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मध्य प्रदेश ने पराली जलाने में पंजाब-हरियाणा को भी छोड़ा पीछे, विदिशा-उज्जैन सबसे आगे

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Parali Burning in MP: मध्य प्रदेश, जिसे ‘भारत का सोया राज्य’ और ‘गेहूं का कटोरा’ कहा जाता है, अब एक ऐसी उपलब्धि के कारण चर्चा में है जो चिंताजनक है।

हालिया सरकारी आंकड़ों ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि गेहूं की पराली (फसल अवशेष) जलाने के मामले में मध्य प्रदेश अब देश में नंबर वन बन गया है।

पंजाब और हरियाणा, जो कभी इस समस्या के केंद्र माने जाते थे, अब एमपी के मुकाबले काफी पीछे नजर आ रहे हैं।

आंकड़ों की जुबानी: एमपी की डरावनी तस्वीर

कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस (CREAMS) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के ताजा डेटा के मुताबिक, अप्रैल 2026 के शुरुआती 21 दिनों में ही देश के 5 प्रमुख राज्यों में कुल 29,167 मामले दर्ज किए गए।

हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 69% यानी 20,164 घटनाएं हैं।

तुलनात्मक रूप से देखें तो उत्तर प्रदेश 8,889 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि पंजाब और हरियाणा में यह संख्या 100 के भीतर सिमट गई है।

कृषि मंत्री का क्षेत्र ही ‘हॉटस्पॉट’

सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि देश के केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का संसदीय क्षेत्र विदिशा इस सूची में सबसे ऊपर है।

विदिशा में 21 अप्रैल तक 2,086 घटनाएं दर्ज की गईं। इसके बाद मुख्यमंत्री के गृह जिले उज्जैन (2,053 मामले) और रायसेन (1,982 मामले) का नंबर आता है।

होशंगाबाद और सिवनी जैसे जिले भी इस आग की चपेट में हैं।

जानकारों का मानना है कि अगर यही रफ्तार रही, तो 2025 का रिकॉर्ड भी इस साल टूट सकता है।

किसान आखिर पराली जला क्यों रहे हैं?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे ‘समय की कमी’ सबसे बड़ा कारण है।

मध्य प्रदेश में किसान गेहूं की कटाई के तुरंत बाद ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई की तैयारी करते हैं।

कटाई और अगली बुवाई के बीच समय बहुत कम होता है।

खेत साफ करने के लिए पारंपरिक तरीके महंगे और समय लेने वाले होते हैं, इसलिए किसान माचिस की एक तीली से खेत साफ करने का सबसे सस्ता और आसान (लेकिन हानिकारक) रास्ता चुनते हैं।

क्या हैं सुरक्षित विकल्प?

पराली जलाना न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरक शक्ति को भी खत्म कर देता है।

इसके समाधान के रूप में किसान निम्नलिखित उपाय अपना सकते हैं:

  1. आधुनिक मशीनें: सुपरसीडर, रोटावेटर और मल्चर जैसी मशीनें पराली को जमीन में ही मिला देती हैं।
  2. पशु चारा: गेहूं की पराली (भूसा) पशुओं के लिए बेहतरीन चारा है, इसे बेचकर अतिरिक्त कमाई की जा सकती है।
  3. पूसा डीकंपोजर: यह एक सस्ता घोल है, जिसका छिड़काव करने पर पराली खाद में बदल जाती है।

कानूनी कार्रवाई और जुर्माना

प्रशासन ने पराली जलाने पर सख्त पाबंदी लगा रखी है।

नियमों का उल्लंघन करने पर किसानों पर 2,500 रुपये से लेकर 15,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

बार-बार गलती करने पर जेल और अन्य कानूनी कार्रवाइयों का भी प्रावधान है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन नियमों का असर कम ही दिख रहा है।

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