Ujjain Khade Hanuman Temple: मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के तहत सड़कों को चौड़ा करने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है।
शहर के कंठाल चौराहे से छत्री चौक (नई पैठ स्थित सती गेट) के बीच सड़क को लगभग 15 मीटर चौड़ा किया जा रहा है।
इसी मार्ग के दायरे में प्रसिद्ध ‘खड़े हनुमान मंदिर’ का ढांचा आ रहा था।
प्रशासन ने सड़क विस्तार के लिए मंदिर के ऊपरी भवन और गारे-गारे से बनी दीवारों को तो ध्वस्त कर दिया, लेकिन जब मुख्य प्रतिमा को स्थानांतरित करने की बारी आई, तो सभी आधुनिक संसाधन और मशीनें जवाब दे गईं।
लगातार 10 दिनों तक भारी-भरकम जेसीबी, हाइड्रोलिक क्रेन और कटर मशीनों का इस्तेमाल करने के बावजूद भगवान हनुमान की यह प्रतिमा अपनी जगह से 1 इंच भी नहीं हिली।
लगातार मिल रही असफलता और श्रद्धालुओं के बढ़ते विरोध के बाद अब नगर निगम और जिला प्रशासन ने जबरन की जा रही कार्रवाई पर रोक लगा दी है।
प्रतिमा की गहराई, उसकी नींव की बनावट और आसपास की जमीनी संरचना का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर के तकनीकी विशेषज्ञों की एक विशेष टीम को आमंत्रित किया गया है।
IIT इंदौर की टीम ने शुरू किया वैज्ञानिक परीक्षण
मंगलवार को IIT इंदौर के विशेषज्ञों ने सती गेट पहुंचकर लगभग दो घंटे तक विशेष उपकरणों के जरिए ग्राउंड-स्कैनिंग और तकनीकी जांच की।
एक्सपर्ट्स यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रतिमा का आधार जमीन के भीतर कितना गहरा है, यह किसी अखंड चट्टान से जुड़ी है या इसके नीचे कोई विशेष प्राचीन ढांचा मौजूद है।
नगर निगम कमिश्नर अभिलाष मिश्रा के अनुसार, मंदिर के पुजारी और श्रद्धालुओं के आग्रह पर ही तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है।
IIT इंदौर की विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही यह तय किया जाएगा कि इस ऐतिहासिक और धार्मिक प्रतिमा को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित करना संभव है या नहीं।
प्रशासन का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि भारी दबाव के कारण प्रतिमा में कोई दरार न आए या उसे कोई नुकसान न पहुंचे।
1000 साल पुरानी हो सकती है प्रतिमा, परमारकालीन तकनीक का अनुमान
विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के प्रसिद्ध पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. डॉ. रमण सोलंकी का कहना है कि यह प्रतिमा लगभग 1000 वर्ष पुरानी हो सकती है।
उनके अनुसार, मालवा क्षेत्र में राजा भोज और परमार वंश के शासनकाल (10वीं से 11वीं शताब्दी) के दौरान मजबूत बेसाल्ट (Basalt) पत्थरों पर इस प्रकार की विशाल कलाकृतियां और प्रतिमाएं बनाने की परंपरा रही है।
पुरातात्विक अध्ययन दर्शाते हैं कि प्राचीन काल में भारी और विशाल प्रतिमाओं को स्थापित करने के लिए ‘इंटरलॉक तकनीक’ (Interlock Technique) का प्रयोग किया जाता था, जिसमें पत्थरों को इस तरह आपस में जोड़ा जाता था कि वे सदियों तक अपनी जगह पर अडिग रहें।
लंबे समय से लगातार सिंदूर चढ़ाए जाने के कारण प्रतिमा का मूल रूप और उसकी भाव-भंगिमाएं स्पष्ट नहीं दिखती हैं, लेकिन पत्थर की मजबूती और इसकी बनावट इसके परमारकालीन होने की ओर इशारा करती है।
