Durga Puja vs Navratri differences: पूरे भारत में जब शारदीय नवरात्रि का समय आता है, तब नौ दिनों तक चारों तरफ भक्ति, उपवास और सात्विक माहौल रहता है।
लोग मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं और मां से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।
लेकिन इसी समय पश्चिम बंगाल, खासतौर पर कोलकाता में नजारा बिल्कुल बदला हुआ होता है।
वहां नवरात्रि के नौ दिनों के व्रत से ज्यादा जोर पांच दिनों के दुर्गा पूजा उत्सव पर होता है।

दुर्गा पूजा: फास्टिंग नहीं फेस्टिंग का पर्व
बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि यह वहां की संस्कृति, कला, खान-पान और सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा त्योहार है।
जहां देश के बाकी हिस्सों में नवरात्रि ‘फास्टिंग’ यानी उपवास का पर्व है, वहीं बंगाल में यह ‘फेस्टिंग’ यानी खाने-पीने और खुशियां मनाने का पर्व माना जाता है।
आइए समझते हैं कि नवरात्रि और दुर्गा पूजा में क्या फर्क है, बंगाल में देवी को किस रूप में पूजा जाता है और इस त्योहार से जुड़ी अनोखी परंपराएं व हालिया विवाद के बारे में…

नवरात्रि और दुर्गा पूजा में क्या अंतर है?
दोनों ही त्योहारों में मां दुर्गा की ही आराधना होती है, लेकिन दोनों के मनाने का नजरिया और भावना काफी अलग है।
नवरात्रि का रूप:
भारत के अधिकांश राज्यों में नवरात्रि एक विशुद्ध आध्यात्मिक और धार्मिक पर्व है।
इसमें नौ दिनों तक मां शैलपुत्री से लेकर मां सिद्धिदात्री तक की पूजा की जाती है।
भक्त नौ दिनों तक लहसुन-प्याज छोड़कर सात्विक भोजन करते हैं या व्रत रखते हैं।
यहां देवी को एक सर्वशक्तिमान माता के रूप में देखा जाता है जो अपने बच्चों के कष्ट हरती हैं।

दुर्गा पूजा की मान्यता:
बंगाल में मां दुर्गा को केवल एक देवी या ईश्वर नहीं, बल्कि घर की बेटी माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा (उमा या पार्वती) हर साल अपने ससुराल कैलाश पर्वत से अपने चारों बच्चों—लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय—के साथ अपने मायके यानी धरती पर आती हैं।
जब घर की बेटी लंबे समय बाद मायके आती है, तो घर में दुख या उपवास नहीं, बल्कि उत्सव और पकवानों का माहौल होता है। यही वजह है कि बंगाल में भक्ति के साथ-साथ उल्लास का पल ज्यादा दिखता है।

5 दिनों का सफर: महालया से विजयादशमी तक
हालांकि तैयारियां हफ्तों पहले शुरू हो जाती हैं, लेकिन मुख्य दुर्गा पूजा षष्ठी से दशमी तक यानी पांच दिनों तक ही चलती है।
* महालया: इसे दुर्गा पूजा की अनौपचारिक शुरुआत माना जाता है। इस दिन तड़के सुबह रेडियो पर बीरेंद्र कृष्ण भद्र की गरजती हुई सुरीली आवाज में ‘महिषासुरमर्दिनी’ का पाठ गूंजता है।
मान्यता है कि महालया के दिन ही मां दुर्गा धरती के लिए प्रस्थान करती हैं।
* षष्ठी (बोधन): इस दिन से मुख्य पूजा शुरू होती है। ‘बोधन’ की रस्म के जरिए देवी को नींद से जगाया जाता है। मूर्तियों की आंखों में अंतिम स्पर्श देकर प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है, जिसे ‘चक्षुदान’ कहते हैं।
* सप्तमी (नवपत्रिका स्नान): इस दिन सुबह ‘कोलबाऊ’ यानी केले के पौधे को साड़ी पहनाकर, नौ अलग-अलग पवित्र पौधों के साथ नदी में स्नान कराया जाता है। यह नवपत्रिका देवी के नौ रूपों और प्रकृति की उर्वरता का प्रतीक है।

