Betul Jain Sadhvi Prakharshri: आज के समय में जब युवा एक अच्छी नौकरी, शानदार करियर और विदेश में पढ़ाई का सपना देखते हैं, तब मध्य प्रदेश के बैतूल की रहने वाली 26 साल की प्रखरश्री जैन ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने सबको हैरान कर दिया है।
प्रखरश्री कोई साधारण छात्रा नहीं हैं। उन्होंने कानून की पढ़ाई (LLM) में गोल्ड मेडल हासिल किया है। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने लंदन जैसी जगह का रुख किया।
उनकी मेहनत तब और रंग लाई जब साल 2023 में उनका चयन सिविल जज के पद पर हो गया।
परिवार में खुशी का माहौल था, बधाइयों का तांता लगा था, लेकिन प्रखरश्री की मंजिल यह जज की कुर्सी नहीं थी।
उन्होंने इस पद को जॉइन करने से इनकार कर दिया और अब वे सांसारिक जीवन को हमेशा के लिए त्याग कर जैन साध्वी (ब्रह्मचारिणी) बनने जा रही हैं।

उन्होंने जैनेश्वरी दीक्षा का संकल्प लेकर मोक्ष का मार्ग चुन लिया है।
भोपाल से लंदन तक का शानदार सफर
प्रखरश्री की शुरुआती पढ़ाई उनके गृह नगर बैतूल से ही हुई।
इसके बाद उनके माता-पिता ने उन्हें आगे की स्कूली शिक्षा के लिए भोपाल के प्रतिष्ठित संस्कार वैली स्कूल भेज दिया।
वे बचपन से ही पढ़ाई में बेहद होशियार थीं। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने तय किया कि उन्हें कानून के क्षेत्र में अपना करियर बनाना है।
इसके लिए उन्होंने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षाओं में से एक ‘क्लैट’ (CLAT – Common Law Admission Test) पास की।

इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद से अपनी एलएलबी (LLB) की डिग्री पूरी की।
पढ़ाई में उनका कोई सानी नहीं था, इसलिए जब उन्होंने एलएलएम (LLM) किया, तो वहां भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
अपने ज्ञान को और निखारने के लिए उन्होंने प्रतिष्ठित ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ से भी एक कोर्स किया।
अंततः 2023 में जब वे सिविल जज चुनी गईं, तो यह उनके करियर का सबसे बड़ा मुकाम था।

बचपन से ही था वैराग्य का भाव
इतनी शानदार उपलब्धियां हासिल करने के बाद अचानक संन्यास का फैसला लेना किसी को भी अचरज में डाल सकता है, लेकिन प्रखरश्री के लिए यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था।
उनका कहना है कि संयम और साधना का यह बीज उनके मन में बचपन में ही बोया जा चुका था।
उन्होंने बहुत पहले ही यह तय कर लिया था कि वे कभी शादी नहीं करेंगी और इस सांसारिक जीवन से दूर रहकर अपना जीवन साधना में बिताएंगी।
प्रखरश्री बताती हैं कि उनके घर का माहौल हमेशा से ही बहुत धार्मिक रहा है।

माता-पिता से मिले अच्छे संस्कार, बचपन से जिनवाणी (जैन धर्म के पवित्र ग्रंथ) का गहराई से अध्ययन और सच्चे गुरुओं के सानिध्य ने उनके मन में वैराग्य की भावना को लगातार मजबूत किया।
उन्होंने बताया कि दिगंबर जैन समाज के महान संत आचार्य विद्यासागर जी महाराज से उन्हें आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत मिला था।
जैसे-जैसे वे इस व्रत का पालन करती गईं, उनके जीवन और विचारों में शुद्धता आती गई और सांसारिक मोह पूरी तरह से खत्म हो गया।

‘यह रास्ता कठिन नहीं, बल्कि सबसे सरल है’
जब प्रखरश्री से यह पूछा गया कि इतने लाड़-प्यार में पलने, विदेश में पढ़ाई करने और आधुनिक जीवनशैली देखने के बाद, उन्होंने इतना कठिन मार्ग क्यों चुना?
तो उनका जवाब बहुत ही सीधा और स्पष्ट था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि लोगों को लगता है कि यह रास्ता कठिन है, लेकिन सच तो यह है कि यह दुनिया का सबसे सरल रास्ता है।
दूर से देखने पर जरूर यह जीवन मुश्किलों से भरा नजर आता है, लेकिन जब आप सच्चाई के इस मार्ग पर अपने कदम आगे बढ़ाते हैं, तो सब कुछ अपने आप आसान और सरल होता चला जाता है।

जज की कुर्सी ठुकराने के सवाल पर उनका नजरिया बिल्कुल साफ था।
वे कहती हैं कि जज बनने के बाद और उस मुकाम तक पहुंचने के बाद मुझे गहराई से यह एहसास हुआ कि दुनिया का कोई भी सांसारिक पद बड़ा नहीं होता।
आर्यिका व्रत (जैन साध्वी का व्रत) धारण करना ही जीवन का सबसे बड़ा और सच्चा पद है।
दुनिया के बाकी सभी पद, चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हों, अस्थायी हैं और एक दिन छूट ही जाएंगे।
इसी विचार ने दीक्षा लेने के उनके संकल्प को और मजबूत कर दिया।

