India Tequila Market Growth: भारत में शराब की पसंद अब सिर्फ ‘पटियाला पेग’ या ‘बियर की कैन’ तक सीमित नहीं रही।
देश के प्रीमियम अल्कोहल मार्केट में एक बहुत बड़ा बदलाव आया है।
ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, भारत अब दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता एगेव स्पिरिट्स (Agave Spirits) बाजार बन गया है।
इंटरनेशनल वाइन एंड स्पिरिट्स रिकॉर्ड (IWSR) की स्टडी के मुताबिक, 21 बड़े देशों की लिस्ट में भारत ने पहले पायदान पर कब्जा किया है।
आंकड़ों की जुबानी: क्यों चौंका रहा है भारत?
साल 2024-25 के दौरान भारतीय बाजार में जो उछाल देखा गया, उसने बड़े-बड़े दिग्गजों को हैरान कर दिया है।
वॉल्यूम में बढ़त: टकीला की बिक्री की मात्रा (Volume) में 31% का इजाफा हुआ है।
वैल्यू में बढ़त: टकीला पर होने वाले खर्च (Value) में 40% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय न केवल ज्यादा टकीला पी रहे हैं, बल्कि वे अब महंगे और प्रीमियम ब्रांड्स पर पैसा खर्च करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं।
जानकारों का मानना है कि अगर यही रफ्तार बनी रही, तो 2031 तक भारत में टकीला की खपत आज के मुकाबले दोगुनी हो जाएगी।
शॉट्स का दौर गया, अब है ‘पालोमा’ और ‘पिकांटे’ का जमाना
एक वक्त था जब टकीला का मतलब सिर्फ पार्टी में ‘सॉल्ट और लेमन’ के साथ लिए जाने वाले कड़वे शॉट्स होते थे। लेकिन आज कहानी बदल चुकी है।
डियाजियो इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, भारत में टकीला की 60% खपत कॉकटेल के जरिए हो रही है।
शहरी युवाओं के बीच पालोमा (Paloma) और पिकांटे (Picante) जैसे कॉकटेल बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं।
सोशल मीडिया और ग्लोबल ट्रैवल ने युवाओं को यह सिखाया है कि टकीला सिर्फ नशा करने के लिए नहीं, बल्कि स्वाद का आनंद लेने (Sipping Culture) के लिए भी है।
अब लोग इसे व्हिस्की की तरह धीरे-धीरे पीना पसंद कर रहे हैं।
देसी एगेव: दक्कन के पठार से निकली नई क्रांति
तकनीकी रूप से ‘टकीला’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ मेक्सिको के खास इलाकों में बने ड्रिंक्स के लिए किया जा सकता है। लेकिन भारतीय उद्यमियों ने इसका तोड़ निकाल लिया है।
भारत के दक्कन के पठार (Deccan Plateau) की मिट्टी और जलवायु एगेव के पौधे (जिससे टकीला बनती है) के लिए बिल्कुल वैसी ही है जैसी मेक्सिको की है।
आज ‘माया पिस्तोला एगवेपुरा’ जैसे कई भारतीय ब्रांड्स बाजार में अपनी धाक जमा रहे हैं।
ये कंपनियां विदेशी ब्रांड्स को कड़ी टक्कर दे रही हैं।
इतना ही नहीं, भारत में अब अल्ट्रा-प्रीमियम सेगमेंट भी खुल गया है।
जल्द ही बाजार में ऐसे एगेव स्पिरिट्स आने वाले हैं जिनकी एक बोतल की कीमत 20,000 से 30,000 रुपये तक होगी।
यह इस बात का सबूत है कि भारतीय ग्राहकों की जेब अब लग्जरी के लिए तैयार है।
क्यों बढ़ रही है इतनी डिमांड? (प्रमुख कारण)
1. प्रीमियमाइजेशन: मध्यम वर्ग की आय बढ़ी है और अब वे ‘सस्ती’ के बजाय ‘अच्छी’ क्वालिटी की शराब पसंद कर रहे हैं।
2. कॉकटेल कल्चर: मेट्रो शहरों (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु) में बार और पब्स ने टकीला को एक ‘कूल’ और ‘सोफिस्टिकेटेड’ ड्रिंक के रूप में पेश किया है।
3. युवा आबादी: भारत की बड़ी युवा आबादी नए स्वादों के साथ एक्सपेरिमेंट करने से नहीं डरती।
4. स्थानीय उत्पादन: भारत में एगेव की खेती बढ़ने से अब ताज़ा और बेहतरीन स्पिरिट्स स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हैं।
अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए खुशखबरी
यह सिर्फ पीने-पिलाने की बात नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा संकेत है।
2031 तक खपत दोगुनी होने का मतलब है कि इस सेक्टर में भारी निवेश आएगा और हजारों नए रोजगार पैदा होंगे।
सबसे बड़ा फायदा दक्कन के पठार के उन किसानों को होगा जो बंजर जमीन पर एगेव की खेती कर रहे हैं।
यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक अलग लेकिन महत्वपूर्ण कदम है।
एक नई शुरुआत
भारत में टकीला का भविष्य बहुत उज्ज्वल नजर आ रहा है।
यह अब केवल एक ‘पार्टी ड्रिंक’ नहीं रह गया है, बल्कि एक लाइफस्टाइल चॉइस बन गया है।
2034 तक इसके सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) के 14% रहने का अनुमान है, जो इसे निवेश के लिए भी एक हॉट सेक्टर बनाता है।
टकीला और एगेव स्पिरिट्स: क्या है अंतर?
अक्सर लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें एक बुनियादी फर्क है:
टकीला: यह केवल मेक्सिको के विशिष्ट क्षेत्रों में ‘ब्लू एगेव’ पौधे से बनाई जा सकती है। इसे ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशन’ (GI Tag) प्राप्त है।
एगेव स्पिरिट्स: एगेव पौधे से बनी कोई भी शराब जो मेक्सिको के उन खास इलाकों के बाहर बनी हो, उसे एगेव स्पिरिट्स कहा जाता है। भारत में बनने वाले ड्रिंक्स इसी श्रेणी में आते हैं।
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