Binance exchange crypto hack: डिजिटल करेंसी की दुनिया में अब तक का सबसे बड़ा धमाका हुआ है।
दुनिया का सबसे भरोसेमंद और बड़ा क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज, बाइनेंस (Binance), एक भयानक साइबर हमले का शिकार हो गया है।
इसे क्रिप्टो के इतिहास की सबसे बड़ी चोरी माना जा रहा है, जिसमें हैकर्स ने करीब 6.3 बिलियन डॉलर यानी लगभग 60,000 करोड़ रुपये की क्रिप्टोकरेंसी पर हाथ साफ कर दिया है।
जैसे ही यह खबर फैली, क्रिप्टो बाजार में अफरा-तफरी मच गई। कंपनी ने आनन-फानन में सभी तरह के लेन-देन पर ब्रेक लगा दिया है।

इसका सीधा मतलब यह है कि जब तक सुरक्षा की पूरी जांच नहीं हो जाती, तब तक कोई भी यूजर अपने बाइनेंस खाते में न तो नया पैसा डाल सकता है और न ही अपना जमा पैसा या क्रिप्टो बाहर निकाल सकता है।
ब्लॉकचेन और साइबर सुरक्षा पर नजर रखने वाली एक जानी-मानी रिसर्च फर्म ‘TRM लैब्स’ ने इस महाघोटाले के पीछे नॉर्थ कोरिया (उत्तर कोरिया) के हैकर्स का हाथ होने का दावा किया है।
नॉर्थ कोरियाई हैकर्स पहले भी ऐसी कई बड़ी वारदातों को अंजाम दे चुके हैं।
इस पूरी घटना ने आम निवेशकों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

आइए इस पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं।
बाइनेंस में क्या हुआ और कंपनी ने खुद को कैसे संभाला?
आसान शब्दों में कहें तो बाइनेंस की डिजिटल तिजोरी के ताले टूट गए हैं।
हैकर्स ने बाइनेंस की कड़ी सुरक्षा दीवारों को चकमा देकर उनके मुख्य सिस्टम में एंट्री ली और हजारों करोड़ रुपये के क्रिप्टो कॉइन्स अपने खातों में ट्रांसफर कर लिए।
हालात की गंभीरता को देखते हुए बाइनेंस ने तुरंत तीन बड़े फैसले लिए हैं:
पहला, लेन-देन पर रोक: जैसे ही उन्हें सिस्टम में सेंध लगने की भनक लगी, उन्होंने डिपॉजिट और विड्रॉल बटन बंद कर दिए ताकि हैकर्स और ज्यादा रकम न चुरा सकें।
दूसरा: ग्राहकों को नुकसान की भरपाई का भरोसा
बाइनेंस ने अपने यूजर्स को शांत करते हुए वादा किया है कि उनके पैसे सुरक्षित रखे जाएंगे।
अगर जांच में साबित होता है कि किसी ग्राहक के खाते से पैसा कटा है, तो कंपनी अपनी जेब से उसकी भरपाई करेगी।
तीसरा: जांच और एक्शन
बाइनेंस की साइबर सिक्योरिटी टीम ने दुनिया भर की पुलिस और साइबर विशेषज्ञों के साथ मिलकर हैकर्स को पकड़ने का अभियान शुरू कर दिया है।

यह हैकिंग कितनी बड़ी है?
अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो यह घटना क्रिप्टो इंडस्ट्री के लिए किसी बुरे सपने जैसी है।
इससे पहले साल 2025 में दुबई के ‘बायबिट’ एक्सचेंज से 1.5 बिलियन डॉलर (करीब 14,000 करोड़ रुपये) की चोरी हुई थी, जिसे तब तक की सबसे बड़ी हैकिंग कहा जाता था।
बाइनेंस की यह डकैती बायबिट वाले मामले से लगभग चार गुना ज्यादा बड़ी है।
उससे पहले 2022 में ‘रोनिन नेटवर्क’ से 625 मिलियन डॉलर (करीब 6,000 करोड़ रुपये) चुराए गए थे।

क्या भारतीयों के पैसों पर खतरा है?
बाइनेंस कोई छोटी-मोटी कंपनी नहीं है; इसके 100 से ज्यादा देशों में 30 करोड़ से अधिक यूजर्स हैं।
भारत में भी क्रिप्टो का क्रेज काफी है और अनुमान है कि करीब 2 से 2.5 करोड़ भारतीय बाइनेंस का इस्तेमाल करते हैं।
हालांकि, कंपनी ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि इस हैकिंग से कितने लोगों के निजी खाते प्रभावित हुए हैं।
फिलहाल सभी यूजर्स के अकाउंट लॉक मोड में हैं।

हैकर्स ने अंदर एंट्री कैसे ली?
बाइनेंस की शुरुआती जांच में पता चला है कि यह हैकिंग उनके किसी अंदरूनी सिस्टम की कमजोरी से शुरू हुई।
शक है कि कंपनी के ही एक डेवलपर इंजीनियर का लैपटॉप हैक किया गया था।
इसी लैपटॉप के जरिए हैकर्स को बाइनेंस के ‘सर्विस कंटेनर’ तक पहुंचने का रास्ता मिल गया और वहां से उन्होंने बिना किसी इजाजत के पैसे निकालने के ऑर्डर पास कर दिए।
राहत की बात यह है कि अभी तक किसी भी आम यूजर के पासवर्ड या ‘प्राइवेट की’ (Private Key) लीक होने की कोई खबर नहीं है।