भक्तों के लिए ‘डॉक्टर हनुमान’ और मंदिर है ‘उज्जैन का AIIMS’
स्थानीय श्रद्धालुओं और भक्तों के लिए यह केवल किसी प्रतिमा को विस्थापित करने का प्रशासनिक मामला नहीं है। वर्षों से इस मंदिर के प्रति लोगों में अगाध आस्था रही है।
स्थानीय लोग इस मंदिर को ‘उज्जैन का एम्स’ और भगवान को ‘डॉक्टर हनुमान’ के नाम से पुकारते हैं।
मंदिर के मुख्य पुजारी महेश बैरागी बताते हैं कि यहां बरसों से छोटे और गंभीर रूप से बीमार बच्चों के स्वास्थ्य लाभ के लिए झाड़नी दी जाती है और ताबीज बांधे जाते हैं।
पुजारी ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक बच्चे के लिवर ट्रांसप्लांट के लिए परिवार उसे एयर एंबुलेंस से दिल्ली ले जाने का प्रयास कर रहा था, लेकिन हर बार उसकी हालत बिगड़ जाती थी।
जब परिजनों ने मंदिर में आकर भगवान का ताबीज बांधा, तो बच्चा सकुशल दिल्ली पहुंचा और उसका सफल ट्रांसप्लांट हुआ।
मुस्लिम समाज के लोग भी आते हैं मन्नत मांगने
सती गेट स्थित ‘खड़े हनुमान’ की ख्याति केवल एक वर्ग तक सीमित नहीं है।
स्थानीय निवासी शिवेंद्र तिवारी के मुताबिक, मंदिर में मुस्लिम समाज के परिवार भी पूरी आस्था के साथ मन्नत मांगने पहुंचते हैं।
जिन परिवारों में लंबे समय से संतान नहीं होती या जो किसी गंभीर शारीरिक-मानसिक बीमारी से जूझ रहे होते हैं, वे यहां आकर धागा और ताबीज बनवाते हैं।
यही कारण है कि प्रतिमा को क्रेन और जेसीबी से हटाने के प्रयासों के दौरान हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदायों के लोगों में प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर चिंता देखी गई।
सुरक्षा के लिए लगाया गया टेंट, राम मंदिर के दौर से जोड़ रहे भक्त
मंदिर का ऊपरी ढांचा टूट जाने के बाद प्रतिमा खुली जगह में आ गई थी।
इसे बारिश, धूप और किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए प्रशासन ने प्रतिमा के ऊपर एक विशाल टेंट (केनोपी) लगा दिया है।
श्रद्धालु इसे अयोध्या के राम मंदिर के दौर से जोड़कर देख रहे हैं।
उनका कहना है कि जिस तरह एक समय मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम को टेंट में विराजित रहना पड़ा था, उसी तरह आज उनके परम भक्त ‘खड़े हनुमान’ भी टेंट के नीचे विराजमान हैं।
रोजाना हजारों की संख्या में भक्त यहां हनुमान चालीसा का पाठ करने और दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
पुजारी और इतिहासकारों का रुख
मंदिर के पुजारी महेश बैरागी का स्पष्ट कहना है कि उनका या भक्तों का प्रशासन के विकास कार्यों से कोई विरोध नहीं है।
वे केवल यह चाहते हैं कि बिना किसी जल्दबाजी और बिना किसी नुकसान के आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्रतिमा की प्रामाणिक जांच हो।
यदि विशेषज्ञ कोई सुरक्षित तरीका बताते हैं, तो ही विस्थापन किया जाए।
वहीं इतिहासकार भगवती लाल राजपुरोहित का मानना है कि वैज्ञानिक जांच के बिना कोई भी अनुमान लगाना सही नहीं होगा।
IIT इंदौर की वैज्ञानिक रिपोर्ट आने के बाद ही आगे का रास्ता साफ हो सकेगा।
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