Shipra River Construction Ban: मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में साल 2028 में सिंहस्थ महाकुंभ का आयोजन होने वाला है।
इस पावन अवसर पर दुनिया भर से करोड़ों श्रद्धालु मोक्ष की कामना लेकर शिप्रा नदी में डुबकी लगाने आते हैं।
जहाँ एक तरफ प्रशासन इस भव्य आयोजन की तैयारियों में दिन-रात एक कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग नदी किनारे रिसॉर्ट और होटल बनाकर भारी मुनाफा कमाने की ताक में थे।
लेकिन अब इन ‘हवाई सपनों’ पर हाई कोर्ट ने पानी फेर दिया है।
क्या है हाई कोर्ट का आदेश?
हाल ही में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि शिप्रा नदी के किनारे 200 मीटर के दायरे में कोई भी नया व्यावसायिक निर्माण नहीं होगा।
इसका मतलब यह है कि अब नदी के बिल्कुल करीब कोई भी आलीशान होटल, रिसॉर्ट या क्लब नहीं बनाया जा सकेगा।

कोर्ट का यह सख्त रुख उज्जैन निवासी सत्यनारायण द्वारा दायर की गई याचिका के बाद आया है, जिसमें उन्होंने नदी के आसपास हो रहे अवैध निर्माणों और पर्यावरण को होने वाले नुकसान की ओर इशारा किया था।
सिर्फ धर्म की होगी गूंज, नहीं होगा व्यापार
कोर्ट की मंशा एकदम साफ है—शिप्रा को प्रदूषण से बचाना और सिंहस्थ की मर्यादा बनाए रखना।
सरकार और प्रशासन ने सुनवाई के दौरान विकास का जो खाका पेश किया, उसके अनुसार नदी के आसपास के क्षेत्र को दो हिस्सों में बांटा गया है:
1. 0 से 100 मीटर का दायरा: इस क्षेत्र में केवल घाटों का निर्माण, सौंदर्यीकरण और जल संरक्षण के काम होंगे ताकि नदी का किनारा सुंदर और स्वच्छ दिखे।
2. 100 से 200 मीटर का दायरा: यहाँ केवल मठ, आश्रम, धर्मशालाएं और प्रवचन हॉल जैसी धार्मिक और सेवाभावी संस्थाओं को ही अनुमति मिल सकती है।
यहाँ किसी भी तरह का रिसॉर्ट या कमर्शियल एक्टिविटी पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।

क्यों जरूरी था यह फैसला?
सोचिए, यदि नदी के ठीक बगल में बड़े-बड़े रिसॉर्ट बन जाते, तो वहाँ का गंदा पानी, कचरा और रसायनों का बहाव सीधे शिप्रा में जाता।
सिंहस्थ जैसे बड़े आयोजन के दौरान जब साधु-संत और भक्त नदी में स्नान करेंगे, तो उन्हें स्वच्छ जल मिलना उनका अधिकार है।
रिसॉर्ट कल्चर से न केवल नदी का पानी गंदा होता, बल्कि वहाँ की शांति और आध्यात्मिक माहौल भी प्रभावित होता।
अवैध निर्माणों पर अब चलेगा ‘डंडा’
हाई कोर्ट ने केवल भविष्य के निर्माणों पर रोक ही नहीं लगाई है, बल्कि पुराने अवैध निर्माणों पर भी कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
नगर निगम ने कोर्ट को बताया है कि कई अवैध ढांचों को गिरा दिया गया है और कइयों को नोटिस जारी किए गए हैं।

अब प्रशासन को हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा, क्योंकि कोर्ट की सीधी नजर इस पूरे मामले पर है।
हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो आस्था के केंद्र को व्यापार का जरिया बनाना चाहते थे।
यह जीत केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि उन करोड़ों भक्तों की भी है जो शिप्रा को अपनी माँ मानते हैं।
अब सबकी नजरें अगली सुनवाई पर हैं, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि सिंहस्थ 2028 में श्रद्धालुओं को शिप्रा का किनारा ज्यादा स्वच्छ, आध्यात्मिक और सुरक्षित मिलेगा।
