El Nino impact India Monsoon: भारत में खेती-किसानी को हमेशा से ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है, और इस साल यह बात सच साबित होती दिख रही है।
देश के एक बड़े हिस्से में मानसून की रफ्तार बेहद धीमी है, जिसने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
मौसम विभाग और कृषि विशेषज्ञों की मानें तो इस सुस्ती के पीछे ‘अल नीनो’ (El Niño) नाम की आसमानी आफत बैठी है।
इसका सीधा असर यह हुआ है कि देश के 315 जिलों पर इस समय सूखे का काला साया मंडरा रहा है।

इन प्रभावित इलाकों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे बड़े कृषि प्रधान राज्य शामिल हैं।
मानसून लेट और सुस्त क्यों हुआ?
आमतौर पर मध्य प्रदेश में मानसून 15 से 16 जून के बीच दस्तक दे देता है, लेकिन इस बार 26 जून बीत जाने के बाद भी प्रदेश के कई हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार ही कर रहे हैं।
यानी मानसून करीब 9 दिन की देरी से चल रहा है। इसकी शुरुआत केरल से ही हो गई थी, जहाँ मानसून तय समय से 4 दिन लेट पहुँचा और उसके बाद भी उसकी आगे बढ़ने की रफ्तार बेहद सुस्त रही।

आंकड़े डराने वाले हैं। देश में अब तक सामान्य से करीब 43 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है।
मौसम विभाग (IMD) का कहना है कि जुलाई के शुरुआती हफ्ते में भी बारिश के बहुत मजबूत होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
भारतीय मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी दी थी कि इस साल देश में सामान्य की तुलना में सिर्फ 92 फीसदी बारिश ही हो सकती है।
यह लगातार तीसरा साल है जब अल नीनो भारतीय मानसून को कमजोर कर रहा है।

315 जिलों पर सबसे बड़ा संकट
कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने मिलकर एक जमीनी सर्वे किया है।
इस सर्वे में उन जिलों की पहचान की गई है जहाँ कम बारिश का सबसे घातक असर पड़ सकता है।
इस लिस्ट में 315 जिले सामने आए हैं, जिन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
सबसे संवेदनशील (111 जिले): ये वो इलाके हैं जहाँ सिंचाई के साधन बेहद कम हैं (25 फीसदी से भी कम जमीन पर सिंचाई की सुविधा है)। यहाँ की खेती पूरी तरह भगवान भरोसे यानी सिर्फ बारिश पर टिकी है।
मध्यम संवेदनशील (76 जिले): इन जिलों में 25 से 50 फीसदी तक सिंचाई की व्यवस्था है, यानी थोड़ी राहत है पर खतरा टला नहीं है।
कम संवेदनशील (128 जिले): यहाँ बांध, नहर या ट्यूबवेल जैसे साधनों की स्थिति थोड़ी बेहतर है, जिससे नुकसान को कुछ हद तक रोका जा सकता है।

मध्य प्रदेश के किसानों पर दोहरी मार
मध्य प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था काफी हद तक खरीफ की फसलों पर निर्भर करती है। मानसून में देरी की वजह से खेतों में बुवाई का काम अटक गया है।
दलहन (दालें) और कपास (रूई) की बुवाई के आंकड़ों में अभी से ही गिरावट देखने को मिल रही है।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अब सारा दारोमदार जुलाई और अगस्त के महीनों पर है।
अगर इन दो महीनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो फसलों का उत्पादन भारी मात्रा में घट सकता है, जिससे किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा।

क्या होता है यह ‘अल नीनो’?
इसे बेहद आसान शब्दों में समझें तो अल नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक हलचल है।
हर दो से सात साल में एक बार ऐसा होता है जब समुद्र की सतह का पानी सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है।
जब समुद्र का पानी गर्म होता है, तो हवाओं का रुख बदल जाता है।
इसका नतीजा यह होता है कि दुनिया के कई हिस्सों में भारी बाढ़ आ जाती है, तो भारत जैसे देशों में मानसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और सूखा पड़ता है।

वैज्ञानिकों की सलाह: अब क्या करें किसान?
इस संकट की घड़ी में कृषि वैज्ञानिक साधुराम शर्मा ने किसानों को पारंपरिक खेती के तरीकों में तुरंत बदलाव करने की सलाह दी है:
- धान लगाने की जिद छोड़ें: धान (चावल) की फसल को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। कम बारिश के अनुमान को देखते हुए पूरी जमीन पर धान लगाने की गलती न करें।
- मोटे अनाज (मिलेट्स) को अपनाएं: किसान अब बाजरा, ज्वार और रागी जैसी फसलों की तरफ रुख करें। इन्हें केंद्र सरकार ‘श्री अन्न’ भी कहती है। ये फसलें कम पानी और सूखी मिट्टी में भी शानदार पैदावार देती हैं।
- कम समय वाली फसलें: मूंग और उड़द जैसी दालें बहुत कम समय (60-70 दिन) में तैयार हो जाती हैं। कम पानी में भी इनका उत्पादन अच्छा होता है, जिससे नुकसान का खतरा कम हो जाता है।
- फसल विविधीकरण (Crop Diversification): किसान अपने पूरे खेत में केवल एक ही फसल न लगाएं। खेत के अलग-अलग हिस्सों में अलग फसलें लगाएं या ‘इंटर-क्रॉपिंग’ (मिश्रित खेती) अपनाएं। इससे अगर मौसम की मार से एक फसल खराब भी हो गई, तो दूसरी फसल से लागत वसूल हो जाएगी।

समय रहते अगर किसानों ने मौसम विभाग (IMD) की चेतावनियों को समझा और वैज्ञानिकों की इस सलाह पर अमल किया, तो अल नीनो के इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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