Supreme Court on two child policy: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देश की जनसंख्या और चुनाव लड़ने के नियमों को लेकर एक बेहद अहम टिप्पणी की है।
अदालत का मानना है कि जिन कानूनों के तहत दो से ज्यादा बच्चे होने पर किसी भी नागरिक को स्थानीय चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता था, अब उनकी कोई खास जरूरत नहीं रह गई है।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ऐसे कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं और बदलती हुई परिस्थितियों के हिसाब से इनकी समीक्षा करने का वक्त आ गया है।

बढ़ती आबादी का डर खत्म
दरअसल, एक समय था जब देश में बढ़ती आबादी को विकास के रास्ते में एक बड़े खतरे के रूप में देखा जाता था।
इसी डर के चलते कई राज्यों ने ऐसे नियम बनाए थे कि जिनके दो से ज्यादा बच्चे होंगे, वे पंचायत या स्थानीय निकाय के चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।
इसके पीछे मकसद लोगों को कम बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करना था।
लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
प्रजनन दर 3 से गिरकर 1.9 पर पहुंची
सुप्रीम कोर्ट ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि साल 2003 में भारत की प्रजनन दर (फर्टिलिटी रेट) 3 हुआ करती थी, जो अब घटकर महज 1.9 पर आ गई है।
इसका सीधा सा मतलब है कि लोग अब खुद ही कम बच्चे पैदा कर रहे हैं और आबादी तेजी से नहीं बढ़ रही है।

कामकाजी आबादी घटेगी, बुजुर्ग बढ़ेंगे
अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि अगर हम सिर्फ आबादी रोकने पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते रहे, तो भविष्य में देश के सामने एक नई और गंभीर मुसीबत खड़ी हो सकती है।
वह मुसीबत है- बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और काम करने वाले युवाओं की कमी।
जब जन्म दर तेजी से घटती है, तो आगे चलकर कामकाजी आबादी का हिस्सा कम होने लगता है और बुजुर्गों की देखभाल का बोझ बढ़ जाता है।
जनसांख्यिकीय बदलावों पर कोर्ट की चिंता
अदालत ने बहुत ही आसान भाषा में समझाया कि किसी भी देश की जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर सबसे सही मानी जाती है।
इसे ‘रिप्लेसमेंट रेट’ कहते हैं, जिससे एक पीढ़ी आसानी से दूसरी पीढ़ी की जगह ले लेती है।
लेकिन हमारी दर इससे भी नीचे (1.9) जा चुकी है।

दो बच्चों की शर्त राजनीतिक और प्रजनन अधिकारों का सीधा उल्लंघन
इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच कर रही थी।
सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने साल 2003 के उस पुराने फैसले को अब एक बड़ी बेंच के पास भेजने का निर्णय लिया है, जिसमें हरियाणा सरकार के ‘दो बच्चों वाले नियम’ को सही ठहराया गया था।
कोर्ट का कहना है कि सिर्फ बच्चों की संख्या के आधार पर नागरिकों के एक बड़े वर्ग को चुनाव लड़ने या राजनीतिक अधिकारों से दूर रखना पूरी तरह गलत है।
एक इंसान कितने बच्चे पैदा करता है, इसका उसकी सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता या जनसेवा करने से कोई लेना-देना नहीं है।
यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले ‘प्रजनन स्वायत्तता’ (रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी) के अधिकार का उल्लंघन है।

ऐसे नियम लोगों को मजबूर करते हैं कि वे चुनाव लड़ने और बच्चे पैदा करने के निजी फैसले में से किसी एक को चुनें।
महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच को राहत: तीसरे बच्चे के कारण ठहराई गई थीं अयोग्य
यह पूरा मामला महाराष्ट्र की एक पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा हुआ है।
मंगला महाराष्ट्र के काकोड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच चुनी गई थीं, लेकिन उन्हें महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत इसलिए अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि उनका तीसरा बच्चा हुआ था।
जब उनके खिलाफ कलेक्टर के पास शिकायत पहुंची, तो उन्हें पद से हटा दिया गया।
उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 5 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी अयोग्यता बरकरार रखी।

इसके बाद मंगला ने न्याय की उम्मीद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
4 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से सुना और हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए मंगला की अयोग्यता को रद्द कर दिया
किन राज्यों में आज भी लागू है यह नियम और कहां हो चुका है खत्म?
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि देश के किन-किन राज्यों में अभी भी यह नियम लागू है।
एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट के अनुसार, 7 राज्यों ने इस दो बच्चों की शर्त को अब पूरी तरह खत्म कर दिया है।
इसके अलावा 15 राज्य ऐसे हैं, जहां कभी ऐसी कोई नीति लागू ही नहीं की गई।
हालांकि, असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे छह राज्यों में यह पाबंदी आज भी चल रही है।

अदालत ने साफ कर दिया है कि पुराने कानूनों को बदलने या उन पर दोबारा विचार करने का समय आ गया है ताकि बदलते सामाजिक और जनसांख्यिकीय बदलावों (डेमोग्राफिक चेंजेस) के बीच किसी भी नागरिक को उसके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित न होना पड़े।
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