Jantar Mantar Protest Action: NEET पेपर लीक मामले को लेकर राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर चला लंबा आंदोलन अब अदालती गलियारों में अहम मोड़ पर पहुंच गया है।
केंद्र सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) को भरोसा दिया है कि विरोध प्रदर्शन में शामिल रहे छात्रों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई पर सख्त रुख अपनाया है।
अदालत ने साफ कहा है कि अगर किसी पुलिसकर्मी ने जरूरत से ज्यादा बल (ताकत) का इस्तेमाल किया है, तो उसे बचाया नहीं जाना चाहिए।

सरकार ने कोर्ट में क्या पक्ष रखा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने छात्रों के प्रति सरकार के रुख को स्पष्ट किया।
उन्होंने अदालत को बताया कि प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को लेकर कुछ भ्रम या गलतफहमी की स्थिति बन गई थी।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा-“छात्रों से जो वादा किया है, वह उस पर पूरी गंभीरता से कायम है। प्रदर्शनकारियों पर दर्ज केस वापस लेने या रद्द करने के लिए जो भी कानूनी रास्ता सही होगा, सरकार उसी का पालन करेगी।”
गौरतलब है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के बैनर तले जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के विरोध में 36 दिनों तक लंबा प्रदर्शन चला था।

इस दौरान संगठन ने सरकार के सामने तीन मुख्य मांगें रखी थीं, जिन्हें सरकार ने स्वीकार कर लिया था।
इन्हीं में से एक मुख्य मांग यह भी थी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले किसी भी छात्र पर पुलिसिया या कानूनी केस दर्ज न किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: न निर्दोष पिसे, न गुनहगार बचे
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है।
अदालत उन याचिकाओं पर विचार कर रही है जिनमें 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस बल प्रयोग और बर्बरता के आरोप लगाए गए थे।

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने बेहद संतुलित और सख्त टिप्पणी करते हुए दो बातें साफ कीं:
* पुलिसकर्मियों पर जवाबदेही: अगर जांच में यह पाया जाता है कि किसी सुरक्षाकर्मी या पुलिस जवान ने हद से ज्यादा लाठीचार्ज या बल का प्रयोग किया है, तो उसे कानून के दायरे से बाहर रखकर बेवजह बचाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
* अपराधियों को संरक्षण नहीं: अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि छात्रों के इस पवित्र आंदोलन की आड़ लेकर किसी भी असामाजिक तत्व या कुख्यात अपराधी को बचने का मौका नहीं मिलना चाहिए।

अदालत का मुख्य फोकस: दो बड़ी बातें जिन पर होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट इस पूरे विवाद में मुख्य रूप से दो प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित कर रहा है:
* SIT (विशेष जांच टीम) का गठन: कोर्ट प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और पैलेट गन से घायलों के दावों की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व न्यायाधीश की अगुआई में एक SIT (Special Investigation Team) बनाने पर विचार कर सकता है।
* उपद्रवियों की पहचान: अदालत यह भी सच सामने लाना चाहती है कि 20 जुलाई को पुलिस और सुरक्षा बलों पर पथराव या हमले असल में छात्रों ने किए थे, या फिर भीड़ में कुछ शरारती और असामाजिक तत्व घुस आए थे।

पिछली सुनवाइयों में कोर्ट के कड़े निर्देश
इससे पहले 28 जुलाई को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को सख्त निर्देश जारी किए थे।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि प्रदर्शनकारियों पर कोई भी अनावश्यक कठोर कार्रवाई न की जाए।
कोर्ट के प्रमुख आदेश निम्नलिखित थे:
* नाबालिगों की रिहाई: यदि प्रदर्शन में शामिल 18 साल से कम उम्र के युवाओं का कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा कर दिया जाए।
* राज्यों को नोटिस: अदालत ने महाराष्ट्र, बिहार, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल सरकार को नोटिस जारी कर उनके एडवोकेट जनरल को अदालत के समक्ष उपस्थित रहने के निर्देश दिए थे।
* डिजिटल सबूतों की सुरक्षा: अदालत ने सभी संबंधित राज्यों को निर्देश दिया था कि प्रदर्शन स्थल के CCTV फुटेज, ड्रोन वीडियो, बॉडी-कैमरा रिकॉर्डिंग, PCR लॉग और वायरलेस मैसेजेस को डिजिटल सबूत के तौर पर सुरक्षित रखा जाए, ताकि जांच में पारदर्शिता बनी रहे।

20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान क्या हुआ था?
NEET पेपर लीक विवाद के विरोध में 20 जुलाई को छात्रों और प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली में संसद की तरफ मार्च करने की कोशिश की थी।
इस दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई।
भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठियां भांजीं और आंसू गैस के गोले दागे, जिसमें कई लोग घायल हो गए थे।
प्रदर्शनकारी छात्र केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और प्रभावित परिवारों को मुआवजे की मांग कर रहे थे।

आखिरकार 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और अन्य मांगें माने जाने के बाद 36 दिनों से चला आ रहा यह आंदोलन समाप्त घोषित किया गया।
तकनीक के इस्तेमाल (FRT) पर भी कानूनी चुनौती
इसी मामले से जुड़ा एक और पहलू सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दिल्ली पुलिस द्वारा इस्तेमाल की जा रही फ़ेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) और बायोमेट्रिक निगरानी पर सवाल उठाए हैं।
याचिका में मांग की गई है कि किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन या सभा में नागरिकों की बिना सहमति के बायोमेट्रिक पहचान का इस्तेमाल करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है और इसे असंवैधानिक घोषित किया जाना चाहिए।

पहले भी 3 बार सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है मामला
जंतर-मंतर आंदोलन और कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ी याचिकाएं इससे पहले भी तीन बार शीर्ष अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे चुकी हैं:
* 24 मई (पहली बार): CJP की गतिविधियों की सीबीआई जांच की मांग को लेकर याचिका लगाई गई थी, जिसमें आरोप था कि यह संगठन न्यायपालिका की छवि खराब कर रहा है।
CJI सूर्यकांत की बेंच ने इस पर तुरंत सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को इस मुद्दे को ज्यादा भावुकता से न लेने की सलाह दी थी।
* 22 जुलाई (दूसरी बार): संसद मार्च पर हुए लाठीचार्ज के वीडियो कोर्ट में दिखाकर तुरंत सुनवाई की गुहार लगाई गई थी।
तब पीठ ने स्पष्ट कहा था कि अदालत केवल वीडियो देखकर फैसला नहीं सुनाती और प्रक्रिया के तहत ही काम होगा।
* 24 जुलाई (तीसरी बार): वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने पुलिस बल प्रयोग के खिलाफ दायर याचिकाओं का उल्लेख किया, जिसके बाद CJI ने मामले को नियमित लिस्टिंग में शामिल कर सुनवाई करने का आश्वासन दिया।

कुलमिलाकर, NEET पेपर लीक विवाद ने न केवल देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, बल्कि छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।
अब जब केंद्र सरकार ने केस वापस लेने की बात मान ली है और सुप्रीम कोर्ट खुद पूरे मामले की निगरानी कर रहा है, तो उम्मीद जताई जा रही है कि छात्रों को न्याय मिलेगा और भविष्य में ऐसी धांधलियों पर रोक लगेगी।
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