42 Retired judges support CEC: भारत में निष्पक्ष चुनाव और संवैधानिक संस्थाओं की साख को लेकर चल रही बहस के बीच एक बड़ा मोड़ आया है।
देश के 42 पूर्व न्यायाधीशों (रिटायर्ड जजों) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग (EC) की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया का खुलकर समर्थन किया है।
पूर्व जजों ने एक संयुक्त पत्र लिखकर साफ कहा है कि बिना किसी ठोस सबूत के संवैधानिक संस्थाओं पर वोट चोरी या गड़बड़ी के आरोप लगाना सही नहीं है।
ऐसा करने से लोकतांत्रिक प्रणाली और चुनावी प्रक्रिया पर आम जनता का विश्वास कमजोर होता है।
पूर्व जजों ने अपील की है कि यदि किसी को कोई शिकायत या आपत्ति है, तो उसे कानूनी और लोकतांत्रिक दायरे में रहकर ही उठाया जाना चाहिए।

उन्होंने SIR की पूरी प्रक्रिया को कानूनन और प्रक्रियात्मक रूप से सही ठहराया है।
2,000 नागरिकों और पूर्व हस्तियों ने की थी SIR रोकने की मांग
पूर्व जजों का यह पत्र ऐसे समय में आया है जब हाल ही में देश के 2,000 से अधिक प्रमुख नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाने की मांग की थी।
इस ओपन लेटर पर दस्तखत करने वालों में पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत, पूर्व आईएएस अधिकारी अदिति मेहता, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, इतिहासकार आदित्य मुखर्जी और प्रसिद्ध अभिनेता प्रकाश राज जैसी हस्तियां शामिल थीं।
इन नागरिकों ने मांग की थी कि जब तक वोटर लिस्ट मैनेजमेंट और ‘ECINet’ प्लेटफॉर्म से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच नहीं हो जाती, तब तक SIR अभियान को रोक दिया जाए।

जजों के बयानों और न्यायिक मर्यादा पर छिड़ी बहस
इस पूरे मामले में न्यायपालिका के भीतर से भी अलग-अलग विचार सामने आए हैं:
* 4 अक्टूबर (जस्टिस उज्जल भुइयां का बयान):
सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने NALSAR यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में कहा था कि “किसी भी नागरिक को वोट देने के मौलिक अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी है।”
* 5 अक्टूबर (पूर्व CJI गवई की प्रतिक्रिया):
जस्टिस भुइयां के बयान पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई ने असहमति जताई।
उन्होंने कहा कि “जो मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित या विचाराधीन हो, उस पर सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करना न्यायिक मर्यादा के खिलाफ है।” दिल्ली हाईकोर्ट के दो पूर्व जजों ने भी माना कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर टिप्पणी करने से पहले सोचना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: CEC को हटाने पर अंतरिम रोक से इनकार
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने और SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो जनहित याचिकाएं (PIL) दाखिल की गई हैं।
ये याचिकाएं राकेश कुमार सिंह और शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दाखिल की गई हैं।
5 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने CEC को तुरंत सस्पेंड करने या काम रोकने संबंधी अंतरिम आदेश देने से साफ इनकार कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट की 4 मुख्य बातें:
* सिर्फ मीडिया रिपोर्ट पर कार्रवाई नहीं: CJI ने कहा कि अखबार या मीडिया की खबरें 100% सही भी हो सकती हैं और गलत भी। इसलिए सिर्फ खबरों के आधार पर किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को निलंबित नहीं किया जा सकता।
* फैसले बहुमत या सर्वसम्मति से होने चाहिए: 3 सदस्यीय चुनाव आयोग में कोई भी मुख्य फैसला अकेले नहीं लिया जा सकता। नियम के मुताबिक फैसला सर्वसम्मति या फिर 2-1 के बहुमत से होना चाहिए।
* बिना रिकॉर्ड जांचे आरोप स्वीकार्य नहीं: कोर्ट ने कहा कि जब तक सरकारी रिकॉर्ड नहीं देखा जाता, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि CEC ने सारे फैसले एकतरफा लिए हैं।
* गलत फैसला पाए जाने पर होगी कार्रवाई: कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि जांच में पाया गया कि आयोग के फैसले कानून के खिलाफ या बिना तय प्रक्रिया (बहुमत) के लिए गए हैं, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है।

