Meta Instagram Policy: मौजूदा दौर में सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।
ऐसे में जब इंस्टाग्राम की पेरेंटल कंपनी ‘मेटा’ ने अपनी एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन (E2EE) पॉलिसी में बदलाव की बात की, तो बवाल मच गया।
मामला इंदौर हाईकोर्ट तक जा पहुंचा है, जहां हाल ही में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई।

क्या है पूरा मामला?
अधिवक्ता पार्थ शर्मा ने इंदौर हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है।
उनका कहना है कि इंस्टाग्राम की नई पॉलिसी से यूजर्स की निजी जानकारी और प्राइवेसी को खतरा हो सकता है।
उन्हें डर है कि डेटा लीक होने से आम जनता की सुरक्षा दांव पर लग सकती है।

कोर्ट में मेटा का पक्ष: कपिल सिब्बल की दलीलें
इस मामले की सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से देश के दिग्गज वकील कपिल सिब्बल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए।
उन्होंने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि डेटा पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि:
- मेटा किसी भी तीसरे व्यक्ति या प्राइवेट एजेंसी के साथ यूजर्स का डेटा शेयर नहीं करेगा।
- डेटा केवल तभी साझा किया जाएगा जब भारत सरकार या कानून प्रवर्तन एजेंसियां इसकी मांग करेंगी।
- इसका मुख्य उद्देश्य आपराधिक गतिविधियों, तस्करी (Smuggling) और गैर-कानूनी कामों को रोकना है।

कानून के दायरे में काम करने का दावा
मेटा का कहना है कि वे भारतीय कानूनों के तहत ही काम कर रहे हैं।
नई पॉलिसी को इस तरह डिजाइन किया गया है कि अगर कोई अपराध होता है, तो जांच में सहयोग किया जा सके।
बोर्ड की सुस्ती और कोर्ट का अगला कदम
इससे पहले 10 अप्रैल को हुई सुनवाई में कोर्ट ने याचिकाकर्ता को ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड’ के सामने अपनी बात रखने को कहा था।
हालांकि, बोर्ड ने अभी तक इस पर कोई ठोस फैसला नहीं सुनाया है।
अब जस्टिस विजय शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने मेटा को एक विस्तृत जवाब (Detailed Reply) दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया है।

अब क्या होगा?
प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच छिड़ी इस कानूनी लड़ाई की अगली सुनवाई अब 13 जुलाई को होगी।
तब तक यूजर्स की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या उनका डेटा सचमुच सिर्फ “अपराध रोकने” के लिए इस्तेमाल होगा या इसके पीछे कोई और पेच है।
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