MP High Court on Indore Water Issue: इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हैं।
इस मामले पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने बेहद सख्त रुख अपनाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस घटना ने न केवल देश बल्कि विदेश में भी शहर की छवि को नुकसान पहुंचाया है।
इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर है, लेकिन अब दूषित पेयजल की वजह से यह पूरे भारत में चर्चा का विषय बन गया है।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी और अंतरिम आदेश
6 जनवरी को हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कई कड़े निर्देश दिए।
कोर्ट ने कहा कि सरकार का अब तक का जवाब ‘असंवेदनशील’ है।
हम इस मामले में मुख्य सचिव को सुनना चाहते हैं, क्योंकि यह समस्या सिर्फ शहर के एक हिस्से तक सीमित नहीं है।
दरअसल, पूरे इंदौर शहर का पीने का पानी सुरक्षित नहीं है।

कोर्ट ने मुख्य सचिव (CS) अनुराग जैन को 15 जनवरी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने फिलहाल तीन मुख्य अंतरिम आदेश जारी किए हैं:
- प्रभावित इलाकों में तत्काल साफ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।
- दूषित पानी के स्रोतों को पूरी तरह बंद किया जाए।
- बीमार लोगों को बेहतर से बेहतर इलाज मुहैया कराया जाए।
मौतों के आंकड़ों पर विरोधाभास
सुनवाई के दौरान मौतों के आंकड़ों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं थी।
अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि जहां प्रशासन कम मौतें बता रहा है, वहीं पार्षद और स्थानीय मीडिया 15 से 17 मौतों का दावा कर रहे हैं।
कोर्ट ने अगली सुनवाई पर मौतों का सही और सत्यापित आंकड़ा पेश करने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही, कोविड की तर्ज पर रोजाना हेल्थ बुलेटिन जारी करने का सुझाव भी दिया गया है।
अधिकारियों की लापरवाही
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि इंदौर को नए आईएएस अधिकारियों के लिए ‘चारागाह’ बना दिया गया है।
उन्होंने बताया कि भागीरथपुरा में नई पाइपलाइन बिछाने का 2.38 करोड़ रुपये का प्रस्ताव नवंबर 2022 में ही पास हो चुका था, लेकिन फाइल अधिकारियों की मेज पर दबी रही।
अगर समय पर टेंडर खुले होते, तो आज ये 17 लोग जीवित होते।
यहां तक कि महापौर पुष्यमित्र भार्गव भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि कई बार अधिकारी जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनते।
पुरानी चेतावनियों को किया गया नजरअंदाज
कोर्ट के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि 2017-18 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शहर के 60 सैंपल लिए थे, जिनमें से 59 फेल पाए गए थे।
उस समय दी गई चेतावनियों पर नगर निगम ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
इसके अलावा, सीएम और मेयर हेल्पलाइन पर आने वाली शिकायतों को बिना समाधान के ही ‘क्लोज’ कर दिया गया, जो प्रशासन की घोर लापरवाही को दर्शाता है।
प्रदेश में पहली बार ऐसा स्वास्थ्य संकट
भोपाल से आई स्टेट इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (SIDSP) की टीम ने इसे एक ‘असाधारण’ स्थिति बताया है।
टीम के प्रमुख डॉ. भागवत भार्गव के अनुसार, मध्य प्रदेश के इतिहास में इतने छोटे क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में महामारी (एपिडेमिक) जैसी स्थिति पहली बार देखी गई है।
वर्तमान में 110 मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें से 15 की हालत नाजुक है और वे आईसीयू में हैं।
प्रशासनिक हलचल: सस्पेंशन और दौरे
हाईकोर्ट की सख्ती के बाद नगर निगम ने कुछ कार्रवाई की जानकारी दी है।
जोन-4 के जोनल अधिकारी और असिस्टेंट इंजीनियर को निलंबित कर दिया गया है, जबकि एक सब-इंजीनियर की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं।
मंगलवार को कलेक्टर शिवम वर्मा और निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल ने भी क्षेत्र का दौरा किया और लीकेज सुधार कार्यों का जायजा लिया।
जनहित याचिकाओं के माध्यम से मांग की गई है कि दोषी अधिकारियों पर केवल विभागीय कार्रवाई न हो, बल्कि उन पर ‘आपराधिक प्रकरण’ दर्ज किया जाए।
साथ ही, मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा और भविष्य में ऐसी घटना न हो, इसके लिए एक उच्चस्तरीय जांच समिति (रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में) बनाई जाए।