क्या है फॉर्म-6 और ECI-Net का पूरा विवाद?
पूरे विवाद की जड़ में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट और वोटर जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाला ‘फॉर्म-6’ है।
आइए इसे 6 आसान सवालों के जरिए समझते हैं:
* फॉर्म-6 क्या होता है?
यह नया वोटर कार्ड बनवाने या मतदाता सूची में पहली बार नाम जुड़वाने के लिए भरा जाने वाला कानूनी फॉर्म है।
यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत आता है।
* SIR में क्या नया बदलाव किया गया?
ऑनलाइन पोर्टल ‘ECINet’ पर फॉर्म-6 भरते समय एक अतिरिक्त घोषणा पत्र (Declaration) जोड़ दिया गया।
इसमें आवेदक को यह बताना अनिवार्य किया गया कि उसकी या उसके परिवार (माता-पिता/दादा-दादी) की जानकारी पिछली SIR सूची में थी या नहीं।
* विवाद की वजह क्या बनी?
ऑफलाइन कागजी फॉर्म में यह अतिरिक्त कॉलम नहीं था, लेकिन ऑनलाइन पोर्टल पर इसे भरना अनिवार्य कर दिया गया।
सवाल यह उठा कि जब मूल नियम में बदलाव नहीं हुआ, तो पोर्टल पर शर्त कैसे जोड़ी गई?
* चुनाव आयुक्तों ने क्या आपत्ति जताई थी?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव पर चिंता जताई थी।
उनका कहना था कि फॉर्म में किसी भी तरह के बदलाव के लिए नियमों में संशोधन की जरूरत है और इसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाना चाहिए।
इसके बावजूद पोर्टल पर इसे लागू कर दिया गया।
* चुनाव आयोग की क्या सफाई है?
आयोग का कहना है कि SIR के तहत पुराने रिकॉर्ड से आवेदक के परिवार का संबंध जांचना जरूरी होता है।
आयोग ने कहा कि बिहार SIR से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को अपने फैसले में फॉर्म-6 के इस घोषणा-पत्र को सही माना था।
* क्या आयोग खुद फॉर्म बदल सकता है?
जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 की धारा 28 के तहत नियम बनाने का अधिकार केंद्र सरकार का है, जो चुनाव आयोग से सलाह लेकर गजट नोटिफिकेशन जारी करती है।
यही मुख्य कानूनी विवाद है कि क्या यह बदलाव कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ या नहीं।

क्या CEC ज्ञानेश कुमार पर कार्रवाई संभव है? (3 मुख्य पहलू)
ज्ञानेश कुमार का कार्यकाल जनवरी 2029 तक है। वर्तमान कानूनी और राजनीतिक स्थिति को देखते हुए उन पर कार्रवाई के 3 पहलू हैं:
* कानूनी सुरक्षा का कवच:
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत CEC को पद पर रहते हुए लिए गए फैसलों के लिए कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। उन पर सीधी पुलिस कार्रवाई या आपराधिक केस चलाना बेहद मुश्किल है।
* सरकार का रुख:
केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विपक्ष के सभी आरोपों को खारिज किया है और इन्हें राजनीति से प्रेरित व निराधार बताया है।
* महाभियोग की राह में बहुमत का रोड़ा:
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिससे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है (यानी महाभियोग)।
* महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के दस्तखत चाहिए।
* प्रस्ताव पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई (2/3) विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। (लोकसभा में 362 और राज्यसभा में 164 वोट)।
* मौजूदा आंकड़ों के लिहाज से विपक्ष के पास यह संख्याबल मौजूद नहीं है, इसलिए महाभियोग प्रस्ताव पास होना व्यावहारिक रूप से असंभव दिखता है।
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