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उर्दू शायरी के बेताज बादशाह- देश के चहेते शायर डॉ. बशीर बद्र का निधन, 91 साल की उम्र में भोपाल में ली आखिरी सांस

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Bashir Badr passes away: उर्दू साहित्य की दुनिया को अपनी आसान शायरी से सजाने वाले डॉ. बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर भोपाल में निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे।

उनके जाने से न केवल उर्दू शायरी का एक बड़ा स्तंभ ढह गया है, बल्कि करोड़ों फैंस के दिलों में एक ऐसा खालीपन आ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा।

बशीर साहब ने अपनी एक बेहद मशहूर गजल में लिखा था— ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।’

आज उनकी यह पंक्तियां सच साबित हो गईं और भोपाल शहर की एक शांत दोपहर में उनकी जिंदगी की शाम हो गई।

डिमेंशिया से जंग और मुशायरे की वो यादें

डॉ. बशीर बद्र पिछले काफी समय से गंभीर बीमारी ‘डिमेंशिया’ से पीड़ित थे। इस बीमारी के कारण उनकी याददाश्त पूरी तरह से चली गई थी।

आलम यह था कि वे अपने बेहद करीबी रिश्तेदारों और दोस्तों को भी पहचान नहीं पा रहे थे।

डॉक्टरों और परिजनों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

भले ही वे दुनिया की बाकी बातें भूल चुके थे, लेकिन शायरी उनके खून में इस कदर रची-बसी थी कि उसे डिमेंशिया भी नहीं मिटा सका।

परिवार के लोग बताते हैं कि जब भी उन्हें अपने पुराने दिनों या मुशायरों की धुंधली सी याद आती, तो वे अचानक महफिल के अंदाज में ‘इरशाद-इरशाद’ पुकारने लगते थे।

यह दिखाता है कि एक शायर के लिए शायरी सिर्फ उसका काम नहीं, बल्कि उसकी रूह होती है।

मुश्किल शब्दों को छोड़, आम बोलचाल को बनाया गजल

बशीर बद्र की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्होंने उर्दू शायरी को किताबी और भारी-भरकम शब्दों के जाल से बाहर निकाला।

उन्होंने महलों और नवाबों की भाषा के बजाय, इसे आम आदमी की भाषा बनाया।

उन्होंने रोजमर्रा की जिंदगी के सुख-दुख, गरीबी, समाज का दर्द और बेपनाह मोहब्बत को ऐसे सीधे-सादे शब्दों में ढाला कि सुनने वाला झूम उठता था।

उन्होंने कभी पारंपरिक शायरी के कड़े और कठिन नियमों में खुद को बांधकर नहीं रखा।

समाज की कड़वी सच्चाई को बयां करता उनका यह शेर आज भी दंगों और नफरत के खिलाफ एक बड़ी आवाज है— ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।’

1974 से 1990: बशीर साहब का ‘गोल्डन एरा’

डॉ. बशीर बद्र की जिंदगी में साल 1974 से लेकर 1990 तक का समय उनके करियर का सबसे चमकीला और सुनहरा दौर (स्वर्णिम काल) माना जाता है।

इस दौरान देश हो या विदेश, हर बड़े मुशायरे की जान बशीर बद्र हुआ करते थे।

अगर उनके शुरुआती सफर की बात करें, तो उन्होंने साल 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पोस्ट ग्रेजुएशन (स्नातकोत्तर) की डिग्री पूरी की थी।

इसके बाद, 12 अगस्त 1974 को उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर अपनी सेवाएं देना शुरू किया। वे यहां साल 1990 तक पढ़ाते रहे।

 

इसी दौर में उनकी शायरी ने कामयाबी की नई ऊंचाइयों को छुआ और वे पूरी दुनिया में मशहूर हो गए।

बशीर बद्र आज भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी लिखी गजलें, उनकी सादगी और उनके शेर आने वाली कई पीढ़ियों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

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