No Insurance No Fuel: देश की सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियों और सड़क हादसों में घायलों को मिलने वाले मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और अहम रुख अपनाया है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि जिन वाहनों का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस वैलिड नहीं होगा, उन्हें पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जाएगा।
अदालत ने इसके लिए केंद्र सरकार को एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया है।
इसके अलावा, नई गाड़ियाँ खरीदने वालों के लिए भी अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की समय सीमा बढ़ा दी गई है।

आइए जानते हैं कि कोर्ट के इस निर्देश के क्या मायने हैं और इसका आम आदमी पर क्या असर पड़ने वाला है।
पेट्रोल-डीजल न मिलने की व्यवस्था कैसे काम करेगी?
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (IRDA) और सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्रालय मिलकर इस व्यवस्था पर काम करेंगे।
* ANPR कैमरों से होगी चेकिंग: देश के प्रमुख पेट्रोल पंपों और मुख्य सड़कों पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) कैमरे लगाए जाएंगे।
* डेटाबेस से लिंकेज: ये कैमरे गाड़ियाँ आते ही उनके नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे और उसे इंश्योरेंस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (IIB) तथा केंद्र सरकार के VAHAN (वाहन) पोर्टल के डेटा से रियल-टाइम में मैच करेंगे।
* फ्यूल देने से इनकार: यदि VAHAN पोर्टल पर गाड़ी का इंश्योरेंस ‘एक्सपायर’ या अमान्य दिखता है, तो पेट्रोल पंप कर्मचारी उस गाड़ी में फ्यूल भरने से मना कर देगा।
गाड़ी मालिक को ईंधन तभी मिलेगा जब वह अपनी गाड़ी का इंश्योरेंस रिन्यू करा लेगा।

पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय ने इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी सहमति जता दी है।
नई कार और बाइक के इंश्योरेंस नियमों में क्या बदलाव हुआ?
कोर्ट ने नई गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन के समय खरीदे जाने वाले अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस की समय सीमा को 1 साल के लिए बढ़ा दिया है:
* नई कार: अब कार खरीदते समय 3 साल के बजाय 4 साल का अनिवार्य थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस लेना होगा।
* नई बाइक/स्कूटी: अब दोपहिया वाहनों के लिए 5 साल के बजाय 6 साल का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस लेना जरूरी होगा।

यह कदम क्यों उठाया गया?
साल 2018 में पहली बार कारों के लिए 3 साल और बाइक्स के लिए 5 साल का लॉन्ग-टर्म इंश्योरेंस नियम लागू किया गया था।
लेकिन 8 साल बीत जाने के बाद भी यह देखा गया कि शुरुआती अवधि खत्म होते ही लोग इंश्योरेंस रिन्यू नहीं कराते।
इसी लापरवाही को रोकने के लिए समय सीमा को एक-एक साल बढ़ा दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट को इतना सख्त फैसला क्यों लेना पड़ा?
स्टैंडिंग कमेटी ऑन फाइनेंस (2024-25) और कोर्ट में पेश की गई रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
देश की सड़कों पर चलने वाले वाहनों में से लगभग 56% गाड़ियों के पास कोई बीमा ही नहीं है।

जब बिना बीमा वाली गाड़ियों से सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, तो पीड़ितों या उनके परिजनों को उचित और समय पर मुआवजा पाने के लिए सालों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
खासकर उन परिवारों के लिए जीवन बेहद मुश्किल हो जाता है जहाँ हादसे में घर का इकलौता कमाने वाला व्यक्ति अपनी जान गंवा देता है या हमेशा के लिए दिव्यांग हो जाता है।
मोटर व्हीकल एक्ट (MVA) की धारा 146 के तहत थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस अनिवार्य है ताकि हादसों में प्रभावित तीसरे पक्ष (Third Party) को तुरंत वित्तीय सुरक्षा दी जा सके।

सड़क पर पुलिस चेकिंग और टोल प्लाजा के लिए नए निर्देश
पुलिस को मिलेंगे डिजिटल टूल:
वर्तमान में पुलिस के पास मौके पर इंश्योरेंस चेक करने का एक समान साधन नहीं होता।
अब राज्य पुलिस कर्मियों को ऐसे हैंडहेल्ड डिवाइसेज और मोबाइल एप्स दिए जाएंगे जो सीधे VAHAN और IIB डेटाबेस से जुड़े होंगे।
इससे पुलिस मौके पर ही ऑनलाइन चालान (E-challan) काट सकेगी।
टोल प्लाजा पर नहीं लगेगी कतार:
नेशनल हाईवे पर टोल प्लाजा पर लगने वाले जाम से निपटने के लिए कोर्ट ने चुनिंदा कॉरिडोर पर ANPR कैमरों से लैस ऑटोमैटिक सिस्टम लागू करने को कहा है, ताकि गाड़ियां बिना रुके सीधे गुजर सकें और उनके डेटा की जांच भी हो जाए।

ग्राहकों को मिलेंगे मनपसंद बीमा चुनने के विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने IRDA को यह भी निर्देश दिया है कि वह इंश्योरेंस कंपनियों से कहे कि वे वाहन मालिकों को फ्लेक्सिबल और कस्टमाइज्ड पॉलिसी ऑप्शन दें।
इसका मतलब है कि वाहन चालक अनिवार्य बेस थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के साथ अपनी पसंद के अनुसार पर्सनल एक्सीडेंट कवर, ओन-डैमेज (OD) कवर और अन्य एड-ऑन्स चुन सकेंगे।
थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस आखिर होता क्या है?
थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस वह कानूनी कवर है जो आपकी गाड़ी से किसी तीसरे व्यक्ति, उसकी गाड़ी या संपत्ति को नुकसान पहुँचने पर वित्तीय भरपाई करता है।
इसमें आपकी अपनी गाड़ी के नुकसान का रिपेयरिंग खर्च शामिल नहीं होता, लेकिन सामने वाले व्यक्ति के नुकसान की जिम्मेदारी बीमा कंपनी उठाती है।
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