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वंदे मातरम् की ‘अनिवार्यता’ ने बढ़ाई इंदौर कांग्रेस में तल्खी: फौजिया-रुबीना के बयान से पार्टी में दो फाड़

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Vande Mataram Controversy Indore: इंदौर नगर निगम के बजट सत्र के दौरान शुरू हुआ ‘वंदे मातरम्’ विवाद अब केवल एक नगर निगम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने कांग्रेस पार्टी के भीतर की गहरी दरार को उजागर कर दिया है।

8 अप्रैल को बजट सत्र की शुरुआत में जब वंदे मातरम् गाया जा रहा था, तब कांग्रेस पार्षद फौजिया शेख अलीम ने इसे गाने से इनकार कर दिया।

इसके बाद जो सियासी तूफान उठा, उसने कांग्रेस को हिंदू और मुस्लिम गुटों में स्पष्ट रूप से बांट दिया है।

विवाद की शुरुआत और पार्षदों का कड़ा रुख

विवाद तब गहराया जब फौजिया शेख अलीम को सदन से बाहर कर दिया गया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए एक अन्य पार्षद रूबीना इकबाल खान ने बेहद तल्ख तेवर अपनाए।

उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि “वंदे मातरम् गाने के लिए किसी का बाप हमें मजबूर नहीं कर सकता।”

रूबीना यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने कांग्रेस पार्टी के प्रति अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा कि “पार्टी जाए भाड़ में,” और संकेत दिए कि वे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी (AIMIM) में शामिल हो सकती हैं।

उन्होंने यह भी दावा किया कि वे निर्दलीय चुनाव जीतने का दम रखती हैं और कांग्रेस का मुसलमानों से कोई स्थायी अनुबंध नहीं है।

कांग्रेस के भीतर मचा घमासान

इस विवाद ने कांग्रेस के हिंदू और मुस्लिम नेताओं को आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

एक तरफ शहराध्यक्ष चिंटू चौकसे हैं, जिन्होंने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए घोषणा की है कि अब कांग्रेस के हर कार्यक्रम की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ से होगी।

उन्होंने इसे ‘नैतिक जिम्मेदारी’ बताया और दो टूक कहा कि जिसे वंदे मातरम् से परहेज है, वह पार्टी की बैठकों में न आए।

 

दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अल्पसंख्यक प्रभारी डॉ. अमीनुल खान सूरी ने चौकसे के इस फैसले को ‘तानाशाही’ करार दिया है।

उनका तर्क है कि वंदे मातरम् का सम्मान करना अलग बात है, लेकिन इसे अनिवार्य करना गलत है, क्योंकि कांग्रेस के इतिहास में कभी भी इसे थोपा नहीं गया।

केके मिश्रा ने कहा ब्लैकमेलर 

कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा ने इस मामले में बेहद सख्त टिप्पणी की है।

उन्होंने दोनों महिला पार्षदों को ‘ब्लैकमेलर’ बताते हुए कहा कि जो लोग राष्ट्र धर्म नहीं निभा सकते, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।

मिश्रा ने आरोप लगाया कि ये पार्षद भाजपा के साथ मिलीभगत कर रहे हैं ताकि नगर निगम में घिरी हुई भाजपा को ऑक्सीजन मिल सके।

उन्होंने पार्टी नेतृत्व से दोनों को निष्कासित करने की मांग की है।

जीतू पटवारी की मुश्किलें बढ़ी 

यह मामला इसलिए भी पेचीदा है क्योंकि फौजिया शेख के पति शेख अलीम, जो कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के प्रदेश अध्यक्ष हैं, वे पीसीसी चीफ जीतू पटवारी के बेहद करीबी माने जाते हैं।

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इस विवाद ने अब पटवारी को भी रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है।

भाजपा ने इस मौके को लपकते हुए कांग्रेस पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाया है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने इसे ‘राष्ट्रीय चेतना’ का अपमान बताया है।

क्या कहता है कानून और इतिहास?

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च को एक फैसले में स्पष्ट किया है कि वंदे मातरम् गाना अनिवार्य नहीं है और इसे न गाने पर किसी सजा का प्रावधान नहीं है।

हालांकि, यह गीत भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत पहली बार 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा गाया गया था।

फिलहाल, इंदौर कांग्रेस ने पार्षद रूबीना खान के निष्कासन का प्रस्ताव प्रदेश कमेटी को भेज दिया है।

यह विवाद बताता है कि चुनाव के समय कांग्रेस के भीतर वैचारिक मतभेद और अनुशासन की कमी उसे भारी पड़ सकती है।

जहाँ एक पक्ष राष्ट्रवाद की पिच पर भाजपा को टक्कर देना चाहता है, वहीं दूसरा अपनी धार्मिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की दुहाई दे रहा है।

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