मध्य प्रदेश सरकार अब राज्य में पानी की किल्लत और गंदे पानी (सीवेज) की समस्या को लेकर पूरी तरह एक्शन मोड में आ गई है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में भोपाल में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के बड़े अफसरों के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग की।
इस बैठक में सीएम ने साफ कर दिया कि अब पुराने ढर्रे पर काम नहीं चलेगा।
सरकार ने भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहरों के लिए एक बेहद खास और आधुनिक योजना तैयार करने का फैसला किया है, जिसे *’मेट्रोपॉलिटन वाटर मैनेजमेंट मॉडल’ नाम दिया गया है।
भोपाल और इंदौर के लिए बनेगा ‘मास्टर प्लान’
इस नई योजना के तहत भोपाल और इंदौर के लिए एक कस्टमाइज्ड मास्टर प्लान तैयार किया जाएगा।
सरकार का पूरा ध्यान अब जमीन के नीचे के पानी (Groundwater) के बजाय सतही जल (Surface Water) यानी नदियों, तालाबों और डैम के पानी का सही इस्तेमाल करने पर है।
आने वाले समय में आबादी बढ़ने के साथ पानी की जरूरतें भी बढ़ेंगी, इसी बात को ध्यान में रखकर यह पूरी प्लानिंग की जा रही है।
इसके तहत शहरों के आसपास मौजूद पुराने तालाबों की मरम्मत की जाएगी, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाएगी और जल स्रोतों को बचाकर रखा जाएगा ताकि गर्मियों में भी लोगों को पानी के लिए तरसना न पड़े।
जल निगम का बदला नाम, अब सीवेज साफ करने पर रहेगा पूरा फोकस
प्रशासनिक स्तर पर सरकार ने एक बहुत बड़ा बदलाव किया है।
MP Water Crisis: अब तक जिसे हम ‘जल निगम’ के नाम से जानते थे, उसका नाम बदलकर अब ‘जल एवं सीवेज प्रबंधन बोर्ड’ कर दिया गया है।
सिर्फ नाम ही नहीं बदला, बल्कि अब इस बोर्ड की जिम्मेदारी और काम भी बदल गए हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बैठक में माना कि शहरों में पुरानी सीवरेज योजनाओं में बहुत सी कमियाँ हैं, जिसकी वजह से दिक्कतें आ रही हैं।
भविष्य में शहरों के सामने गंदा पानी सबसे बड़ी चुनौती बनने वाला है। इसलिए अब नए बोर्ड का मुख्य फोकस सीवेज के सही निपटारे (Sewage Management) पर होगा।
यह नियम सिर्फ शहरों के लिए नहीं बल्कि गांवों के लिए भी लागू होगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि गंदे पानी को सीधे तौर पर नदियों और तालाबों में मिलने से रोका जाएगा, जिससे हमारे जल स्रोत साफ और सुरक्षित रहेंगे।
इंदौर और उज्जैन की बदहाली पर भड़के मुख्यमंत्री
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री का सख्त तेवर भी देखने को मिला।
इंदौर के भागीरथपुरा में पिछले दिनों दूषित पानी पीने की वजह से कई लोग बीमार पड़ गए थे। इस घटना को लेकर सीएम मोहन यादव अधिकारियों पर बेहद नाराज हुए।
उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि ऐसी लापरवाही दोबारा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों पर अब सीधे तौर पर कड़ी कार्रवाई होगी।
उन्होंने आदेश दिए कि हर इलाके में पानी की क्वालिटी की जांच नियमित रूप से की जाए।
इसके साथ ही सीएम ने बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन की जल निकासी (Drainage System) व्यवस्था पर भी गहरी चिंता और नाराजगी जताई।
उन्होंने कहा कि उज्जैन जैसे पवित्र और धार्मिक महत्व वाले शहर की सड़कों पर जब गंदा पानी बहता है, तो देखकर बहुत दुख और शर्म महसूस होती है।
उन्होंने अफसरों को निर्देश दिए हैं कि उज्जैन के लिए तुरंत एक बेहतरीन ड्रेनेज प्लान बनाया जाए और जल भराव की समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जाए।
निजी बोरवेल खोदने पर सरकार की सख्ती, लागू होंगे नए नियम
गर्मियों के मौसम में पानी के गिरते स्तर को सुधारने के लिए सरकार अब कानून को और मजबूत करने जा रही है।
भोपाल मेट्रोपॉलिटन रीजन के जिन इलाकों में पानी की सप्लाई पूरी तरह से सिर्फ बोरवेल पर टिकी है, वहां अब सख्ती की जाएगी।
सरकार की नई नीति के मुताबिक, जिन सूखाग्रस्त इलाकों में जलस्तर (Water Level) बहुत नीचे चला गया है, वहां अब आसपास के 5 किलोमीटर के दायरे में कोई भी नया निजी (Private) बोरवेल नहीं खोद पाएगा।
अगर किसी को बहुत जरूरी काम के लिए बोरवेल करवाना भी है, तो उसके लिए पहले सरकार से बकायदा लिखित में अनुमति (Permission) लेनी होगी।
बिना इजाजत बोरवेल खोदने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
हर घर के लिए ‘वाटर रीचार्ज पिट’ हो सकता है अनिवार्य
जमीन के अंदर पानी के ग्राफ को ऊपर उठाने के लिए सरकार अब बारिश के पानी को सहेजने (Rainwater Harvesting) पर जोर दे रही है।
इसके लिए जल्द ही एक नया नियम आ सकता है, जिसके तहत हर घर में ‘वाटर रीचार्ज पिट’ (Water Recharge Pit) बनाना जरूरी कर दिया जाएगा।
ऐसा करने से बारिश का पानी बर्बाद होकर बहने के बजाय सीधे जमीन के अंदर जाएगा, जिससे कुओं और ट्यूबवेल का जलस्तर सुधरेगा।
