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दिवाली से पहले रमा एकादशी: इस व्रत से मिलेगा वाजपेय यज्ञ का फल, जानें राजा मुचकुंद और शोभन की कथा

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Rama Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में त्योहारों और व्रतों की एक लंबी और गहरी परंपरा है। इन सभी व्रतों में एकादशी का स्थान सबसे ऊंचा माना जाता है।

हर महीने में दो एकादशी आती हैं, लेकिन कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी का अपना एक अलग ही महत्व है। इसे ‘रमा एकादशी’ कहा जाता है।

चूंकि यह एकादशी दिवाली से ठीक चार दिन पहले आती है, इसलिए इसका सीधा संबंध धन की देवी माता लक्ष्मी से जुड़ जाता है। दरअसल, माता लक्ष्मी का ही एक नाम ‘रमा’ है।

मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में कभी सुख-समृद्धि की कमी नहीं होती।

जो लोग दिवाली पर माता लक्ष्मी को प्रसन्न करना चाहते हैं, वे रमा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा के साथ रखते हैं।

यह व्रत न केवल आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि जीवन में अनुशासन और सकारात्मकता भी लाता है।

व्रत करने से मिलता है वाजपेय यज्ञ के समान फल

मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा से रमा एकादशी का व्रत करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।

यह भगवान श्रीविष्णु को सभी एकादशियों में अत्यंत प्रिय मानी जाती है. पुण्य संचय और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इस व्रत का विशेष महत्व है।

पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति पवित्र मन से इस एकादशी का व्रत और उपवास करता है, उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

रमा एकादशी की पौराणिक और रोचक कथा

इस व्रत के महत्व को समझने के लिए राजा मुचकुंद और उनके दामाद शोभन की कथा बहुत प्रसिद्ध है।

प्राचीन काल में मुचकुंद नाम के एक बहुत ही प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा थे।

राजा मुचकुंद भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे और नियम-कानून को लेकर बहुत सख्त थे।

उनके राज्य में एकादशी के दिन कोई भी इंसान तो क्या, जानवर भी अन्न या जल ग्रहण नहीं करता था।

राजा मुचकुंद की एक बहुत ही सुंदर बेटी थी जिसका नाम चंद्रभागा था। चंद्रभागा का विवाह चंद्रसेन के बेटे शोभन से हुआ था।

शोभन शरीर से काफी कमजोर था और उसके लिए ज्यादा देर तक भूखा-प्यासा रहना बहुत मुश्किल होता था।

एक बार कार्तिक के महीने में शोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ अपने ससुराल आया हुआ था। उसी दौरान रमा एकादशी का व्रत आ गया।

राजा मुचकुंद ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया कि एकादशी के दिन कोई भी अन्न नहीं खाएगा।

यह सुनकर चंद्रभागा बहुत परेशान हो गई। वह जानती थी कि उसका पति शोभन भूखा नहीं रह सकता।

शोभन ने अपनी पत्नी से कहा कि अगर वह कुछ नहीं खाएगा तो उसकी जान चली जाएगी।

इस पर चंद्रभागा ने सुझाव दिया कि अगर उसे खाना ही है, तो उसे राज्य की सीमा से बाहर जाना होगा, क्योंकि इस राज्य में रहते हुए उसे व्रत का पालन करना ही पड़ेगा।

शोभन ने तय किया कि वह राज्य से बाहर नहीं जाएगा और भगवान का नाम लेकर व्रत करेगा।

उसने व्रत तो रख लिया, लेकिन भूख और प्यास के कारण उसकी हालत बिगड़ने लगी और रात होते-होते उसकी मृत्यु हो गई।

राजा मुचकुंद ने पूरे सम्मान के साथ अपने दामाद का अंतिम संस्कार करवाया।

दूसरी ओर, रमा एकादशी के व्रत के पुण्य के कारण शोभन को मरने के बाद मंदराचल पर्वत पर एक बहुत ही सुंदर और चमचमाता हुआ जादुई नगर मिला।

एक दिन राजा मुचकुंद के राज्य का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए उस पर्वत पर पहुंचा और उसने शोभन को पहचान लिया।

शोभन ने उस ब्राह्मण को बताया कि यह सब रमा एकादशी के व्रत का फल है, लेकिन चूंकि उसने यह व्रत मजबूरी और बिना श्रद्धा के किया था, इसलिए यह नगर स्थायी नहीं है।

उसने ब्राह्मण से विनती की कि वह चंद्रभागा को सारी बात बताए। ब्राह्मण ने वापस आकर चंद्रभागा को सब कुछ बताया।

चंद्रभागा बचपन से ही पूरी श्रद्धा से एकादशी का व्रत करती आ रही थी। उसने वामदेव ऋषि के पास जाकर मदद मांगी।

