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16 कागज, पिता की गवाही फिर भी ‘विदेशी’! गुवाहाटी हाई कोर्ट के इस फैसले ने सबको चौंकाया

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Indian Citizenship Proof: यह कहानी असम के गुवाहाटी में रहने वाले एक दिहाड़ी मजदूर की है।

वह गुवाहाटी के बोरबोरी इलाके में किराए के मकान में रहता है। फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (Foreigners Tribunal) ने उसे विदेशी घोषित कर दिया था।

इस फैसले के खिलाफ उसने गुवाहाटी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत में उसने खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 16 सरकारी दस्तावेज पेश किए।

66 साल के दस्तावेज किए पेश

ये दस्तावेज साल 1951 से लेकर 2017 तक के थे।

इसके साथ ही, उसके पिता ने भी कोर्ट में खड़े होकर गवाही दी कि यह मेरा ही बेटा है।

लेकिन जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की डिवीजन बेंच ने उसकी याचिका को खारिज कर दिया और ट्रिब्यूनल के फैसले को सही माना।

कोर्ट ने कहा कि वह फॉरेनर्स एक्ट, 1946 के सेक्शन 9 के तहत खुद को भारतीय नागरिक साबित करने में नाकाम रहा।

मजदूर ने कोर्ट में कौन-कौन से 16 कागज सौंपे थे?

याचिकाकर्ता ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसने कोर्ट को जो दस्तावेज सौंपे, उनकी लिस्ट इस प्रकार है:

1. 1951 की NRC कॉपी: पिता के नाम पर दर्ज नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस की कॉपी।

 2. कम्प्यूटराइज्ड NRC: 1951 की ही कंप्यूटर से निकली कॉपी, जिसमें दादा-दादी और परिवार के अन्य लोगों के नाम थे।

 3. 1966 की वोटर लिस्ट: दादा-दादी और सौतेली दादी के नाम वाली सर्टिफाइड वोटर लिस्ट।

 4. 1970 की वोटर लिस्ट: पिता, दादा-दादी के नाम वाली वोटर लिस्ट।

 5. 1973 की जमीन की रजिस्ट्री: दादा के नाम पर खरीदी गई जमीन की मूल डीड (Original Purchase Deed)।

 6. 1979 की वोटर लिस्ट: माता-पिता और दादा-दादी के नाम वाली लिस्ट।

 7. 1985 की वोटर लिस्ट: माता-पिता के नाम वाली प्रमाणित सूची।

 8. PAN कार्ड: याचिकाकर्ता का अपना पैन कार्ड।

 9. 1989 की वोटर लिस्ट: माता-पिता और चाचा के नाम वाली लिस्ट।

 10. 1997 की वोटर लिस्ट: माता-पिता और बड़े भाई के नाम वाली लिस्ट।

 11. स्कूल सर्टिफिकेट: हाशदोबा आंचलिक उच्च विद्यालय के हेडमास्टर द्वारा 2017 में जारी सर्टिफिकेट।

 12. 2005 की वोटर लिस्ट: माता-पिता के नाम दर्ज रिकॉर्ड।

 13. 2013 की वोटर लिस्ट: पहली बार याचिकाकर्ता और उसके माता-पिता का नाम एक साथ दर्ज रिकॉर्ड।

 14. वोटर ID कार्ड (EPIC): याचिकाकर्ता का अपना चुनाव पहचान पत्र।

 15. 2015 की वोटर लिस्ट: याचिकाकर्ता और परिवार का नाम।

 16. 2017 की वोटर लिस्ट: याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी का नाम दर्ज रिकॉर्ड।

नदी का कटाव और बेघर होने की दलील

याचिकाकर्ता का दावा था कि उसका जन्म 1 मई 1988 को हुआ था।

उसने कोर्ट को बताया कि उसका परिवार बहुत गरीब है और ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव (Flood & Erosion) के कारण उनका घर बार-बार बह जाता था। इसी वजह से उन्हें कई बार गांव बदलना पड़ा।

उनका परिवार चराई खसरा से धोबाकुरा गया, फिर घुगुडोबा और आखिर में हाशदोबा में बसा।

उसने 1999 में हाशदोबा के ही एक स्कूल से पांचवीं क्लास की पढ़ाई की थी।

रहने की जगह बार-बार बदलने के कारण ही कागजों में पते बदलते रहे।

हाई कोर्ट ने इन 16 सबूतों को क्यों कूड़े के भाव समझा?