चुराए गए पैसों को रोकने की कोशिश
बाइनेंस हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। कंपनी ने तुरंत एक्शन लेते हुए करीब 3 बिलियन डॉलर (लगभग 29,000 करोड़ रुपये) की संपत्तियों को फ्रीज कर दिया है। यानी आधी रकम को रोक दिया गया है।
लेकिन ब्लॉकचेन एक्सपर्ट्स का कहना है कि रोके गए पैसों को वापस हासिल करना इतना आसान नहीं है।
तकनीकी तौर पर किसी खाते को फ्रीज करने में सिर्फ कुछ मिनट लगते हैं, लेकिन उस पैसे को कानूनी तौर पर वापस पाने के लिए कोर्ट के चक्कर, वारंट और लंबी कागजी कार्यवाही करनी पड़ती है, जिसमें महीनों या सालों लग सकते हैं।

हैकर्स इन डिजिटल कॉइन्स को असली कैश में कैसे बदलते हैं?
यह सवाल सबके मन में आता है कि आखिर 60 हजार करोड़ की क्रिप्टो को हैकर्स अपनी जेब में कैसे डालेंगे।
जो एसेट बाइनेंस और अन्य कंपनियों ने ब्लॉक कर दिए हैं, वे तो बेकार हो गए।
लेकिन जो पैसा हैकर्स ब्लॉक होने से पहले निकाल ले गए, उसे वे बड़ी चालाकी से ठिकाने लगाते हैं:
* क्रिप्टो मिक्सर: वे ‘टॉरनेडो कैश’ जैसी सर्विस का इस्तेमाल करते हैं। यह एक ऐसी मशीन की तरह है जहां चोरी का पैसा और आम लोगों का सही पैसा एक साथ मिला दिया जाता है, जिससे यह पता लगाना नामुमकिन हो जाता है कि चोरी का पैसा कौन सा है।
* डिसेंट्रलाइज्ड एक्सचेंज: हैकर्स ऐसे प्लेटफॉर्म (जैसे यूनिस्वैप) पर जाते हैं जहां बिना आईडी कार्ड या KYC के एक क्रिप्टो को दूसरी क्रिप्टो में बदला जा सकता है।

* प्राइवेसी कॉइन्स: वे पैसों को ‘मोनरो’ जैसे खास कॉइन्स में बदल लेते हैं। इन कॉइन्स की खासियत ही यही है कि इनमें लेन-देन पूरी तरह गुप्त रहता है।
* डार्क वेब और फर्जी बैंक खाते: अपनी पहचान पूरी तरह छिपाने के बाद, हैकर्स डार्क वेब पर जाकर फर्जी पासपोर्ट और आईडी खरीदते हैं।
फिर वे नकली कंपनियों के नाम से बैंक खाते खोलकर इस पैसे को थोड़ा-थोड़ा करके निकालते हैं और गायब हो जाते हैं।

बाजार में मची खलबली और आगे का रास्ता
इस खबर का असर पूरे क्रिप्टो बाजार पर पड़ा है। खबर आते ही दुनिया की सबसे लोकप्रिय क्रिप्टोकरेंसी, बिटकॉइन की कीमत तुरंत 5% गिर गई।
एथेरियम और सोलाना जैसी बड़ी करेंसी भी औंधे मुंह गिरी हैं।
बाइनेंस के पूर्व सीईओ चांगपेंग झाओ (CZ) ने भी सोशल मीडिया पर माना है कि यह पूरा मामला एक सोची-समझी हैकिंग है।

2017 में शुरू हुई बाइनेंस के पास आज पूरी दुनिया के लोगों का करीब 160 बिलियन डॉलर (15 लाख करोड़ रुपये) जमा है।
फिलहाल, बाइनेंस की टीमें पुलिस और एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।
यूजर्स को सलाह दी गई है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और केवल बाइनेंस के आधिकारिक सोशल मीडिया और वेबसाइट के अपडेट्स पर भरोसा करें।

क्या होता है एसेट फ्रीजिंग?
जब भी कोई डिजिटल चोरी होती है, तो हैकर्स तुरंत पैसे को दूसरे वॉलेट में भेजने की कोशिश करते हैं।
ऐसे में ‘टेदर’ और ‘सर्कल’ जैसी कंपनियां, जो डिजिटल डॉलर (स्टेबलकॉइन) बनाती हैं, उनके पास ब्लॉकचेन के स्तर पर हैकर्स के एड्रेस को ब्लैकलिस्ट करने की ताकत होती है। इसे ही एसेट फ्रीजिंग कहते हैं।
एक बार एड्रेस फ्रीज हो जाने पर, हैकर उस पैसे को न तो किसी को भेज सकता है और न ही असली पैसों में बदल सकता है।
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