Cheti Chand 2026-Jhulelal Jayanti: जहां हर समुदाय की अपनी एक गौरवशाली पहचान है।
सिंधी समाज के लिए ‘चेटी चंड’ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि उनकी अटूट आस्था, साहस और सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है।
साल 2026 में यह पावन पर्व 20 मार्च, शुक्रवार को मनाया जा रहा है।
यह दिन सिंधी नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है और इसी दिन सिंधी समाज के आराध्य देव, भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ था।
चैत्र मास को सिंधी भाषा में ‘चेट’ कहा जाता है और द्वितीय तिथि के चंद्रमा को ‘चण्डु’।
इसीलिए इस पर्व का नाम ‘चेटी चंड’ पड़ा।
आइए जानते हैं कि आखिर क्यों भगवान झूलेलाल को ‘समुद्र का रक्षक’ कहा जाता है और इस त्योहार से जुड़ी परंपराएं क्या हैं।
चेटी चंड 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि
पंचांग की गणना के अनुसार, चैत्र शुक्ल द्वितीया तिथि 20 मार्च 2026 को पड़ रही है।
- पूजा का सबसे शुभ समय: शाम 06:32 से रात 07:59 तक।
- अवधि: लगभग 1 घंटा 27 मिनट।
इस दौरान सिंधी परिवारों में विशेष ‘बहिराणा साहब’ की पूजा की जाती है और ज्योति प्रज्वलित कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
क्यों लिया भगवान झूलेलाल ने अवतार?
भगवान झूलेलाल के जन्म की कहानी त्याग, तपस्या और धर्म की जीत की कहानी है।
बात संवत् 1007 की है, जब सिंध के ठट्टा नगर (अब पाकिस्तान में) पर मिरखशाह नाम के एक क्रूर राजा का शासन था।
मिरखशाह बेहद कट्टर था और उसने अपनी हिंदू प्रजा पर इस्लाम स्वीकार करने के लिए भीषण अत्याचार शुरू कर दिए।
जब जुल्म की इंतहा हो गई, तो सिंधी समाज के लोगों ने अपनी रक्षा के लिए सिंधु नदी के किनारे 40 दिनों तक कठिन तपस्या की।
भूखे-प्यासे रहकर उन्होंने जल के देवता वरुण देव को पुकारा।
उनकी पुकार सुनकर नदी के बीचों-बीच एक विशाल मछली पर सवार दिव्य पुरुष प्रकट हुए।
आकाशवाणी हुई कि— “विचलित न हों, मैं सात दिन बाद रतनराय के घर माता देवकी की कोख से जन्म लूंगा।”
निश्चित समय पर भगवान झूलेलाल का जन्म हुआ, जिन्हें उडेरोलाल के नाम से जाना गया।
उन्होंने न केवल मिरखशाह के घमंड को चूर किया, बल्कि उसे यह भी सिखाया कि ईश्वर एक है और धर्म के नाम पर किसी पर अत्याचार करना पाप है।
भगवान झूलेलाल को ‘समुद्र का रक्षक’ क्यों कहते हैं?
सिंधी समुदाय ऐतिहासिक रूप से व्यापार और समुद्री यात्राओं से जुड़ा रहा है।
भगवान झूलेलाल को जल देवता (वरुण देव) का अवतार माना जाता है।
मान्यता है कि वे जल के स्वामी हैं और समुद्र की लहरों पर उनका नियंत्रण है।
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सुरक्षित यात्रा: पुराने समय में जब सिंधी व्यापारी समुद्र के रास्ते व्यापार करने जाते थे, तो वे झूलेलाल जी की पूजा करते थे ताकि वे तूफानों से उनकी रक्षा करें।
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मछली की सवारी: उनकी तस्वीरों में उन्हें हमेशा एक बड़ी पल्ले मछली (Palla Fish) पर सवार दिखाया जाता है, जो जल पर उनके आधिपत्य का प्रतीक है।
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मानवीय रक्षक: उन्होंने जल शक्ति के माध्यम से अत्याचारी राजाओं से प्रजा की रक्षा की, इसलिए उन्हें सिंधी समाज का ‘इष्ट देव’ और ‘संरक्षक’ कहा जाता है।
चालीहो साहब: 40 दिनों का कठिन अनुशासन
चेटी चंड से ठीक पहले सिंधी समाज में ‘चालीहो’ व्रत रखने की परंपरा है।
यह वही 40 दिन हैं जब उनके पूर्वजों ने सिंधु नदी के तट पर तपस्या की थी।
- इस दौरान लोग बेहद सादगी से रहते हैं।
- कई लोग जमीन पर सोते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और सात्विक भोजन करते हैं।
- इन 40 दिनों में वे नए कपड़े नहीं पहनते और किसी भी तरह के विलासिता वाले काम से दूर रहते हैं। यह व्रत मन की शुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
बहिराणा साहब और अन्य परंपराएं
चेटी चंड के दिन ‘बहिराणा साहब’ की शोभायात्रा निकाली जाती है, जो इस त्योहार का मुख्य आकर्षण है।
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ज्योति और कलश: एक सुंदर सजाया हुआ बांस या लकड़ी का मंदिर बनाया जाता है, जिसमें आटे का दीया (ज्योति), कलश, फल, इलायची और मिश्री रखी जाती है।
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छेज (नृत्य): श्रद्धालु इस मंदिर को अपने सिर पर उठाकर ‘लाल साईं’ के भजन गाते हैं और ‘छेज’ (सिंधी पारंपरिक नृत्य) करते हैं।
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जल विसर्जन: अंत में इस बहिराणा साहब को किसी नदी, झील या समुद्र में विसर्जित किया जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम जल के देवता के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट कर रहे हैं।
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प्रसाद: इस दिन घरों में मीठे चावल (तहरी) और काले चने (छोले) का प्रसाद बनाया जाता है, जो श्रद्धालुओं के बीच बांटा जाता है।
भगवान के अनेक नाम
भगवान झूलेलाल को भक्त कई प्यारों नामों से पुकारते हैं:
- उडेरोलाल: जो बादलों को उड़ाने वाला हो।
- जिन्दपीर: जो जीवित देवता हैं।
- लाल साईं: प्यार और सम्मान का सूचक।
- पल्लेवारो: जो मछली पर सवार हों।
- ज्योतिनवारो: जो प्रकाश के पुंज हों।
भाईचारे का संदेश
चेटी चंड केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सद्भावना और भाईचारे का संदेश देता है।
भगवान झूलेलाल ने अपने उपदेशों में हमेशा कहा कि “हिंदू और मुसलमान एक ही ईश्वर की संतान हैं।”
आज के समय में जब दुनिया को शांति की जरूरत है, झूलेलाल जी की शिक्षाएं और भी प्रासंगिक हो जाती हैं।
चेटी चंड 2026 के अवसर पर, आइए हम भी संकल्प लें कि हम अपने पूर्वजों की विरासत को संजोकर रखेंगे और प्रेम के रास्ते पर चलेंगे।
“आयो लाल, झूलेलाल!”
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