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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: भोजशाला के पास तय हुई नमाज की जगह, हर शुक्रवार 2 घंटे मिलेगी अनुमति

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Bhojshala Supreme Court Verdict: धार के ऐतिहासिक भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है।

अदालत ने अपने पिछले अंतरिम आदेश को बिल्कुल साफ करते हुए मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार (जुमे) की नमाज के लिए एक तय जगह दे दी है।

यह नई जगह भोजशाला परिसर से ही सटी हुई है।

कोर्ट के इस आदेश के बाद अब हर शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक यानी कुल 2 घंटे के लिए इस जगह पर नमाज अदा की जा सकेगी।

किस जगह पर मिली है नमाज की इजाजत?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दर्गाह की जमीन पर स्थित खसरा नंबर 596 वाले भूखंड (प्लाट) पर ही नमाज की व्यवस्था होगी।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने नक्शे का बारीकी से अध्ययन किया।

नक्शे में दिखाई गई ‘येलो साइट’ (Yellow Site) पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा कि इस जमीन तक पहुंचने के लिए एक अलग और सीधा रास्ता मौजूद है।

क्योंकि यह भूखंड विवादित भोजशाला परिसर के बिल्कुल पास है, इसलिए इसे नमाज के लिए सबसे सही और उपयुक्त स्थान माना गया।

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कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह वहां सुरक्षा और अन्य जरूरी इंतजाम जल्द से जल्द पूरे करे।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “धार्मिक अधिकार नहीं रोके जा सकते”

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कानून-व्यवस्था और लोगों के आस्था के अधिकारों पर बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही।

उन्होंने कहा कि नागरिकों के धार्मिक अधिकार कानूनी रूप से मौजूद हैं और राज्य सरकार का यह संवैधानिक फर्ज है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे।

सिर्फ इस डर या आशंका से किसी के धार्मिक अधिकारों को नहीं रोका जा सकता कि वहां माहौल खराब हो सकता है।

शांति व्यवस्था कायम रखना पूरी तरह से राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी है।

मुस्लिम पक्ष की क्या शिकायत थी?

दरअसल, इससे पहले जिला प्रशासन (कलेक्टर) की तरफ से नमाज के लिए जो जमीन सुझाई गई थी, उस पर मुस्लिम पक्ष ने आपत्ति जताई थी।

मुस्लिम पक्ष का कहना था कि प्रशासन द्वारा दी गई जगह भोजशाला से काफी दूर है।

गूगल मैप का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया गया कि वह जगह सड़क के रास्ते लगभग 1.3 किलोमीटर और सीधी दूरी से करीब 900 मीटर दूर पड़ती है।

मुस्लिम पक्ष का तर्क था कि इतनी दूर जगह देना सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश की भावना के खिलाफ है।

इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने खुद कोर्ट के सामने एक नक्शा पेश किया और 4 वैकल्पिक जगहों के सुझाव दिए।

इनमें से ज्यादातर जमीनें दरगाह या वक्फ बोर्ड से जुड़ी हुई थीं, जिन पर मुतवल्ली (देखरेख करने वाले) को भी कोई ऐतराज नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया आपसी सहमति का विकल्प

शीर्ष अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि पुराने आदेश का ही स्पष्टीकरण है।

कोर्ट ने यह राहत भी दी कि अगर आगे चलकर हिंदू और मुस्लिम, दोनों पक्ष आपसी बातचीत और सहमति से नमाज के लिए कोई दूसरी बेहतर जगह चुन लेते हैं, तो उस पर भी अदालत को कोई आपत्ति नहीं होगी।

मध्य प्रदेश सरकार का रुख

सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अधिकारों की कानूनी जंग पर ज्यादा बहस नहीं की गई।

राज्य सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर रहा कि इलाके में शांति और कानून-व्यवस्था बनी रहे।

सरकार ने अदालत में भरोसा जताया कि अगर जरूरत पड़ी तो भविष्य में दोनों पक्षों को मंजूर होने वाली किसी निजी जमीन का विकल्प तलाशने में भी मदद की जाएगी।

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