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छत्तीसगढ़ के जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद इंसाफ: पूर्व CM के बेटे अमित जोगी को उम्रकैद

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

jaggi murder case amit jogi: छत्तीसगढ़ की राजनीति में साल 2003 एक ऐसा मोड़ था जिसने प्रदेश की सत्ता और कानून-व्यवस्था की चूलें हिला दी थीं।

4 जून 2003 की वह शाम जब रायपुर की सड़कों पर गोलियां गूंजीं और एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की हत्या कर दी गई, तब किसी ने नहीं सोचा था कि इसका फैसला आने में दो दशक से ज्यादा का समय लग जाएगा।

आज 23 साल बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को उम्रकैद की सजा सुनाई है।

हाईकोर्ट का सख्त रुख

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद वर्मा की बेंच ने अपने फैसले में कानून की उस बुनियादी परिभाषा को दोहराया है, जिसमें कहा गया है कि ‘न्याय सबके लिए समान है।’

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक ही अपराध में कई लोग शामिल हों और उनके खिलाफ साक्ष्य (सबूत) भी एक जैसे हों, तो किसी एक आरोपी को अलग से राहत नहीं दी जा सकती।

कोर्ट ने माना कि यदि बाकी 28 आरोपियों को उन्हीं सबूतों के आधार पर सजा मिली है, तो अमित जोगी को बरी करना न्यायसंगत नहीं था।

अदालत ने अमित जोगी को धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक साजिश) का दोषी पाते हुए उम्रकैद और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।

जुर्माना न भरने पर उन्हें 6 महीने की अतिरिक्त सजा काटनी होगी।

क्या था रामावतार जग्गी हत्याकांड?

रामावतार जग्गी महज एक कारोबारी नहीं थे, वे कद्दावर नेता विद्याचरण शुक्ल के दाहिने हाथ माने जाते थे।

जब छत्तीसगढ़ राज्य बना, तब राजनीति के समीकरण तेजी से बदल रहे थे। जग्गी उस समय एनसीपी के कोषाध्यक्ष थे।

4 जून 2003 को जब वे अपनी कार से जा रहे थे, तब रायपुर में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई।

इस घटना ने तत्कालीन अजीत जोगी सरकार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी गई।

सीबीआई की जांच और कानूनी दांव-पेंच

सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में चौंकाने वाले खुलासे किए।

जांच में सामने आया कि यह महज एक हत्या नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश थी।

इसमें पुलिस के आला अधिकारी, प्रभावशाली नेता और पेशेवर अपराधी शामिल थे।

साल 2007 में रायपुर की एक विशेष अदालत ने 28 लोगों को तो सजा सुनाई, लेकिन अमित जोगी को ‘सबूतों के अभाव’ में बरी कर दिया।

जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इस हार को स्वीकार नहीं किया और न्याय की लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट तक ले गए।

सालों की कानूनी जद्दोजहद के बाद मामला वापस हाईकोर्ट आया, जहां 11 हजार पन्नों की चार्जशीट और गवाहों के बयानों पर दोबारा गौर किया गया।

कौन-कौन हैं इस मामले में दोषी?

इस हत्याकांड की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केवल अपराधी ही नहीं, बल्कि रक्षक ही भक्षक बन गए थे।

सजा पाने वालों में:

  •  दो तत्कालीन सीएसपी (CSP) स्तर के अधिकारी।
  •  एक थाना प्रभारी।
  •  रायपुर के वर्तमान मेयर एजाज ढेबर के भाई याहया ढेबर।
  •  मुख्य शूटर चिमन सिंह और अन्य सहयोगी।

कुल 31 आरोपियों में से 2 सरकारी गवाह बन गए थे, एक की मृत्यु हो गई और बाकी सभी अब उम्रकैद की सजा काट रहे हैं या काटेंगे।

अमित जोगी के पास अब क्या विकल्प हैं?

हाईकोर्ट ने अमित जोगी को 3 सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब उनके पास केवल सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता बचा है।

हालांकि, हाईकोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद कि ‘साक्ष्य सभी के लिए समान हैं’, उनके लिए राहत पाना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।

देर है पर अंधेर नहीं

रामावतार जग्गी हत्याकांड का यह फैसला उन लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।

यह संदेश भी है कि सत्ता और प्रभाव की धमक कानूनी प्रक्रिया को लंबा तो कर सकती है, लेकिन रोक नहीं सकती।

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में यह फैसला लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

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