MP Digital Education Crisis: मध्य प्रदेश, जिसे देश का ‘हृदय प्रदेश’ कहा जाता है, आज शिक्षा के मोर्चे पर एक गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है।
नीति आयोग द्वारा हाल ही में जारी की गई “स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया 2026” की रिपोर्ट ने राज्य के सरकारी और निजी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की पोल खोलकर रख दी है।
एक तरफ जहां देश ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ की बात कर रहा है, वहीं मध्य प्रदेश के हजारों स्कूल आज भी बिजली और इंटरनेट जैसी प्राथमिक सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

इंटरनेट और स्मार्ट क्लास: दावों और हकीकत में बड़ा अंतर
डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच नीति आयोग के आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
मध्य प्रदेश के कुल 1,22,120 स्कूलों में से लगभग 67,532 स्कूलों में इंटरनेट कनेक्शन ही नहीं है।
यानी राज्य के आधे से भी कम (केवल 45.7%) स्कूलों में इंटरनेट पहुंच पाया है।
यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (63.5%) से 18 प्रतिशत कम है।

स्मार्ट क्लासरूम के मामले में तो स्थिति और भी दयनीय है।
राज्य के 98,184 स्कूलों में स्मार्ट क्लास की कोई व्यवस्था नहीं है।
स्मार्ट क्लास सुविधा के मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश में 28वें स्थान पर है।
बिहार, असम और ओडिशा जैसे राज्य, जो कभी बुनियादी ढांचे में मध्य प्रदेश से पीछे हुआ करते थे, अब इंटरनेट और तकनीक के मामले में काफी आगे निकल चुके हैं।

बिजली और कंप्यूटर: अब भी ‘अंधेरे’ में हजारों छात्र
हैरानी की बात यह है कि 2026 में भी मध्य प्रदेश के 14,900 स्कूलों में काम करने वाली बिजली की आपूर्ति नहीं है।
हालांकि, पिछले 10 वर्षों में राज्य ने 26% से 87% तक का सफर तय किया है, लेकिन आज भी लगभग 15 हजार स्कूलों का बिना बिजली के चलना यह बताता है कि ‘अंतिम छोर तक विकास’ का लक्ष्य अभी कोसों दूर है।
कंप्यूटर शिक्षा के बिना आज के दौर में करियर की कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन मध्य प्रदेश के करीब 49,800 स्कूलों में एक भी कंप्यूटर नहीं है।

राज्य के केवल 59.2% स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा है, जो राष्ट्रीय औसत 64.7% से काफी कम है।
शिक्षकों की कमी और ड्रॉपआउट की समस्या
बुनियादी ढांचे के अलावा, शिक्षा की गुणवत्ता का सबसे महत्वपूर्ण आधार ‘शिक्षक’ होता है।
रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में शिक्षकों के 52,019 पद खाली पड़े हैं। स्कूलों में गुरुजी ही नहीं होंगे, तो पढ़ाई कैसे होगी?
यही कारण है कि राज्य में छात्रों के स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर चिंताजनक है।
कक्षा 10वीं के बाद हर 100 में से 17 छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं।

शिक्षकों की कमी और स्कूलों में सुविधाओं के अभाव ने छात्रों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है।
शौचालयों की स्थिति: स्वच्छता अभियान को झटका
प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान के बावजूद मध्य प्रदेश के स्कूलों में शौचालयों की स्थिति संतोषजनक नहीं है।
लगभग 15,600 स्कूलों में लड़कों के लिए और 13,900 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है।
यह न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि लड़कियों के ड्रॉपआउट रेट बढ़ने का एक प्रमुख कारण भी है।

10 सालों की प्रगति और वर्तमान चुनौतियां
यदि हम 2014-15 से तुलना करें, तो निश्चित रूप से सुधार हुआ है।
बिजली की उपलब्धता 26% से बढ़कर 87% हुई और कंप्यूटर की सुविधा 14% से बढ़कर 59% हुई।
लेकिन समस्या यह है कि अन्य राज्यों ने मध्य प्रदेश की तुलना में बहुत तेजी से तरक्की की है।
तमिलनाडु, केरल और यहां तक कि अब बिहार जैसे राज्य भी कई मानकों पर एमपी को पछाड़ रहे हैं।

नीति आयोग की यह रिपोर्ट मध्य प्रदेश सरकार के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है।
यूडाइस प्लस 2024-25 और परख 2024 के इन आंकड़ों से साफ है कि केवल योजनाएं बनाना काफी नहीं है, उनका धरातल पर क्रियान्वयन भी जरूरी है।
यदि मध्य प्रदेश को सच में विकसित राज्यों की श्रेणी में आना है, तो उसे सबसे पहले अपने 52 हजार खाली पड़े शिक्षक पदों को भरना होगा और स्कूलों में बिजली-इंटरनेट जैसी बुनियादी जरूरतों को अनिवार्य रूप से पूरा करना होगा।
बिना इसके, डिजिटल शिक्षा का सपना महज एक कोरी कल्पना ही बना रहेगा।
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