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MP में डिलीवरी के दौरान मौत की असली वजह बताएगी एम्स की ‘फ्री ऑटोप्सी’, पुलिस केस का डर भी नहीं

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

AIIMS Bhopal Clinical Autopsy: मध्य प्रदेश में गर्भवती महिलाओं और नवजातों की मृत्यु दर हमेशा से एक चिंता का विषय रही है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में हर 1 लाख प्रसव पर 159 माताएं दम तोड़ देती हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत (88) से काफी ज्यादा है।

अक्सर ऐसी मौतों के बाद परिवार और डॉक्टर इस उलझन में रहते हैं कि आखिर गलती कहां हुई?

क्या यह कोई छिपी हुई बीमारी थी या इलाज में कमी?

इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए एम्स (AIIMS) भोपाल ने एक नई पहल शुरू की है।

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अब गर्भावस्था या डिलीवरी के दौरान होने वाली मौत के असली कारणों का पता लगाने के लिए ‘क्लिनिकल ऑटोप्सी’ की सुविधा शुरू की गई है।

क्या है क्लिनिकल ऑटोप्सी और यह क्यों अलग है?

आमतौर पर ‘पोस्टमार्टम’ या ‘ऑटोप्सी’ का नाम सुनते ही लोगों के मन में पुलिस, कचहरी और कानूनी पचड़ों का डर बैठ जाता है।

लेकिन एम्स की यह सुविधा सामान्य पोस्टमार्टम से बिल्कुल अलग है।

  • पुलिस की भूमिका नहीं: इसमें पुलिस का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। यह पूरी तरह से मेडिकल प्रक्रिया है।
  • परिवार की सहमति: यह जांच तभी की जाती है जब मृतक महिला का परिवार इसके लिए लिखित सहमति देता है।
  • सटीक रिपोर्ट: इसमें डॉक्टर शरीर के अंगों की बारीकी से जांच करते हैं ताकि यह पता चल सके कि मौत किसी इन्फेक्शन, अचानक आई जटिलता या किसी पुरानी बीमारी की वजह से हुई है।

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क्या जरूरी है हस्तक्षेप

  • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का मजबूतीकरण।
  • प्रसव पूर्व और पश्चात देखरेख में सुधार।
  • पोषण, टीकाकरण और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की सतत निगरानी।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ताओं को अधिक संसाधन।
  • जनजागरूकता अभियानों को गांव स्तर तक पहुंचा।

डेढ़ घंटे में प्रक्रिया, कुछ दिनों में फाइनल रिपोर्ट

एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक, यह प्रक्रिया बहुत कम समय में पूरी हो जाती है।

शरीर की बाहरी जांच और जरूरी सैंपल लेने में महज 90 मिनट (डेढ़ घंटा) का समय लगता है।

इसके बाद, हिस्टोपैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी जैसी एडवांस जांचों के जरिए कुछ ही दिनों में परिवार को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी जाती है।

इससे परिजनों को तसल्ली मिलती है कि मौत की असली वजह क्या थी और क्या इसे टाला जा सकता था।

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मध्य प्रदेश के लिए यह क्यों जरूरी है?

मध्य प्रदेश मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) के मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिना जाता है।

यहां हर 1,000 जन्मों पर 40 नवजात अपनी जान गंवा देते हैं।

सरकार के पास अब तक ऐसा कोई ठोस जरिया नहीं था जिससे हर मौत की ‘बायोलॉजिकल’ वजह पता चल सके।

इस क्लिनिकल ऑटोप्सी से जो डेटा मिलेगा, वह सरकार के लिए संजीवनी का काम करेगा।

इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्रदेश के किस इलाके में किस तरह की मेडिकल जटिलताएं ज्यादा आ रही हैं।

क्या वहां ब्लड बैंक की कमी है, क्या इन्फेक्शन कंट्रोल नहीं हो रहा, या फिर एनेस्थीसिया जैसी सुविधाओं में सुधार की जरूरत है?

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देश, राज्य और वैश्विक स्तर पर IMR की तुलना

  • उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ का IMR भी 38 है, जो मध्यप्रदेश से थोड़ा बेहतर, लेकिन फिर भी गंभीर स्थिति में है।
  • ओडिशा का IMR 32 है, जो उच्च IMR वाले राज्यों में से एक है।
  • केरल 7 और तमिलनाडु 11 IMR के साथ शिशुओं की देखभाल में बेहतर स्थिति पर हैं।
  • वैश्विक स्तर पर तुलना करने पर, मध्यप्रदेश का IMR 40 है। वहीं, बांग्लादेश में 25 है। यानी बांग्लादेश भी हम से आगे।
  • दक्षिण एशियाई देशों में केवल पाकिस्तान (IMR 55) को छोड़कर, पिछड़े हुए हैं।

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भविष्य की सुरक्षा

अक्सर प्रसव में मौत के बाद परिवार वाले डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हैं या फिर बिना कारण जाने ही उम्र भर के दर्द के साथ रहते हैं।

यह पहल डॉक्टरों और मरीजों के बीच विश्वास का पुल बनेगी।

यह सिर्फ एक जांच नहीं, बल्कि आने वाली दूसरी माताओं की जान बचाने की एक वैज्ञानिक कोशिश है।

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