएं दे रहे थे।
साल 2005 से 2007 के बीच वह केरलम लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव थे और साथ ही केरलम स्टेट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (KSTP) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे।
कोल्लम जिले के रहने वाले एक ठेकेदार, जिनका नाम साजन है, उन्होंने हाल ही में एक बेहद गंभीर आरोप लगाया है।
साजन का कहना है कि उस समय KSTP का काम पूरा होने के बाद ठेकेदारों का करोड़ों का पेमेंट अटका हुआ था।
आरोप के मुताबिक, ज्ञानेश कुमार ने काम पूरा होने के बाद बकाया रकम का भुगतान करने के एवज में 2 करोड़ रुपये की रिश्वत की मांग की थी।

एक इंजीनियर की आत्महत्या और अनसुलझे सवाल
इस मामले में सिर्फ पैसों का लेन-देन ही नहीं, बल्कि एक बेहद दर्दनाक पहलू भी जुड़ा हुआ है।
ठेकेदार साजन के अनुसार, उस वक्त प्रोजेक्ट से जुड़े इंजीनियरों ने करीब 17 करोड़ रुपये के बिल पास कर दिए थे, लेकिन ज्ञानेश कुमार ने कथित तौर पर भुगतान के चेक रोक लिए थे।
इस प्रोजेक्ट पर मलेशिया की एक कंपनी ‘PATI-BEL’ काम कर रही थी।
करोड़ों रुपये अटक जाने की वजह से कंपनी, उसके ठेकेदारों और वहां काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों के सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट खड़ा हो गया।
साजन बताते हैं कि इस कंपनी के प्रोजेक्ट इंजीनियर ली सी बीन ने उन्हें खुद बताया था कि ज्ञानेश कुमार बिना रिश्वत के चेक जारी करने को तैयार नहीं हैं।
मजबूरी में ली सी बीन ने अपने कर्मचारियों और ठेकेदारों का बकाया चुकाने के लिए बेंगलुरु में चल रहे कंपनी के एक दूसरे प्रोजेक्ट से पैसे निकालकर बांटे।
लेकिन आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि ली सी बीन ने 2006 में आत्महत्या कर ली।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि ली ने अपने सुसाइड नोट में ज्ञानेश कुमार का नाम लिखा था।
ली के परिवार ने भी उस वक्त कंपनी के लोगों को इस बारे में बताया था।
2006 में भी हुई थी जांच, तो अब दोबारा क्यों?
ली सी बीन की मौत के बाद 2006 में विजिलेंस विभाग ने इस मामले की जांच शुरू की थी।
लेकिन तब आरोप साबित नहीं हो सके और जांच की फाइल बंद कर दी गई।
साजन का दावा है कि उस पुरानी जांच में न तो उनसे पूछताछ की गई और न ही इस मामले की असल जानकारी रखने वाले गवाहों के बयान दर्ज हुए।
साजन का कहना है कि वह अब ली के परिवार, कंपनी के पुराने कर्मचारियों और अन्य चश्मदीदों को जांच के लिए पेश कर सकते हैं।
हाल ही में शिकायत मिलने के बाद विजिलेंस विभाग ने शुरुआती पड़ताल की और केस दर्ज करने के लिए गृह विभाग से इजाजत मांगी।

कानूनी सलाह लेने के बाद, केरल के गृह मंत्री ने अब इस मामले की विधिवत जांच के आदेश दे दिए हैं।
विजिलेंस की टीम पहले से ही KSTP प्रोजेक्ट से जुड़ी कुछ अन्य अनियमितताओं की जांच कर रही है, और अब इस नई शिकायत को भी उसी जांच का हिस्सा बनाया जाएगा।
10 साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस और सियासी टाइमिंग
इस जांच की टाइमिंग को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
दरअसल, केरलम में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) गठबंधन ने 140 में से 97 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया है।
राज्य में पूरे 10 साल बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई है।
सरकार बदलते ही इस 20 साल पुरानी फाइल का खुलना कई राजनीतिक संदेश दे रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस और ज्ञानेश कुमार के बीच टकराव चल रहा है।
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और ‘इंडिया’ गठबंधन लगातार वोटर लिस्ट से जुड़े SIR (सिस्टमैटिक इलेक्टोरल रोल) मामले में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए ज्ञानेश कुमार को घेर रहे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग जानबूझकर कई मतदाताओं के नाम लिस्ट से काट रहा है।
इसके विरोध में 1 नवंबर को विपक्ष ने एक बड़ी रैली भी की थी और सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है।

चुनाव आयोग के भीतर भी मतभेद की खबरें
इस मामले को हवा देने वाली एक और बड़ी खबर हाल ही में सामने आई थी।
23 सितंबर की एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच करीब 14 बार आयोग के फैसलों पर अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
ये आपत्तियां मुख्य रूप से वोटर लिस्ट, फॉर्म-6, नए मतदाताओं को जोड़ने और वोटर डेटाबेस से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर थीं।
इन आपत्तियों की कॉपी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थी।

यह पूरा विवाद जून 2025 में बिहार में शुरू हुए SIR (वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण) अभियान के दौरान गहराया था।
पुराने मामलों को फिर से खोलने के कानूनी पेंच
भले ही सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हों, लेकिन 20 साल पुराने मामले को दोबारा खोलना कानूनी रूप से इतना आसान नहीं है। इसमें कई बड़े पेंच हैं:
* धारा 17A का नियम: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की इस धारा के तहत, किसी भी मौजूदा या रिटायर हो चुके बड़े अधिकारी के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सरकार की लिखित मंजूरी लेना अनिवार्य है।
अगर यह मंजूरी सही प्रक्रिया के तहत नहीं ली गई, तो एफआईआर कोर्ट में टिक नहीं पाती।
* सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन: अदालतों का साफ नियम है कि बहुत पुराने (10-15 साल से ज्यादा) मामलों को बिना किसी बेहद मजबूत नए सबूत के दोबारा नहीं खोला जा सकता।
इतने लंबे समय बाद अचानक फाइल खोलने को अदालतें अक्सर ‘गलत नीयत’ या राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित मानकर केस खारिज कर देती हैं।

कौन हैं ज्ञानेश कुमार? (एक नजर में)
ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरलम कैडर के IAS अधिकारी हैं। उनके करियर का सफर काफी लंबा रहा है:
* 1990 से 2000 के दशक तक उन्होंने केरलम के अलग-अलग जिलों में फील्ड और प्रशासनिक पोस्टिंग संभाली।
* 2005 से 2007 तक वह PWD सचिव और KSTP के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे (यहीं का यह विवाद है)।
* 2007 से 2012 तक वह केंद्र में रक्षा मंत्रालय में प्रतिनियुक्ति पर रहे।
* 2016 से 2021 तक उन्होंने गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव का अहम पद संभाला।
* 2021-2022 में वह संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव बने।
* 2022-2024 में सहकारिता मंत्रालय के सचिव रहे।
* मार्च 2024 में उन्हें भारत निर्वाचन आयोग में चुनाव आयुक्त बनाया गया।
* फरवरी 2025 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का सबसे बड़ा पद संभाला।

फिलहाल ज्ञानेश कुमार पर लगे ये आरोप सिर्फ आरोप हैं, जो अभी अदालत या किसी जांच में साबित नहीं हुए हैं।
विजिलेंस अब इस पूरे मामले की नए सिरे से पड़ताल करेगी, जिसमें यह भी देखा जाएगा कि 2006 की जांच में क्या कमियां रह गई थीं।
ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयोग की तरफ से इस पुरानी जांच के आदेश पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या बयान सामने नहीं आया है।
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