Gangaur Puja Date 2026: भारत त्योहारों का देश है, जहां हर उत्सव के पीछे एक गहरा अर्थ और आस्था छिपी होती है।
इन्हीं में से एक प्रमुख पर्व है ‘गणगौर’।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई हिस्सों में मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल एक व्रत नहीं, बल्कि सुहागिनों के विश्वास और कुंवारी कन्याओं की आशाओं का प्रतीक है।
वर्ष 2026 में गणगौर का यह उल्लास धुलेंडी (होली के अगले दिन) से शुरू हो चुका है, जो अगले 16 दिनों तक भक्ति के रंग बिखेरेगा।

क्या है गणगौर और इसका अर्थ?
‘गणगौर’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है— ‘गण’ और ‘गौर’।
यहां ‘गण’ का अर्थ भगवान शिव (ईसर जी) से है और ‘गौर’ का अर्थ माता पार्वती (गौरी) से है।
सरल शब्दों में कहें तो यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन और उनके सुखी वैवाहिक जीवन का उत्सव है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठिन तपस्या की थी।
चैत्र मास के इन दिनों में मां पार्वती अपने पीहर (मायके) आती हैं और उनके विसर्जन के दिन भगवान शिव उन्हें लेने आते हैं।

गणगौर 2026: मुख्य तिथि और शुभ मुहूर्त
इस साल गणगौर का मुख्य पर्व यानी ‘गणगौर तीज’ 21 मार्च 2026 को मनाया जाएगा।
- पूजन प्रारंभ: 4 मार्च 2026 (होली के अगले दिन से)
- तृतीया तिथि शुरू: 21 मार्च 2026, रात 02:30 AM से
- तृतीया तिथि समाप्त: 21 मार्च 2026, रात 11:56 PM तक
- विशेष: गणगौर की पूजा हमेशा सूर्योदय के समय करना सबसे उत्तम माना जाता है।
16 दिनों का कठिन नियम और श्रद्धा
गणगौर का व्रत अन्य व्रतों की तुलना में थोड़ा कठिन और लंबा होता है।
मारवाड़ी और निमाड़ी समाज में इसका विशेष महत्व है। नवविवाहित महिलाएं अपने विवाह के पहले साल इस व्रत को पूरे विधि-विधान से करती हैं।
16 दिनों तक महिलाएं केवल एक समय भोजन करती हैं और प्रतिदिन सुबह मिट्टी के ईसर-गौरी बनाकर उनकी पूजा करती हैं।
गली-मोहल्लों में “गोल-गोल गोमती, ईसर पूजे पार्वती” जैसे पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई देने लगती है।
महिलाएं सोलह श्रृंगार कर, हाथों में मेहंदी रचाकर माता गौरी से अपने अखंड सौभाग्य (पति की लंबी उम्र) की कामना करती हैं, वहीं कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करती हैं।

कच्ची और पक्की गणगौर: एक अनोखी परंपरा
गणगौर पूजन की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है— कच्ची गणगौर और पक्की गणगौर।
- कच्ची गणगौर: होली के अगले दिन से अगले आठ दिनों तक ‘कच्ची गणगौर’ की पूजा होती है। इसमें राख या मिट्टी से बनी पिंडियों की पूजा की जाती है। महिलाएं बगीचों से ताजी मिट्टी और दूब (घास) लाकर पूजन स्थल को सजाती हैं।
- पक्की गणगौर: आठ दिन बीतने के बाद लकड़ी या मिट्टी की सुंदर सजी-धजी मूर्तियों (ईसर और गौरी) की स्थापना होती है, जिन्हें ‘पक्की गणगौर’ कहा जाता है। इन प्रतिमाओं को नए वस्त्र और गहने पहनाए जाते हैं।
पूजन की विधि और ‘ज्वारे’ का महत्व
पूजा के दौरान महिलाएं दीवार पर कुमकुम, हल्दी, काजल और मेहंदी की 16-16 बिंदियां लगाती हैं।
मिट्टी के छोटे-छोटे कलशों में गेहूं या जौ बोए जाते हैं, जिन्हें ‘ज्वारे’ कहा जाता है।
ये ज्वारे समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक होते हैं।
पूजा के अंतिम दिन इन ज्वारों को सिर पर रखकर शोभायात्रा निकाली जाती है और फिर पवित्र जलाशय में इनका विसर्जन किया जाता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
गणगौर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के सामाजिक मेलजोल का भी जरिया है।
सामूहिक रूप से गीत गाना, कहानियां सुनाना और एक-दूसरे को सुहाग सामग्री बांटना इस उत्सव की रौनक बढ़ा देता है
। जयपुर और उदयपुर जैसे शहरों में तो गणगौर की भव्य शाही सवारी निकाली जाती है, जिसे देखने के लिए दुनिया भर से पर्यटक आते हैं।
21 मार्च 2026 को जब माता पार्वती की विदाई (विसर्जन) होगी, तो हर आंख नम होती है, लेकिन दिल में अगले साल फिर से आने की उम्मीद और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद बना रहता है।
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