Marital Rape Supreme Court Hearing: शादी के बाद पत्नी की मर्जी के बिना शारीरिक संबंध बनाने (मैरिटल रेप) को अपराध घोषित करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई तेज हो गई है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि मैरिटल रेप को अलग अपराध का दर्जा देना या कानून में बदलाव करना संसद और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायपालिका के।
शादी का मतलब आजादी खत्म होना नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा और विचारणीय रुख अपनाया।
पीठ ने कहा कि शादी का अर्थ यह कदापि नहीं है कि किसी महिला की व्यक्तिगत आजादी और सहमति का अधिकार खत्म हो जाए।
अदालत ने कानूनी सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या मौजूदा भारतीय न्याय संहिता (BNS) और कानूनों के तहत पति के खिलाफ मैरिटल रेप का मामला चलाया जा सकता है?
कोर्ट अब इस मामले की अंतिम सुनवाई तीन हफ्ते बाद करेगा।
मौजूदा कानून और मैरिटल रेप की छूट
वर्तमान कानून के अनुसार, यदि पत्नी की उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक है, तो उसकी सहमति के बिना पति द्वारा बनाए गए संबंध को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जाता।
इसे कानून में मैरिटल रेप की ‘अपवाद’ या ‘छूट’ कहा जाता है। याचिकाओं में इसी छूट को चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं और केंद्र सरकार की दलीलें
* याचिकाकर्ताओं का पक्ष:
याचिकाओं में कहा गया है कि वैवाहिक रिश्ता किसी पुरुष को अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती करने का लाइसेंस नहीं देता।
यदि पति पत्नी को शारीरिक या मानसिक चोट पहुंचाता है, तो केवल शादी के रिश्ते के आधार पर उसे कानूनी कार्रवाई से राहत नहीं मिलनी चाहिए।
शादीशुदा महिलाओं को भी वही अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए जो देश की अन्य महिलाओं को प्राप्त है।
* केंद्र सरकार का रुख:
केंद्र सरकार मैरिटल रेप को अलग से अपराध की श्रेणी में डालने के पक्ष में नहीं है।
सरकार का तर्क है कि ऐसा करने से विवाह संस्था और पति-पत्नी के सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
सरकार के अनुसार, विवाह के भीतर यौन संबंधों से जुड़ी शिकायतों को मौजूदा घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के कानूनों के तहत देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के सामने दो मुख्य सवाल
* यदि कानून में मैरिटल रेप की छूट बरकरार रहती है, तो क्या पति पर बलात्कार का मुकदमा चल सकता है? क्या BNS में मौजूद यह छूट संविधान के अनुकूल है?
* क्या अदालत अपने फैसले के जरिए किसी ऐसे कृत्य को अपराध घोषित कर सकती है जिसे संसद ने कानून में अपराध नहीं माना है, या यह बदलाव केवल संसद ही कर सकती है?
दिल्ली हाईकोर्ट का विभाजित फैसला
यह विवाद 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट के विभाजित फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव शकधर ने इस छूट को असंवैधानिक माना था, जबकि जस्टिस सी. हरिशंकर ने इसे सही ठहराते हुए कहा था कि वैवाहिक संबंधों को कानून में अलग नजरिए से देखने का एक तर्कसंगत आधार है।
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