Modi Putin Meeting BRICS Summit 2026: वैश्विक आर्थिक हलचलों और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत की राजधानी नई दिल्ली में ब्रिक्स (BRICS) देशों की महाबैठक शुरू हो चुकी है।
इस सम्मेलन के दौरान भारत ने दुनिया के व्यापारिक ढांचे में एक नया बदलाव लाने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया है।
भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ब्रिक्स के सदस्य और साझेदार देशों से अपील की है कि वे अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करें और एक-दूसरे की स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में कारोबार बढ़ाएं।
इसके साथ ही उन्होंने सभी देशों को अपनी-अपनी डिजिटल पेमेंट प्रणालियों को आपस में जोड़ने का सुझाव दिया है।

यह पूरी पहल ऐसे समय में हो रही है जब रूस-यूक्रेन संघर्ष, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में टैरिफ नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह दुनिया के व्यापार को अधिक सुलभ, सुरक्षित और किफ़ायती बनाने के पक्ष में है।
पीयूष गोयल की अपील और UPI का वैश्विक डंका
‘ब्रिक्स बिजनेस फोरम 2026’ के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की तारीफ की।
उन्होंने कहा कि भारत का ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ यानी UPI आज दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट मॉडल बन चुका है।
भारत में UPI सालाना 250 अरब से भी ज्यादा लेन-देन संभाल रहा है, जो कि पूरी दुनिया में होने वाले कुल डिजिटल लेन-देन का आधा से अधिक हिस्सा है।

गोयल ने बताया कि आज दुनिया के 11 देशों में भारत का UPI स्वीकार किया जा रहा है।
उन्होंने ब्रिक्स देशों को न्योता दिया कि वे भारत के साथ मिलकर अपनी बैंकिंग और पेमेंट प्रणालियों को इंटीग्रेट करें।
इससे न सिर्फ सदस्य देश एक-दूसरे की करेंसी में आसानी से व्यापार कर पाएंगे, बल्कि भविष्य की तकनीकों और डिजिटल इकोनॉमी को भी नई रफ्तार मिलेगी।
क्या है BRICS का नया पेमेंट प्लान?
दुनिया के कुल निर्यात में ब्रिक्स देशों का हिस्सा लगभग 24 से 26 प्रतिशत के करीब है।
साल 2024 में ही इन देशों के बीच लगभग 1.17 लाख करोड़ डॉलर का आपसी व्यापार हुआ था।
इतनी बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद, ज्यादातर लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर या SWIFT सिस्टम का सहारा लेना पड़ता है।
अब ब्रिक्स देश इस निर्भरता को खत्म करने के लिए ‘क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट मॉडल’ पर तेजी से काम कर रहे हैं।
भारत, चीन और रूस मिलकर एक ऐसा तकनीकी ढांचा तैयार कर रहे हैं, जिससे केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी की जाने वाली डिजिटल करेंसी (CBDC) को आपस में जोड़ा जा सके।