पिता का गर्व: “अब बेटी नहीं, मां कहकर बुलाएंगे”
प्रखरश्री के पिता जेके जैन भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में विकास अधिकारी के पद से रिटायर हुए हैं।
वे बताते हैं कि 2016 में ही जब उनकी बेटी आचार्य विद्यासागर जी महाराज के दर्शन के लिए गई थी, तब उसने उनसे नियम देने की प्रार्थना की थी।
तब से लेकर शिक्षा पूरी होने तक उसने ब्रह्मचर्य के नियमों का कठोरता से पालन किया। इसके बाद 2020 में उसने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने की इच्छा जता दी थी।
उस समय आचार्यश्री ने परिवार से सहमति मांगी थी, जिस पर पिता ने सहर्ष कह दिया था कि गुरु का जो भी आदेश होगा, वह उन्हें स्वीकार है।

2023 में जब प्रखरश्री सिविल जज की परीक्षा दे रही थीं, तब भी वे अपने पिता के साथ मार्गदर्शन के लिए रायपुर और डोंगरगढ़ गए थे।
आज उनके पिता बेहद भावुक हैं, लेकिन साथ ही उन्हें अपनी बेटी पर बहुत गर्व है।
वे कहते हैं कि आज के दौर में जब हर माता-पिता अपने बच्चों के करियर, भविष्य और संस्कारों को लेकर हमेशा चिंता में रहते हैं, ऐसे समय में उनकी बेटी ने जो राह चुनी है, वह उनके लिए फख्र की बात है।
भावुक होते हुए पिता कहते हैं, “दीक्षा के बाद हमारे रिश्तों का संबोधन भी बदल जाएगा। आज के बाद वह हमारी बेटी नहीं रहेगी, बल्कि वह ‘मां’ के नाम से पूजनीय हो जाएगी। वह हमें अपने भक्तों की तरह देखेगी और हम उसे पूरी श्रद्धा की दृष्टि से देखेंगे।”

मां के आंसू: एक तरफ खुशी, दूसरी तरफ चिंता
बेटी के इस फैसले पर मां ज्योति जैन की आंखों में आंसू हैं। उनके मन में खुशी और एक मां वाली चिंता, दोनों एक साथ चल रही हैं।
वे कहती हैं कि एक बेटी अपनी मां के सबसे ज्यादा करीब होती है। जब प्रखरश्री ने पहली बार वैराग्य का मार्ग चुनने की बात कही थी, तो एक मां होने के नाते उन्हें अंदर से बहुत बड़ा झटका लगा था।
उन्हें इस बात की चिंता सताने लगी थी कि जो बेटी इतने लाड़-प्यार में पली-बढ़ी है, जिसने कभी कोई शारीरिक कष्ट नहीं झेला, वह इतने कड़े नियमों वाले मार्ग पर कैसे चल पाएगी।
दीक्षा के बाद साध्वियों को भोजन, पानी, और कपड़ों को लेकर बेहद कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है।

ज्योति जी बताती हैं, “मेरे मन में दो तरह के भाव चलते हैं। एक मन इस बात पर बहुत गौरवान्वित होता है कि हमारे परिवार को यह दुर्लभ सौभाग्य मिला है कि हमारी बेटी मोक्ष के मार्ग पर जा रही है।लेकिन तुरंत ही दूसरा मन एक मां की तरह चिंता करने लगता है कि मेरी फूल सी बच्ची इन कठिन रास्तों पर नंगे पैर कैसे चलेगी। शादी के बाद बेटी को विदा करना और वैराग्य के मार्ग पर विदा करना, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।”
हालांकि, वे यह भी मानती हैं कि उनकी बेटी अब जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर अपनी आत्मा के कल्याण की तरफ बढ़ रही है, इसलिए उन्होंने कभी अपनी बेटी को इस पवित्र रास्ते पर जाने से नहीं रोका।

सीए समेत 4 अन्य बहनें भी ले रहीं दीक्षा
इस वैराग्य यात्रा में प्रखरश्री अकेली नहीं हैं।
सांसारिक मोह-माया को छोड़कर संयम और तपस्या का यह मार्ग चुनने वाली उनके साथ चार अन्य बहनें भी हैं।
इनमें पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) रंगोली दीदी, गिरजा दीदी, चेतना दीदी और सोनम दीदी शामिल हैं।
ये पांचों बहनें अलग-अलग शहरों और अलग-अलग प्रोफेशन से आती हैं।
इन सभी ने सांसारिक सुख-सुविधाओं और बड़ी डिग्रियों को पीछे छोड़कर आध्यात्मिक जीवन को अपना अंतिम लक्ष्य बना लिया है।

हाल ही में रविवार को बैतूल में इन पांचों दीक्षार्थी बहनों की भव्य बिनौली यात्रा निकाली गई।
इस यात्रा में जैन समाज के लोगों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचते-गाते हुए इन बहनों का स्वागत किया।
रास्ते भर समाज के लोगों ने उन पर फूलों की बारिश की और उन्हें उनके नए जीवन के लिए मंगल आशीर्वाद दिया।
इस यात्रा के दौरान प्रखरश्री के चेहरे पर दुनिया जीतने वाली एक गजब की शांति, प्रसन्नता और संतोष साफ नजर आ रहा था।

22 नवंबर को सोनागिरि में होगा मुख्य समारोह
इन सभी बहनों का मुख्य जैनेश्वरी दीक्षा समारोह 22 नवंबर 2026 को मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध जैन सिद्ध क्षेत्र सोनागिरि में बड़े ही भव्य रूप में आयोजित किया जाएगा।
यह पूरा समारोह गणाचार्य भगवान श्री विराग सागर जी महाराज और पदाचार्य श्री पदमसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संपन्न होगा।
साथ ही, इन सभी को गणिनी आर्यिका विशाश्री माताजी की छत्रछाया और सानिध्य प्राप्त होगा।
एक जज और सीए जैसी उच्च शिक्षित बेटियों का यह कदम समाज को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि असली शांति और सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि भीतर की आध्यात्मिक यात्रा में छिपा है।
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