SC on Rape Victims Abortion Law: सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया।
एक 15 साल की नाबालिग बच्ची, जो रेप की वजह से 30 हफ्ते (करीब साढ़े सात महीने) की प्रेग्नेंट हो गई थी, उसने गर्भपात की अनुमति मांगी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 24 अप्रैल को उसे अबॉर्शन की इजाजत दे दी थी।
इस फैसले के खिलाफ एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों ने याचिका लगाई थी, क्योंकि भारत का मौजूदा कानून (MTP एक्ट) केवल 24 हफ्ते तक ही गर्भपात की अनुमति देता है।
चीफ जस्टिस की बेंच ने एम्स की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और केंद्र सरकार को एक बड़ी नसीहत दे डाली।
कोर्ट ने कहा कि अब वक्त आ गया है जब सरकार को अपने पुराने नियमों में बदलाव करना चाहिए।
🚨”When there is a pregnancy due to rape, there should not be time limit. Law needs to be organic and in sync with evolving times,” said the Supreme Court of India
The court made the observation while hearing a case on the termination of a 31-week pregnancy of a 15-year-old rape… pic.twitter.com/WHEN1gUWfe
— The Tatva (@thetatvaindia) April 30, 2026
कोर्ट की बड़ी बातें: “भ्रूण बनाम मां की लड़ाई”
सुनवाई के दौरान एम्स के डॉक्टरों ने तर्क दिया था कि 30 हफ्ते का भ्रूण अब एक पूर्ण जीव बन चुका है।
अगर इस स्टेज पर अबॉर्शन किया गया, तो बच्ची की जान को खतरा हो सकता है और शायद वह भविष्य में कभी मां न बन पाए।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, “आपका सारा ध्यान भ्रूण पर है, उस बच्ची पर नहीं जिसने इतना दर्द सहा है।”
कोर्ट ने साफ किया कि यह ‘चाइल्ड रेप’ का मामला है।
एक छोटी बच्ची को उसकी मर्जी के खिलाफ मां बनने के लिए मजबूर करना उसे उम्रभर का मानसिक सदमा (Trauma) देने जैसा है।
“It is a case of child rape. This is an unwanted pregnancy of a 15-year-old child. She should be studying now, but we are forcing her to become a mother. Imagine the pain and humiliation she has suffered.”#SupremeCourt strongly objected to a plea filed by AIIMS seeking to set… pic.twitter.com/U3Auf9zkC3
— The New Indian Express (@NewIndianXpress) April 30, 2026
पैसा और गोद लेना समाधान नहीं
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया था कि अगर बच्ची बच्चे को जन्म देती है, तो उसे गोद (Adoption) दिलाने की व्यवस्था की जा सकती है और परिवार को आर्थिक मदद भी दी जा सकती है।
कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि हम महिलाओं को आर्थिक मदद या गोद लेने के विकल्पों के भरोसे नहीं छोड़ सकते।
फैसला लेने का अधिकार पूरी तरह से पीड़ित महिला या बच्ची का ही होना चाहिए।
Termination of pregnancy: SC also asks Centre to amend law to ensure such rape trials are completed within one week.
Termination of pregnancy: SC asks why should child rape victims suffer trauma of trial for long period.
Termination of pregnancy: AIIMS doctor tells SC that it… pic.twitter.com/R0tdUaj8gJ
— Press Trust of India (@PTI_News) April 30, 2026
कानून में बदलाव की जरूरत क्यों?
भारत में अभी ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट’ लागू है। इसके तहत:
- सामान्य मामलों में 20 हफ्ते तक अबॉर्शन हो सकता है।
- विशेष मामलों (जैसे रेप सर्वाइवर) में यह सीमा 24 हफ्ते है।
- 24 हफ्ते के बाद केवल कोर्ट के आदेश और मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर ही फैसला होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून ऐसा होना चाहिए जो समय के साथ लचीला रहे।
अगर अदालतें सख्त नियम बनाएंगी, तो महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर गैर-कानूनी केंद्रों (Illegal Abortion Centers) पर जाएंगी, जिससे उनकी मौत का खतरा बढ़ जाएगा।

पुराने फैसलों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए बताया कि कब-कब उन्होंने कानून की सीमाओं से परे जाकर फैसले लिए:
- 2024 (महाराष्ट्र): 14 साल की बच्ची को 30 हफ्ते में अबॉर्शन की अनुमति दी गई।
- 2017 (कोलकाता): 33 साल की महिला को 26 हफ्ते में अनुमति मिली क्योंकि भ्रूण के दिल में गंभीर बीमारी थी।
- 2017 (हरियाणा): यहां 10 साल की बच्ची की याचिका खारिज हुई थी क्योंकि 32 हफ्ते में जान को खतरा बहुत ज्यादा था।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि भारत में महिलाओं के ‘प्रजनन अधिकार’ (Reproductive Rights) अब और मजबूत होने वाले हैं।
कोर्ट का मानना है कि शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही जरूरी है।
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह इस ‘टाइम लिमिट’ को हटाने के लिए कानून में संशोधन कब करती है।
#SupremeCourt #AbortionRights #MTPAct #WomensRights #CJI #LegalNews #ChildSafety #HealthLawsIndia