सरल शब्दों में समझें भारत की योजना:
* साझा करेंसी नहीं, जुड़ा हुआ सिस्टम:
भारत किसी एक साझी ‘ब्रिक्स करेंसी’ का समर्थन नहीं कर रहा है।
इसके बजाय भारत का प्रस्ताव है कि हर देश की अपनी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी—जैसे भारत का e-Rupee (ई-रुपया), चीन का Digital Yuan और रूस का Digital Ruble—को एक कॉमन डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए।
* स्वायत्तता बरकरार:
इसमें हर देश की करेंसी पर उसी का नियंत्रण रहेगा, लेकिन आपस में लेनदेन करते समय किसी तीसरे देश की मुद्रा (जैसे डॉलर) की जरूरत नहीं पड़ेगी।
* मध्यस्थों का खात्मा:
सीधे डिजिटल सिस्टम से जुड़ने के कारण विदेशी बैंकों (Intermediary Banks) पर निर्भरता खत्म हो जाएगी, जिससे लेन-देन की फीस में भारी कटौती होगी।
स्विफ्ट (SWIFT) और डॉलर का विकल्प, लेकिन बिना किसी टकराव के
अक्सर यह माना जाता है कि ब्रिक्स का यह कदम अमेरिकी डॉलर और पश्चिमी देशों के स्विफ्ट (SWIFT) पेमेंट नेटवर्क को चुनौती देने के लिए है।
हालांकि, भारत ने अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। भारत का मकसद किसी देश या ब्लॉक के खिलाफ खड़ा होना नहीं है।
भारत एक ऐसा लचीला और पारदर्शी सिस्टम चाहता है, जो पूरी तरह से द्विपक्षीय (Bilateral) हो।
यानी भारत और रूस आपस में व्यापार करें तो रुपए-रूबल में निपटारा हो जाए, और भारत-चीन के बीच लेनदेन उनकी अपनी डिजिटल करेंसी में हो सके।
इससे ब्रिक्स देश अमेरिका या पश्चिमी देशों के साथ सीधा टकराव किए बिना अपना व्यापार सुगम बना सकेंगे।
नेट सेटलमेंट साइकिल: कैसे काम करेगा यह नया मॉडल?
ब्रिक्स का यह नया डिजिटल पेमेंट मॉडल ‘नेट सेटलमेंट साइकिल’ पर आधारित होगा।
इसका मतलब है कि हर छोटे-बड़े सामान की खरीद-बिक्री पर तुरंत पैसे ट्रांसफर करने के बजाय एक निश्चित समय (जैसे एक महीना) में कुल आयात और निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा।
* उदाहरण से समझें: यदि भारत एक महीने में चीन से 500 अरब रुपये का सामान आयात करता है और उसी महीने चीन भारत से 450 अरब रुपये का सामान खरीदता है, तो महीने के अंत में भारत को चीन को सिर्फ अंतर की रकम यानी 50 अरब रुपये ही ट्रांसफर करने होंगे।
* इस तरीके से बार-बार करेंसी एक्सचेंज करने का खर्च बचेगा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिक्विडिटी का दबाव भी कम होगा।
दिल्ली में पुतिन-मोदी की 45 मिनट की खास मुलाकात
ब्रिक्स सम्मेलन के बीच एक और सबसे बड़ी खबर नई दिल्ली के भारत मंडपम से आई, जहां भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच द्विपक्षीय बातचीत हुई।
दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाकर स्वागत किया और लगभग 45 मिनट तक कई अहम मुद्दों पर चर्चा की।
बैठक की सबसे खास बात यह रही कि इसके बाद दोनों शीर्ष नेता एक ही कार में सवार होकर इंडस्ट्रियल एग्जिबिशन का जायजा लेने पहुंचे।

राष्ट्रपति पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस आने का आधिकारिक न्योता भी दिया, जिसे पीएम मोदी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया है।
भारत और रूस के बीच रक्षा और व्यापारिक समझौते संभव
सूत्रों के अनुसार, पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच हुई इस बैठक में कई ऐतिहासिक समझौतों की नींव रखी गई है:
* डिफेंस डील: भारत रूस से रडार की पकड़ में न आने वाला आधुनिक सुखोई-57 (Sukhoi-57) स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने पर विचार कर रहा है। इसके अलावा, S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की बाकी खेप और एडवांस ब्रह्मोस-NG (BrahMos-NG) मिसाइल प्रोजेक्ट पर भी चर्चा हुई है।
* 100 अरब डॉलर का व्यापार: दोनों देशों ने साल 2030 तक अपने आपसी कारोबार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का बड़ा लक्ष्य रखा है।
* अन्य क्षेत्र: रेलवे, स्टील, टनलिंग टेक्नोलॉजी, न्यूक्लियर एनर्जी, क्रिटिकल मिनरल्स, उर्वरक (Fertilizers) और भारतीय कंपनियों को रूसी बाजार में ज्यादा पहुंच देने जैसे विषयों पर भी सहमति बनने की उम्मीद है।

क्या है BRICS का दायरा और इसकी ताकत?
ब्रिक्स की शुरुआत मूल रूप से 5 देशों—ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से हुई थी।
लेकिन 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब को इसमें शामिल किया गया। साल 2025 में इंडोनेशिया भी इसका पूर्ण सदस्य बन गया।
इसके अलावा बेलारूस, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, वियतनाम, कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देश ब्रिक्स के ‘पार्टनर कंट्री’ बन चुके हैं।
BRICS का वैश्विक प्रभाव:
* आबादी: दुनिया की कुल जनसंख्या का करीब 49.5% हिस्सा।
* जीडीपी (GDP): वैश्विक अर्थव्यवस्था की कुल जीडीपी का लगभग 40%।
* व्यापार: पूरी दुनिया के कुल व्यापार का करीब 26% हिस्सा।
नई दिल्ली में आयोजित हो रहा यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था का नया अध्याय लिख रहा है।
भारत के UPI मॉडल और डिजिटल करेंसी के एकीकरण से जहां ब्रिक्स देशों को व्यापार में आसानी होगी, वहीं डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम भी कम होंगे।
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