Global Lockdown Again: याद है वो दौर जब कोरोना की वजह से हम सब घरों में कैद हो गए थे? सड़कें खाली थीं और आसमान साफ था।
कुछ वैसा ही नजारा एक बार फिर देखने को मिल सकता है, लेकिन इस बार दुश्मन कोई वायरस नहीं, बल्कि ‘तेल की कमी’ और ‘महंगाई’ है।
मिडिल ईस्ट (खासकर ईरान) में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है।
आखिर हुआ क्या है?
सारा विवाद ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को लेकर है।
यह समुद्र का वो संकरा रास्ता है जहाँ से दुनिया का सबसे ज्यादा कच्चा तेल जहाजों के जरिए गुजरता है।
ईरान के साथ बढ़ते तनाव की वजह से यह रास्ता लगभग बंद होने की कगार पर है।
नतीजा यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 112 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई है।
अमेरिका जैसे देशों में पेट्रोल (गैसोलीन) 5 डॉलर प्रति गैलन बिक रहा है, जिससे वहां के लोगों की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है।
लॉकडाउन जैसी पाबंदियों की तैयारी
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने इस संकट से निपटने के लिए एक ’10-सूत्रीय योजना’ तैयार की है।
इसे नाम दिया गया है— ‘शेल्टरिंग फ्रॉम ऑयल शॉक्स’।
सुनने में तो यह मैनेजमेंट का हिस्सा लगता है, लेकिन इसके अंदर जो सुझाव दिए गए हैं, वो बिल्कुल कोविड लॉकडाउन की याद दिलाते हैं।
IEA ने देशों को सलाह दी है कि:
- लोग फिर से ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) शुरू करें ताकि सड़कों पर गाड़ियां कम चलें।
- हाईवे पर गाड़ियों की स्पीड कम की जाए (ताकि ईंधन कम खर्च हो)।
- हवाई यात्राओं में भारी कटौती की जाए।
- जरूरी न हो तो निजी वाहनों का इस्तेमाल बंद करें।
किन देशों में क्या हो रहा है?
संकट का असर दिखना शुरू हो चुका है।
जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों में ईंधन की ‘राशनिंग’ शुरू हो गई है, यानी आप मर्जी मुताबिक तेल नहीं खरीद पाएंगे।
बांग्लादेश, श्रीलंका और फिलीपींस में पेट्रोल पंपों पर किलोमीटर लंबी लाइनें लग रही हैं।
वहीं, यूनाइटेड एयरलाइंस जैसी बड़ी कंपनियों ने अपनी उड़ानों में 5% तक की कटौती कर दी है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत अपनी जरूरत का करीब 80% तेल इसी समुद्री रास्ते से मंगाता है।
अगर सप्लाई रुकी, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।
इससे न सिर्फ गाड़ी चलाना महंगा होगा, बल्कि ट्रक और माल ढुलाई महंगी होने से सब्जी, फल और राशन के दाम भी बढ़ जाएंगे।
क्या छिन जाएगी आम आदमी की आजादी?
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया और कुछ अन्य देश ‘डिजिटल परमिट’ जैसा सिस्टम लागू कर सकते हैं।
यानी आपको घर से निकलने या सफर करने के लिए डिजिटल अनुमति लेनी पड़ सकती है।
इसे ‘ऊर्जा सुरक्षा’ का नाम दिया जा रहा है, लेकिन हकीकत में यह आम आदमी की आवाजाही पर एक तरह की पाबंदी ही होगी।
अब वक्त आ गया है कि भारत और दुनिया के अन्य देश सोलर पावर, इलेक्ट्रिक वाहनों और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर अपनी निर्भरता तेजी से बढ़ाएं, वरना तेल का यह खेल पूरी दुनिया की रफ्तार रोक देगा।
