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मेष संक्रांति: पंजाब की बैसाखी से बंगाल के पोहला बैशाख तक, भारत के विभिन्न राज्यों में कैसे मनाया जाता है नववर्ष?

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Baisakhi Hindu New Year: भारत एक ऐसा देश है जहाँ की मिट्टी में उत्सव रचे-बसे हैं। यहाँ हर मील पर बोली बदलती है और हर मौसम के साथ त्योहारों के रंग।

साल 2026 में 14 अप्रैल का दिन भी ऐसा है, जो पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधता है।

इस दिन सूर्य देव मीन राशि को छोड़कर अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करेंगे।

ज्योतिष और खगोल विज्ञान की भाषा में इसे ‘मेष संक्रांति’ कहा जाता है।

सौर नववर्ष का उदय

मेष संक्रांति का दिन हिंदू सौर कैलेंडर के अनुसार नए साल की शुरुआत माना जाता है।

उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, भले ही इस दिन को मनाने के नाम अलग हों, लेकिन इसके पीछे की भावना एक ही है—नई शुरुआत, प्रकृति का आभार और समृद्धि की कामना।

अलग राज्य, अलग अंदाज़

आइए जानते हैं कि 14 अप्रैल को भारत के विभिन्न कोनों में किस तरह खुशियां बिखरेगी:

पंजाब और हरियाणा (बैसाखी):

यहाँ का माहौल ढोल की थाप और भांगड़े से गूँज उठता है।

किसान अपनी रबी की फसल (गेहूँ) पकने की खुशी में नाचते हैं।

साथ ही, सिख समुदाय के लिए यह खालसा पंथ के स्थापना दिवस का गौरवमयी दिन है।

पश्चिम बंगाल (पोहला बैशाख):

बंगाली समुदाय के लिए यह साल का पहला दिन है।

लोग नए कपड़े पहनते हैं, घरों में अल्पना (रंगोली) बनाते हैं और व्यवसायी अपने नए बही-खाते (हाल खाता) शुरू करते हैं।

केरल (विशु):

यहाँ के लोग अपने दिन की शुरुआत ‘विशु कानी’ के दर्शन से करते हैं।

एक थाली में फूल, फल, अनाज, शीशा और भगवान कृष्ण की मूर्ति सजाई जाती है, जिसे सुबह सबसे पहले देखना शुभ माना जाता है।

असम (बोहाग बिहू):

असमिया समाज के लिए यह प्रकृति के प्रति प्रेम प्रकट करने का समय है।

पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘पेपा’ की सुरीली धुन और बिहू नृत्य की रौनक देखते ही बनती है।

ओडिशा (पणा संक्रांति):

यहाँ लोग हनुमान जी का जन्मोत्सव मनाते हैं और ‘पणा’ नामक एक विशेष बेल का शरबत पीते हैं और बांटते हैं, जो भीषण गर्मी से राहत दिलाता है।

बिहार-यूपी (सत्तूआनी):

गंगा किनारे के राज्यों में इसे ‘सतुआ संक्रांति’ कहते हैं। लोग सत्तू, गुड़ और आम का पन्ना खाते हैं।

इस दिन घड़ा और पंखा दान करने की भी परंपरा है।

मेष संक्रांति पर क्या करें (Do’s)

इस दिन का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। शुभ फलों की प्राप्ति के लिए ये काम जरूर करें:

 1. पवित्र स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी (जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा) में स्नान करें। अगर संभव न हो, तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहाएं।

 2. सूर्य को अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, कुमकुम और लाल फूल डालकर सूर्य देव को जल अर्पित करें।

 3. सत्तू का सेवन: मेष संक्रांति पर सत्तू खाना और दान करना सेहत और पुण्य दोनों के लिए अच्छा माना जाता है।

 4. पितरों का तर्पण: इस दिन पूर्वजों के नाम से तर्पण या पिंडदान करना बहुत फलदायी होता है।

 5. दान की महिमा: गर्मी के मौसम को देखते हुए ठंडा पानी, मिट्टी का घड़ा (कलश), छाता और पंखा दान करें।

मेष संक्रांति पर क्या न करें (Don’ts)

शास्त्रों के अनुसार, कुछ कार्यों को संक्रांति के दिन वर्जित माना गया है:

 1. तामसिक भोजन: इस दिन मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए।

2. कटु वचन: नए साल की शुरुआत है, इसलिए किसी को बुरा-भला न कहें और घर में कलेश न करें।

 3. देर तक सोना: संक्रांति के दिन सूर्योदय के बाद देर तक सोना शुभ नहीं माना जाता।

 4. अशुद्धता: बिना स्नान किए कुछ भी न खाएं और घर के मंदिर की सफाई जरूर करें।

मेष संक्रांति केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के बीच के गहरे रिश्ते का उत्सव है।

जब सूर्य अपनी ऊर्जा से धरती को सींचता है, तब हम भी नए संकल्पों के साथ जीवन के नए साल की ओर बढ़ते हैं।

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