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MP में ‘लिव-इन’ पर सरकार की नजर: रजिस्ट्रेशन नहीं कराया तो होगी जेल, जानें UCC का पूरा खाका!

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Madhya Pradesh UCC Bill: मध्य प्रदेश की राजनीति और सामाजिक ढांचे में एक बड़ा बदलाव होने वाला है।

राज्य सरकार अब ‘समान नागरिक संहिता’ यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लागू करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है।

इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में शादी, तलाक, गोद लेना, संपत्ति का बंटवारा और यहां तक कि लिव-इन रिलेशनशिप के लिए भी पूरे प्रदेश में एक जैसा कानून होगा, चाहे व्यक्ति किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो।

लिव-इन रिलेशनशिप: अब छिपकर रहना होगा मुश्किल

प्रस्तावित कानून में सबसे ज्यादा चर्चा ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ को लेकर हो रही है।

सरकार उत्तराखंड और गुजरात के मॉडल को आधार बना सकती है।

नए नियमों के मुताबिक, अगर कोई कपल बिना शादी किए साथ रहना चाहता है, तो उन्हें सरकारी रजिस्ट्रार के पास अपनी जानकारी दर्ज करानी होगी।

यह महज एक औपचारिकता नहीं होगी, बल्कि कानूनी अनिवार्यता होगी।

नियम तोड़ा तो क्या होगा? (सजा का प्रावधान)

इस कानून का सबसे सख्त पहलू इसकी सजा है।

अगर कोई कपल एक महीने से ज्यादा समय तक बिना रजिस्ट्रेशन के साथ रहता है, तो उसे 3 महीने की जेल या 10 हजार रुपये का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

इतना ही नहीं, अगर रजिस्ट्रेशन के दौरान गलत जानकारी दी गई, तो सजा और भी कड़ी हो सकती है।

नोटिस मिलने के बावजूद रजिस्ट्रेशन न कराने पर 6 महीने की कैद और 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।

महिलाओं और बच्चों को मिलेगा सुरक्षा कवच

अक्सर लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को सुरक्षा की कमी महसूस होती है।

नए ड्राफ्ट में प्रावधान है कि अगर पुरुष साथी अपनी लिव-इन पार्टनर को छोड़ देता है, तो महिला अदालत में भरण-पोषण (Maintenance) का दावा कर सकती है।

इसके अलावा, ऐसे रिश्तों से पैदा होने वाले बच्चों को समाज में ‘नाजायज’ नहीं माना जाएगा; उन्हें कानूनी रूप से वैध माना जाएगा और पिता की संपत्ति में पूरा अधिकार मिलेगा।

सबसे बड़ी चुनौती: 21% जनजातीय आबादी

मध्य प्रदेश में UCC लागू करना उतना आसान नहीं है जितना दिखता है।

राज्य की लगभग 21% आबादी जनजातीय (Tribal) है।

प्रदेश में 46 से ज्यादा जनजातियां हैं जिनकी अपनी सदियों पुरानी परंपराएं, विवाह पद्धतियां और सामाजिक नियम हैं।

संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत उन्हें विशेष संरक्षण प्राप्त है।

उत्तराखंड और गुजरात ने अपनी जनजातीय आबादी को UCC से बाहर रखा है क्योंकि उनकी संख्या कम थी।

लेकिन मध्य प्रदेश में जनजातीय वोट बैंक और उनकी संस्कृति को नजरअंदाज करना सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती साबित हो सकता है।

क्या आदिवासियों को इससे बाहर रखा जाएगा या उनके नियमों में बदलाव होगा? यह सबसे बड़ा सवाल है।

विशेषज्ञों की राय

फैमिली काउंसलर और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि लिव-इन को कानूनी दायरे में लाना सुरक्षा के लिहाज से अच्छा है, लेकिन इसकी प्रक्रिया इतनी मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि यह लोगों की निजता (Privacy) में दखल लगने लगे।

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली संभावित कमेटी इन सभी पहलुओं पर विचार कर एक संतुलित ड्राफ्ट तैयार करेगी।

मुख्य बिंदुओं की तालिका

  1. लिव-इन रजिस्ट्रेशन- रजिस्ट्रार के पास अनिवार्य पंजीकरण, नहीं करने पर 3-6 महीने की जेल 
  2. बच्चों के अधिकार- लिव-इन से जन्मे बच्चों को कानूनी मान्यता,संपत्ति में पूर्ण अधिकार 
  3. भरण-पोषण- महिला को पार्टनर से गुजारा भत्ता मांगने का हक, कानूनी सुरक्षा का अहसास 
  4. जनजातीय आबादी- 21% आबादी पर संशय, संवैधानिक अधिकारों का टकराव संभव 

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