* अष्टमी (संधि पूजा): यह दुर्गा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है। जब अष्टमी तिथि समाप्त हो रही होती है और नवमी शुरू होती है, उस संधि काल में ‘संधि पूजा’ की जाती है।
माना जाता है कि इसी समय देवी ने महिषासुर के सेनापति चंड और मुंड का वध किया था। इसमें 108 कमल के फूल और 108 दीपक जलाए जाते हैं। इसी दिन सुबह सामूहिक ‘पुष्पांजलि’ दी जाती है।
* नवमी (धनुचि नाच): नवमी की शाम को धूपदान (धुनुचि) लेकर ढाक की ताल पर नाचने की परंपरा ‘धुनुचि नृत्य’ बहुत प्रसिद्ध है। इस दिन मां को विशेष भोग लगाया जाता है।
* दशमी (सिंदूर खेला व विसर्जन): दशमी के दिन बेटी के विदा होने का समय आ जाता है। महिलाएं मां दुर्गा को मिठाई खिलाती हैं और उन्हें सिंदूर लगाती हैं।
इसके बाद आपस में सिंदूर लगाकर ‘सिंदूर खेला’ का जश्न मनाया जाता है।

नम आंखों से प्रतिमाओं को पानी में विसर्जित कर दिया जाता है और एक-दूसरे को ‘शुभ बिजया’ कहकर गले लगाया जाता है।
खान-पान और नॉनवेज भोग की परंपरा
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार खाने की एक प्राचीन परंपरा रही है। बंगाल मुख्य रूप से ‘शाक्त’ परंपरा का पालन करता है।
शाक्त संप्रदाय में देवी को शक्ति का रूप मानकर बलि प्रथा (मांस का भोग) का विधान रहा है।
नवमी के दिन बकरे का मांस (मटन) और अष्टमी या सप्तमी को मछली व लुची (पूरी) खाना वहां के सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है।

हाल ही में बागेश्वर धाम के प्रमुख पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने एक कथा के दौरान अपील की थी कि नवरात्रि और दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर लोगों को नॉनवेज नहीं खाना चाहिए।
क्यों छिड़ा राजनीतिक विवाद?
उन्होंने इस दौरान मांसाहार करने वालों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐसे लोग धार्मिक नहीं बल्कि पाखंडी हैं।
धीरेंद्र शास्त्री के इस बयान पर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस छिड़ गई।

पश्चिम बंगाल बीजेपी के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि बंगाल के लोग क्या खाएंगे और क्या पहनेंगे, इसका फैसला कोई बाहरी साधु-संत या राजनीतिक दल नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि बंगाल में शक्ति उपासना और शाक्त परंपरा सदियों पुरानी है, जहां देवी को मांस का भोग चढ़ाने का विधान रहा है।
ऐसे में बंगाली समाज को पाखंडी कहना उनकी प्राचीन परंपराओं का अनादर है।

कोठे की मिट्टी से प्रतिमा निर्माण का सामाजिक संदेश
दुर्गा पूजा की एक सबसे सुंदर और गहरी परंपरा यह है कि मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में ‘वेश्यावाटिका’ यानी कोठे के बाहर की मिट्टी मिलाना अनिवार्य माना गया है।
इसके पीछे एक बहुत ही गहरा दर्शन है। माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति किसी वेश्या के द्वार पर कदम रखता है, तो वह अपनी तमाम अच्छाइयां, पुण्य और पवित्रता चौखट के बाहर ही छोड़ देता है।
इसलिए कोठे के बाहर की मिट्टी सबसे पवित्र मानी जाती है क्योंकि उसमें लोगों के पुण्य संचित होते हैं।
दूसरा संदेश यह है कि समाज जिस वर्ग को तिरस्कृत और अछूत मानता है, देवी की पूजा उसके बिना अधूरी है।

यह परंपरा सिखाती है कि मां दुर्गा की नजरों में कोई छोटा, बड़ा, पापी या पवित्र नहीं है।
पूजा के मंडप में बैठने से पहले इंसान को अपना सारा अहंकार और सामाजिक भेदभाव त्यागना पड़ता है।
कला और सामाजिक एकजुटता का संगम
कोलकाता की दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक कला प्रदर्शनी की तरह होती है।
हर साल शहर में हजारों पंडाल बनाए जाते हैं, जिनकी थीम पर्यावरण, इतिहास, सामाजिक मुद्दों या दुनिया के मशहूर वास्तुकला पर आधारित होती है।
इन पंडालों को देखने के लिए लाखों लोग रात-रात भर सड़कों पर पैदल घूमते हैं।

यही कारण है कि यूनेस्को (UNESCO) ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage of Humanity) का दर्जा दिया है।
यह उत्सव धर्म की दीवारों से परे जाकर हर वर्ग, हर जाति और हर समुदाय के लोगों को एक सूत्र में पिरोता है।
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