Supreme court on Dhar Bhojshala: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले पर फिलहाल रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिसमें भोजशाला को पूरी तरह से ‘मां सरस्वती का मंदिर’ घोषित किया गया था।
लेकिन, इसके साथ ही अदालत ने मुस्लिम पक्ष को एक बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच मुस्लिम समुदाय के लोगों को नमाज अदा करने के लिए भोजशाला परिसर के बिल्कुल पास में ही कोई खुली और उपयुक्त जगह दी जाए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई की।
कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह मामला बेहद संवेदनशील है, इसलिए सभी पक्षों को शांति और धैर्य बनाए रखना चाहिए।
आइए इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश की 3 सबसे बड़ी बातें
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए तीन मुख्य निर्देश जारी किए हैं:
हाईकोर्ट के फैसले पर कोई अंतरिम रोक नहीं:
कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 15 मई 2026 के उस आदेश पर तुरंत रोक लगाने से मना कर दिया है, जिसमें भोजशाला को मंदिर माना गया था। यानी फिलहाल हाईकोर्ट का फैसला लागू रहेगा।

नमाज के लिए वैकल्पिक व्यवस्था:
मुस्लिम पक्ष की इस चिंता पर कि उन्हें नमाज पढ़ने से रोक दिया गया है, सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकाला।
कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार से कहा कि वे शुक्रवार को दोपहर 1 से 3 बजे के बीच नमाज के लिए भोजशाला परिसर से बिल्कुल सटीक लगी हुई किसी खुली जगह का इंतजाम करें।

इमारत के ढांचे से कोई छेड़छाड़ नहीं:
कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट की लिखित अनुमति के बिना भोजशाला परिसर की मौजूदा स्थिति या उसके ढांचे (Structural modification) में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं करेंगे।

क्या था मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा।
इसी साल 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस विवाद पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की महीनों चली वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर यह माना था कि धार की भोजशाला असल में मां सरस्वती का मंदिर ही है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में:
* दशकों पुराने उस नियम को रद्द कर दिया था, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन परिसर के अंदर जाकर नमाज पढ़ने की इजाजत थी।
* हिंदू पक्ष को परिसर में नियमित पूजा-अर्चना करने का पूरा अधिकार दे दिया था।

हाईकोर्ट के इसी फैसले के बाद भोजशाला की पूरी व्यवस्था बदल गई थी।
इस फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में मुस्लिम पक्ष ने क्या दलीलें दीं?
सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की तरफ से देश के जाने-माने वकील हुजैफा अहमदी और अभिषेक मनु सिंघवी ने पैरवी की। उनकी मुख्य दलीलें कुछ इस प्रकार थीं:
वर्षों पुरानी व्यवस्था अचानक बदल दी गई:
मुस्लिम पक्ष का कहना था कि भोजशाला में लंबे समय से एक व्यवस्था चली आ रही थी। इसके तहत मंगलवार को हिंदू पक्ष वहां पूजा करता था और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष वहां जुमे की नमाज अदा करता था।
हाईकोर्ट के फैसले ने इस सदियों पुरानी व्यवस्था को अचानक खत्म कर दिया, जिससे मुस्लिम समुदाय को बड़ा झटका लगा है।

अपील करने का मौका भी नहीं मिला:
एडवर्टाइज हुजैफा अहमदी ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट का फैसला आते ही उन्हें अपनी बात रखने या सुप्रीम कोर्ट आने तक का सही समय नहीं मिला और तुरंत परिसर में उनका प्रवेश बंद कर दिया गया।
पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act, 1991) का उल्लंघन:
वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि हाईकोर्ट का यह फैसला 1991 के ‘पूजा स्थल कानून’ की भावना के खिलाफ है।
यह कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था, उसे बदला नहीं जा सकता।
सिंघवी ने कहा कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है कि यहाँ सालों से नमाज होती आ रही है।

सरकार और हिंदू पक्ष का क्या था रुख?
केंद्र सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए देश के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को वहां की जमीनी हकीकत बताई।
उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद से धार इलाके में पूरी तरह से शांति बनी हुई है।
प्रशासन ने स्थिति को बेहद सूझबूझ और शांतिपूर्ण तरीके से संभाला है और वहां कानून-व्यवस्था से जुड़ी कोई भी समस्या पैदा नहीं हुई है। सामाजिक सौहार्द पूरी तरह से बरकरार है।

“हर शब्द संभलकर बोलना होगा” – सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस मामले की संवेदनशीलता को बहुत गहराई से महसूस किया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह बहुत ही संवेदनशील मामला है। कोर्ट रूम के भीतर कही गई किसी भी बात से बाहर समाज में बेवजह का विवाद खड़ा हो सकता है या लोगों के बीच कोई गलत संदेश जा सकता है। इसलिए हमें और सभी पक्षों को इस मामले पर बात करते हुए अपने हर एक शब्द का इस्तेमाल बहुत ही सावधानी से करना होगा।”

जजों ने यह भी साफ किया कि फिलहाल मुस्लिम समुदाय के लिए नमाज की जो वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है, वह पूरी तरह से अस्थायी (Temporary) है।
यह अंतिम फैसला आने तक ही लागू रहेगी और इस व्यवस्था से किसी भी पक्ष के मुख्य कानूनी दावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिका पर सभी संबंधित पक्षों (हिंदू पक्ष, राज्य सरकार और केंद्र सरकार) को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।
अदालत ने संकेत दिए हैं कि इस मामले की अंतिम और विस्तृत सुनवाई अगले दो से तीन सप्ताह (करीब 15 से 20 दिनों) के भीतर की जाएगी।

चूंकि यह विवाद सीधे तौर पर दो समुदायों की आस्था और ऐतिहासिक दावों से जुड़ा हुआ है, इसलिए पूरे देश की नजरें अब देश की सर्वोच्च अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हुई हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ करता है कि वह आस्था के साथ-साथ समाज में कानून-व्यवस्था और आपसी भाईचारे को बनाए रखने के लिए पूरी तरह गंभीर है।
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