Meta Algorithm Dispute: आजकल हम स्मार्टफोन पर घंटों स्क्रॉल करते हैं।
फेसबुक, इंस्टाग्राम या एक्स (ट्विटर) पर जो कंटेंट हमारे सामने आता है, हमें लगता है कि यह सब स्वाभाविक रूप से आ रहा है। लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है।
आपकी स्क्रीन पर क्या दिखेगा, किस खबर को करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जाएगा और किसे दबा दिया जाएगा—यह सब सोशल मीडिया कंपनियों का अदृश्य एल्गोरिदम तय करता है।
इसी गंभीर मुद्दे को लेकर भारत सरकार अब पूरी तरह सख्त हो गई है।

हाल ही में केंद्र सरकार ने मेटा (फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी) की वैश्विक टीम को दिल्ली तलब किया और उनसे यह समझना चाहा कि उनका एल्गोरिदम किस तरह से काम करता है और कंटेंट की पहुंच (Reach) कैसे तय होती है।
सरकार की चिंता: फेक न्यूज से आगे बढ़कर नैरेटिव कंट्रोल तक पहुंची बात
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के सामने मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी कार्यप्रणाली को लेकर एक प्रेजेंटेशन दिया।
सरकार की सबसे बड़ी चिंता अब सिर्फ फेक न्यूज या डीपफेक तक सीमित नहीं है, बल्कि उस तकनीक को लेकर है जो देश की जनता की सोच और नैरेटिव को प्रभावित कर सकती है।
सरकार ने पूछा कि किसी खास तरह के कंटेंट को अचानक बहुत ज्यादा बढ़ावा कैसे मिल जाता है?
क्या पेड प्रमोशन या सिफारिशी सिस्टम (Recommendation Engine) का इस्तेमाल कर राजनीतिक या संवेदनशील मुद्दों पर जनमत को एक निश्चित दिशा में मोड़ा जा सकता है?

समझिए कैसे काम करता है एल्गोरिदम और फेक ट्रेंड्स का खेल
सोशल मीडिया एल्गोरिदम को इस तरह से बनाया गया है कि वह यूजर के व्यवहार का लगातार विश्लेषण करता रहता है।
* पसंद और आदत का विश्लेषण: आप किस तरह के वीडियो पर रुकते हैं, कौन सी पोस्ट को लाइक करते हैं या किस कंटेंट पर कमेंट करते हैं—एल्गोरिदम इसका रिकॉर्ड रखता है।
* फिल्टर बबल और नैरेटिव का निर्माण: आपकी रुचि भांपने के बाद सिस्टम आपको लगातार उसी तरह का कंटेंट दिखाता है। इससे एक ‘इको चैंबर’ या नैरेटिव बनता है, जहां यूजर को लगता है कि पूरा देश उसी मुद्दे पर वैसा ही सोच रहा है।
* बॉट्स और फर्जी अकाउंट्स की घुसपैठ: हजारों फर्जी अकाउंट (बॉट्स) एक साथ एक ही हैशटैग या मैसेज शेयर करते हैं। इससे आर्टिफिशियल ट्रेंड पैदा होता है।
आम लोग इसे असली जनमत समझ बैठते हैं, जबकि इसके पीछे कोई संगठित नेटवर्क या एजेंसी हो सकती है।

एल्गोरिदम ऑडिट की चुनौती और इंसानी मॉडरेशन पर जोर
मौजूदा समय में कोई ऐसा सख्त कानूनी प्रावधान नहीं है, जिसके तहत सरकार या कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी टेक कंपनियों के एल्गोरिदम का तकनीकी ऑडिट (Technical Audit) कर सके।
यही वजह है कि यह पूरी प्रणाली अब तक पूरी तरह से निजी टेक कंपनियों की बंद मुट्ठी में रही है।
केंद्र सरकार ने इस स्थिति पर असंतोष जताते हुए मेटा को स्पष्ट संदेश दिया है।
सरकार का कहना है कि राजनीतिक संवेदनशीलता, देशव्यापी विरोध प्रदर्शन, चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज मटीरियल (CSAM) और डीपफेक जैसे गंभीर मामलों में केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) के भरोसे नहीं रहा जा सकता।

ऐसे संवेदनशील मामलों में तुरंत सही फैसले लेने के लिए मानव हस्तक्षेप (Human Moderation) को बढ़ाना बेहद जरूरी है।
साइबर सुरक्षा पर नया खतरा: टेलीग्राम फाउंडर की ‘टेकडाउन एक्सटॉर्शन’ की चेतावनी
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एल्गोरिदम के साथ-साथ ऐप डिस्ट्रीब्यूशन पर भी खतरे मंडरा रहे हैं।
टेलीग्राम के संस्थापक पावेल दुरोव ने एक नए साइबर खतरे का खुलासा किया है, जिसे उन्होंने ‘टेकडाउन एक्सटॉर्शन’ (Takedown Extortion) नाम दिया है।
दुरोव के अनुसार, कुछ साइबर हमलावर या दबाव समूह किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जानबूझकर आपत्तिजनक चीजें फैलाते हैं और फिर टेक कंपनियों पर दबाव बनाकर उस ऐप को सीधे ऐप स्टोर (जैसे एपल ऐप स्टोर या गूगल प्ले स्टोर) से हटवाने की साजिश रचते हैं।

दुरोव ने दावा किया कि हाल ही में एपल ने बिना किसी पूर्व सूचना के टेलीग्राम ऐप को कुछ समय के लिए अपने ऐप स्टोर से हटा दिया था, हालांकि बाद में तकनीकी प्रक्रिया पूरी होने पर इसे वापस बहाल कर दिया गया।
कुलमिलाकर, डिजिटल दौर में जब इंटरनेट हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है, तब पारदर्शी एल्गोरिदम और निष्पक्ष कंटेंट मॉडरेशन बेहद जरूरी हो गए हैं।
सरकार की यह सख्ती यह साफ करती है कि भारत अपने नागरिकों के डिजिटल अधिकारों, साइबर सुरक्षा और लोकतंत्र को किसी भी अल्गोरिदम के अदृश्य खेल से प्रभावित नहीं होने देगा।
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