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गुना में आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा जमाने वाले दबंगों के खिलाफ प्रशासन का बड़ा एक्शन, 24 घंटे में 90 से अधिक रसूखदारों पर FIR

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP Guna SDM FIR: मध्य प्रदेश के गुना जिले में वर्षों से आदिवासियों की पट्टे वाली जमीनों पर अवैध कब्जा जमाकर बैठे रसूखदारों और दबंगों की मुश्किलें अब बढ़ गई हैं।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की कड़ी फटकार और तल्ख रुख के बाद जिला प्रशासन पूरी तरह हरकत में आ गया है।

प्रशासन ने महज 24 घंटे के भीतर ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए जिले के अलग-अलग थानों में 90 से अधिक दबंगों के खिलाफ नामजद FIR दर्ज कराई है।

इस ऐतिहासिक और सख्त कार्रवाई के बाद से पूरे इलाके के भू-माफियाओं और कब्जाधारियों में हड़कंप मच गया है।

एसडीएम खुद बने फरियादी, बमोरी में सबसे बड़ी कार्रवाई

इस पूरी कानूनी कार्रवाई की सबसे अहम और बड़ी बात यह रही कि प्रशासन ने केवल औपचारिक आदेश जारी नहीं किए, बल्कि बमोरी और अन्य तहसीलों में खुद एसडीएम (SDM) ने शासन की तरफ से पुलिस थानों में जाकर शिकायत दर्ज कराई।

यानी एसडीएम खुद मामलों में फरियादी (शिकायतकर्ता) बने।

वहीं, चांचौड़ा इलाके में पीड़ित आदिवासी पट्टाधारकों की शिकायत पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं।

सोमवार शाम तक जिले के थानों में लगातार मामले दर्ज होते रहे। सबसे बड़ा एक्शन बमोरी तहसील में देखने को मिला।

यहाँ सरकारी आदेशों के बावजूद आदिवासियों की जमीन खाली न करने वाले 23 दबंगों के खिलाफ एक साथ मामला कायम किया गया।

पुलिस प्रशासन के अनुसार, इन सभी मामलों में 6 महीने के भीतर पूरी जांच करके अदालत में चालान पेश करने का लक्ष्य रखा गया है।

हाईकोर्ट की तल्खी: “कागजी खानापूर्ति नहीं चलेगी”

दरअसल, यह पूरा मामला अदालत के कड़े रुख के बाद गरमाया। 29 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय की युगलपीठ ने गुना प्रशासन की ढीली कार्यशैली पर सख्त नाराजगी जाहिर की थी।

अदालत ने सवाल उठाया था कि जब एसडीएम को अवैध कब्जों की पूरी जानकारी पहले से थी, तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर पुलिस थानों में केस दर्ज क्यों नहीं कराया?

कोर्ट ने टिप्पणी की कि सिर्फ कागजी पंचनामा बनाना और खानापूर्ति करना कानून का पालन नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि जिन मामलों में जमीन खाली कराने (बेदखली) के आदेश हो चुके हैं, वहां एसडीएम खुद अनिवार्य रूप से पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की नजीर और पूरे एमपी के लिए नया नियम

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने ऐतिहासिक फैसले (ए.आर. अंतुले बनाम रामदास श्रीनिवास नायक) का हवाला देते हुए साफ किया कि किसी भी अपराध की जानकारी रखने वाला जिम्मेदार अधिकारी कानून को सक्रिय कर सकता है और एफआईआर दर्ज करा सकता है।

अदालत के इस रुख के बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में यह आश्वासन दिया है कि एसडीएम द्वारा खुद फरियादी बनकर एफआईआर दर्ज कराने की यह व्यवस्था अब केवल गुना तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में अनिवार्य रूप से लागू की जाएगी।

बिना अनुमति बटाई पर दी गई जमीनों पर भी शिकंजा

गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल ने इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए बताया कि सरकार का साफ संदेश है—आदिवासियों को मिली पट्टे की जमीन पर केवल उनका ही अधिकार रहेगा।

जांच में सामने आया कि कई मामलों में गैर-आदिवासियों ने बिना कलेक्टर की कानूनी अनुमति के आदिवासियों की जमीनों को बटाई पर ले रखा था और धीरे-धीरे उन पर पक्का कब्जा जमा लिया था। प्रशासन ने पहले अभियान चलाकर आदिवासियों को उनकी जमीनों का कब्जा वापस दिलाया और अब कब्जा करने वाले दबंगों के खिलाफ सख्त धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई जा रही है।

प्रशासन की इस चौतरफा कार्रवाई से स्पष्ट हो गया है कि अब आदिवासियों के अधिकारों से खिलवाड़ करने वाले दबंगों और भू-माफियाओं की खैर नहीं है।

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