Ram Van Gaman Path Danger: कहते हैं कि ‘राम से बड़ा राम का नाम’ होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के गलियारों और हसदेव के जंगलों से जो आवाजें आ रही हैं, वे कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।
यहाँ आस्था, पर्यावरण और कॉरपोरेट के मुनाफे के बीच एक बड़ी जंग छिड़ गई है।
केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के घने जंगलों के बीच एक नए कोयला खदान (कोल ब्लॉक) को हरी झंडी दे दी है।
इस खदान के संचालन का जिम्मा देश के बड़े उद्योगपति अडानी के पास है।

इस मंजूरी के बाद से ही राज्य की सियासत और सामाजिक गलियारों में भूचाल आ गया है।
आरोप लग रहे हैं कि इस प्रोजेक्ट की वजह से भगवान राम और माता सीता की पावन स्मृतियाँ हमेशा-हमेशा के लिए मिट जाएंगी।
आस्था पर संकट: मिट जाएंगे भगवान राम और माता सीता के पदचिन्ह
छत्तीसगढ़ का इतिहास और संस्कृति प्रभु श्री राम से गहराई से जुड़ी हुई है।
माना जाता है कि अपने 14 वर्षों के वनवास के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने एक लंबा समय छत्तीसगढ़ के जंगलों में बिताया था।
यहाँ ऐसे कई पौराणिक स्थल हैं, जिनसे लोगों की अटूट आस्था जुड़ी है।

अब इस नए कोल ब्लॉक के आने से रामगढ़ की ऐतिहासिक पहाड़ियाँ, प्राचीन नाट्यशाला, सीता गुफा और जानकी रसोई (जहाँ माता सीता भोजन बनाती थीं) जैसे पवित्र स्थलों के अस्तित्व पर सीधा संकट मंडराने लगा है।
स्थानीय लोगों और जानकारों का कहना है कि खदानों में होने वाले भारी-भरकम धमाकों (ब्लास्टिंग) और खुदाई से ये पौराणिक स्थल ढह सकते हैं।

‘सेंट्रल इंडिया के लंग्स’ पर चलेगी कुल्हाड़ी
इस पूरी परियोजना के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने केते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल माइनिंग और पिट हेड कोल वॉशरी प्रोजेक्ट के तहत लगभग 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन कार्यों (यानी खनन) के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी दी है।
राज्य की हरी झंडी के बाद केंद्र सरकार ने भी इसे पास कर दिया है।
इस मंजूरी का सीधा और खौफनाक असर यह होगा कि इस इलाके के करीब 7 लाख से ज्यादा पेड़ों को काट दिया जाएगा।

आपको बता दें कि हसदेव अरण्य के इन घने जंगलों को ‘सेंट्रल इंडिया का लंग्स ज़ोन’ (मध्य भारत के फेफड़े) कहा जाता है, क्योंकि ये पूरे क्षेत्र को शुद्ध हवा और पानी देते हैं।
इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से न सिर्फ पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा, बल्कि देश में ऑक्सीजन का एक बड़ा स्रोत भी कम हो जाएगा।
आदिवासियों का गुस्सा और ‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’
इस फैसले के खिलाफ हसदेव अरण्य के स्थानीय आदिवासियों ने मोर्चा खोल दिया है।
‘छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन’ के बैनर तले कई गाँवों के लोग महीनों से सड़कों पर हैं।
आदिवासियों का कहना है कि यह इलाका संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आता है, जहाँ ग्राम सभा की अनुमति के बिना पत्ता भी नहीं हिलना चाहिए।
कई ग्राम सभाओं ने इस प्रोजेक्ट के खिलाफ बकायदा प्रस्ताव पारित किए हैं, लेकिन सरकार उनकी आवाज नहीं सुन रही है।

इस खनन से आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन तो छिनेंगे ही, साथ ही जंगलों में सदियों से स्थापित उनके देवी-देवताओं के स्थान भी नष्ट हो जाएंगे।
इसके अलावा, यह इलाका हाथियों का प्राकृतिक घर (एलीफेंट कॉरिडोर) भी है।
जंगल कटने से हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष और ज्यादा हिंसक हो जाएगा।

राजनीतिक घमासान: विपक्ष ने सरकार को घेरा
इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की राजनीति भी पूरी तरह गरमा गई है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने राज्य और केंद्र की बीजेपी सरकार पर तीखा हमला बोला है।
प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता वंदना राजपूत ने साफ शब्दों में कहा कि सरकार छत्तीसगढ़ को ‘अडानीगढ़’ बनाने पर तुली हुई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मित्र अडानी के आर्थिक फायदे के लिए सरगुजा रेंज की इस बेशकीमती जमीन को कौड़ियों के भाव सौंपा जा रहा है।

विपक्ष का कहना है कि आज की सरकार के लिए भगवान राम की आस्था से बड़ा एक उद्योगपति का मुनाफा हो गया है।
तरक्की और विकास अपनी जगह जरूरी हैं, लेकिन क्या इसकी कीमत अपनी प्राचीन संस्कृति, आस्था और जीवन देने वाले पर्यावरण को उजाड़कर चुकाई जानी चाहिए?
जानकारों का मानना है कि अगर विकास के नाम पर इसी तरह प्रकृति और इतिहास के साथ खिलवाड़ होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
सरकार को अब यह सोचना होगा कि विकास की इस अंधी दौड़ की सीमा रेखा कहाँ तय की जाए।
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