MP Nursing Home Fraud: मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य महकमे से एक ऐसी खबर आई है जिसने सबको हैरान कर दिया है।
इसे आप चमत्कार कहें या धांधली, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक सूबे के कुछ डॉक्टर ‘सुपरमैन’ बन गए हैं।
वे एक ही समय में भोपाल में भी मौजूद हैं और उसी वक्त सैकड़ों किलोमीटर दूर रीवा, सतना या सीधी के अस्पतालों में भी मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
नियमों की धज्जियां उड़ाते इस खेल ने मध्यप्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
नियम बहुत सीधा है: किसी भी निजी अस्पताल या नर्सिंग होम को चलाने के लिए सरकार से रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है।
इस रजिस्ट्रेशन के लिए अस्पताल को एक ‘फुल-टाइम’ डॉक्टर का नाम देना अनिवार्य होता है, जो वहां मौजूद रहकर मरीजों की देखरेख करे।
नियम यह भी कहता है कि एक डॉक्टर एक वक्त में केवल एक ही मुख्य अस्पताल से जुड़ा हो सकता है।
लेकिन हकीकत में एक बड़ा ‘सिंडिकेट’ काम कर रहा है।
जांच में पता चला है कि कई रसूखदार डॉक्टरों के नाम और रजिस्ट्रेशन नंबरों का इस्तेमाल एक साथ कई-कई अस्पतालों को वैध दिखाने के लिए किया जा रहा है।
यानी कागजों पर तो डॉक्टर मौजूद है, लेकिन अस्पताल में वह कभी नजर नहीं आता।
इन ‘सुपरमैन’ डॉक्टरों के कारनामे देखिए
इस फर्जीवाड़े में कुछ नाम ऐसे निकलकर सामने आए हैं जिन्हें सुनकर जांच अधिकारी भी चकरा गए हैं:
डॉ. राजन जॉन:
रिकॉर्ड बताते हैं कि ये महाशय एक साथ 7 अलग-अलग अस्पतालों (अर्पण नेत्र, महेश्वरी, आयुष, केयर एंड क्योर, तृप्ति, अनंतश्री और चरक अस्पताल) में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
डॉ. अरुण मैती:
इन्होंने तो रिकॉर्ड ही तोड़ दिया। इनका नाम 3 अस्पतालों के साथ-साथ 17 पैथोलॉजी लैब में दर्ज है। इनका रसूख भोपाल से लेकर शाजापुर, रीवा, राजगढ़ और सीधी तक फैला है।
डॉ. कृष्ण भारंग और डॉ. नीरज गुप्ता:
ये दोनों भी पीछे नहीं हैं। डॉ. भारंग का नाम 5 अलग-अलग जिलों के अस्पतालों में है, तो डॉ. गुप्ता भोपाल के ही 5 बड़े अस्पतालों में ‘कागजी’ सेवा दे रहे हैं।
डॉक्टरों की सफाई: “हमें तो पता ही नहीं!”
जब इस मामले का खुलासा हुआ और इन डॉक्टरों से सवाल पूछे गए, तो उनके जवाब और भी चौंकाने वाले थे।
डॉ. भारंग का कहना है कि उन्होंने कभी किसी अस्पताल को अपनी सहमति (Consent) ही नहीं दी।
वहीं डॉ. मैती ने सारा ठीकरा एक सॉफ्टवेयर डेवलपर पर फोड़ दिया है।
अब सवाल यह है कि अगर डॉक्टरों ने सहमति नहीं दी, तो उनके डिग्री के दस्तावेज और रजिस्ट्रेशन नंबर अस्पतालों तक कैसे पहुंचे?
क्या यह डॉक्टरों की मिलीभगत है या उनके दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर कोई बड़ा गिरोह काम कर रहा है?
मरीजों की जान पर मंडराता खतरा
यह सिर्फ कागजी हेराफेरी नहीं है, बल्कि सीधे-सीधे आम आदमी की जान से खिलवाड़ है।
सोचिए, अगर किसी अस्पताल में कोई इमरजेंसी केस आता है और वहां वह डॉक्टर मौजूद ही नहीं है जिसके नाम पर अस्पताल चल रहा है, तो मरीज का क्या होगा?
छोटे शहरों में निजी अस्पताल सिर्फ लाइसेंस लेने के लिए इन बड़े डॉक्टरों के नाम का सहारा लेते हैं, जबकि वहां इलाज अप्रशिक्षित स्टाफ या झोलाछाप डॉक्टरों के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
समाधान: डिजिटल सिस्टम की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक स्वास्थ्य विभाग अपनी प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और ‘रियल-टाइम’ नहीं करेगा, यह खेल चलता रहेगा।
एक ऐसा पोर्टल होना चाहिए जहां डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन नंबर डालते ही पता चल जाए कि वह वर्तमान में कहां कार्यरत है।
यदि वह एक जगह रजिस्टर्ड है, तो सिस्टम उसे दूसरी जगह ‘लिंक’ करने की अनुमति ही न दे।
फिलहाल, भोपाल के सीएमएचओ डॉ. मनीष शर्मा ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच बिठा दी है।
अब देखना यह है कि क्या इन ‘कागजी डॉक्टरों’ और फर्जीवाड़ा करने वाले अस्पतालों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा।