ऋषि के आशीर्वाद और चंद्रभागा के सालों के व्रत के पुण्य से उसका शरीर भी दिव्य हो गया।

वह अपने पति शोभन के पास उस जादुई नगर में पहुंच गई। चंद्रभागा के पुण्य के प्रभाव से वह नगर हमेशा के लिए स्थायी और वास्तविक हो गया।

रमा एकादशी पर भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां

एकादशी का व्रत बहुत पवित्र माना जाता है, इसलिए इस दिन कुछ खास नियमों का पालन करना जरूरी है।

अगर आप व्रत नहीं भी रख रहे हैं, तब भी आपको इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:

चावल का सेवन बिल्कुल न करें

एकादशी के दिन चावल खाना पूरी तरह से मना होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन चावल खाने से इंसान को अगले जन्म में रेंगने वाले जीव का रूप मिलता है।

वहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो चावल में पानी की मात्रा ज्यादा होती है, जो शरीर में जल तत्व को बढ़ाता है।

जल का सीधा संबंध चंद्रमा से होता है और चंद्रमा मन को चंचल करता है।

व्रत में मन का शांत और स्थिर रहना जरूरी है, इसलिए चावल से परहेज किया जाता है।

तामसिक भोजन से दूर रहें

रमा एकादशी के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस या मदिरा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। आपका भोजन पूरी तरह से सात्विक होना चाहिए।

तामसिक भोजन इंसान के अंदर गुस्सा, आलस्य और नकारात्मक विचार पैदा करता है।

इस दिन सादा भोजन करें और भगवान के ध्यान में मन लगाएं।

तुलसी के पत्ते न तोड़ें और जल न चढ़ाएं

भगवान विष्णु की कोई भी पूजा तुलसी के बिना पूरी नहीं होती।

रमा एकादशी के दिन भगवान को भोग लगाते समय उसमें तुलसी का पत्ता जरूर होना चाहिए।

लेकिन ध्यान रहे, एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना पाप माना जाता है।

मान्यता है कि इस दिन माता तुलसी भी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।

इसलिए पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लेने चाहिए।

इस दिन तुलसी के पौधे में पानी भी नहीं डालना चाहिए।

क्रोध करने और झूठ बोलने से बचें

व्रत का मतलब सिर्फ खाना छोड़ना नहीं होता, बल्कि अपनी इंद्रियों और भावनाओं पर काबू पाना भी होता है।

एकादशी के दिन किसी पर गुस्सा न करें, किसी का अपमान न करें और झूठ बिल्कुल न बोलें।

अगर आप दिन भर भूखे रहते हैं लेकिन दूसरों को अपशब्द कहते हैं, तो उस व्रत का कोई लाभ नहीं मिलता। अपने मन को साफ रखें।

मुफ्त की चीजें या दान लेने से बचें

इस पवित्र दिन पर किसी से भी कोई चीज मुफ्त में नहीं लेनी चाहिए और न ही किसी का दिया हुआ दान स्वीकार करना चाहिए।

इसके बजाय, अपनी क्षमता के अनुसार गरीबों या जरूरतमंदों को अन्न, कपड़े या पैसों का दान करना चाहिए।

दान देने से आपके जीवन में माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और घर में बरकत आती है।

रमा एकादशी की सरल पूजा विधि

  • व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। अगर संभव हो तो पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिला लें।
  • स्नान के बाद साफ और पीले रंग के कपड़े पहनें, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है।
  • घर के मंदिर को अच्छे से साफ करें। एक छोटी लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर रखें।
  • भगवान को चंदन का तिलक लगाएं और पीले फूल अर्पित करें।
  • पूजा में अक्षत (साबुत चावल) की जगह तिल का इस्तेमाल करें।
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर का मिश्रण) बनाएं और उसमें तुलसी का पत्ता डालकर भगवान को भोग लगाएं।
  • विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और फिर रमा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
  • शाम के समय भी भगवान की आरती करें और तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाएं।
  • अगले दिन (द्वादशी को) सुबह स्नान के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं, दान दें और उसके बाद ही अपना व्रत खोलें।

पूजा के दौरान जपने वाले विशेष मंत्र

पूजा करते समय आप इन सरल मंत्रों का जाप कर सकते हैं। इससे मन को बहुत शांति मिलती है:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः।

नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्।

यह व्रत इंसान को मोह-माया और पापों से दूर ले जाता है। जो भी व्यक्ति सच्चे मन से रमा एकादशी का पालन करता है, उसके घर में हमेशा खुशहाली रहती है और जीवन के हर क्षेत्र में उसे सफलता मिलती है।

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