आम जनता को लगता है कि अगर हमारे पास पैन कार्ड, वोटर ID या जमीन के कागज हैं, तो हमारी नागरिकता पक्की है।

लेकिन कोर्ट के कानून अलग तरीके से काम करते हैं। हाई कोर्ट ने इन सबूतों को खारिज करने के पीछे 5 बड़ी वजहें बताईं:

1. पूर्वजों से ‘कानूनी लिंक’ गायब था (बड़ी कमी)

अदालत ने कहा कि केवल यह दिखा देना काफी नहीं है कि 1951 या 1966 के रिकॉर्ड में किसी ‘एक्स-वाई-जेड’ व्यक्ति का नाम दर्ज है और वह आपके दादा या पिता हैं।

आपके पास ऐसा पक्का सरकारी दस्तावेज होना चाहिए जो यह साबित करे कि आप वास्तव में उसी व्यक्ति के बेटे या पोते हैं।

कागजों की इस पूरी चेन में वो ‘कड़ी’ (Link) गायब थी, जो याचिकाकर्ता को उसके पूर्वजों से कानूनी रूप से जोड़ सके।

2. 1951 का NRC पक्का सबूत क्यों नहीं?

कोर्ट ने एक बहुत बड़ी कानूनी बात कही। 1951 का NRC ‘सेंसस एक्ट, 1948’ (जनगणना कानून) के तहत तैयार किया गया था।

इस कानून की धारा 15 साफ कहती है कि जनगणना के रिकॉर्ड को किसी भी अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने जो एनआरसी की कॉपी दी, वह कंप्यूटर से प्रिंट की हुई थी।

कानून के मुताबिक, कंप्यूटर से निकले किसी भी डिजिटल दस्तावेज को कोर्ट में मानने के लिए ‘एविडेंस एक्ट’ (साक्ष्य अधिनियम) के तहत एक विशेष सरकारी सर्टिफिकेट देना जरूरी होता है, जो उसने नहीं दिया था।

3. पैन कार्ड और वोटर ID नागरिकता का सर्टिफिकेट नहीं हैं

अदालत ने साफ किया कि PAN कार्ड केवल टैक्स भरने और वित्तीय लेनदेन के लिए है, नागरिकता के लिए नहीं।

इसी तरह, वोटर ID कार्ड केवल वोट डालने का अधिकार देता है, यह इस बात का अंतिम प्रमाण नहीं है कि आप भारत के ही नागरिक हैं।

अगर नागरिकता पर ही कानूनी सवाल उठ जाए, तो ये दोनों कार्ड नागरिकता साबित नहीं कर सकते।

PAN Card DOB Change

4. स्कूल सर्टिफिकेट की खुली पोल

याचिकाकर्ता ने 2017 का एक स्कूल सर्टिफिकेट जमा किया था।

कोर्ट ने इसे मानने से इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि जिस हेडमास्टर ने इसे जारी किया था, उन्हें गवाही के लिए कोर्ट में नहीं बुलाया गया।

साथ ही, स्कूल का असली ‘एडमिशन रजिस्टर’ भी कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया, जिससे यह वेरिफाई हो सके कि रिकॉर्ड सच्चा है या नहीं।

5. पिता की गवाही में विरोधाभास और वोटर लिस्ट की गड़बड़ी

याचिकाकर्ता के पिता ने कोर्ट में आकर कहा कि यह मेरा ही बेटा है। लेकिन जब सरकारी वकील ने उनसे जिरह (Cross-examination) की, तो वे अपने ही बेटे का जन्म का साल तक सही-सही नहीं बता पाए।

नागरिकता जैसे गंभीर मामलों में कोर्ट केवल जुबानी बातों पर भरोसा नहीं करता।

इसके अलावा, अलग-अलग सालों की वोटर लिस्ट में परिवार के सदस्यों की उम्र आपस में मेल नहीं खा रही थी—किसी की उम्र अजीब ढंग से बढ़ रही थी, तो किसी की कम हो रही थी।

इस मिसमैच की वजह से कोर्ट का शक गहरा गया।

क्या पासपोर्ट होने से नागरिकता साबित हो जाती है?

इस मामले के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है। कानूनी तौर पर पासपोर्ट केवल उन लोगों को जारी होता है जो भारतीय हैं।

लेकिन देश के सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट पहले भी कह चुके हैं कि अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता ‘फॉरेनर्स एक्ट’ के तहत विवाद के घेरे में आ जाए, तो सिर्फ पासपोर्ट दिखा देने से वह विदेशी होने के आरोप से मुक्त नहीं हो जाता।

उसे अपने पूर्वजों का पूरा इतिहास और भारत से पुराना नाता कागजों के जरिए साबित करना ही होगा।

अब याचिकाकर्ता के पास क्या रास्ता बचा है?

हाई कोर्ट से झटका लगने के बाद अब इस दिहाड़ी मजदूर के पास आखिरी रास्ता देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) जाने का है।

यदि वह सुप्रीम कोर्ट में कोई ऐसा दस्तावेज (जैसे जन्म प्रमाण पत्र या पुश्तैनी जमीन का ऐसा लिंक जो सीधे पिता-पुत्र के रिश्ते को प्रमाणित करे) पेश कर पाता है, तभी उसे राहत मिलने की उम्मीद है।

वरना, उसे विदेशी ट्रिब्यूनल के आदेश के तहत डिटेंशन सेंटर या देश से बाहर निकालने की प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।

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