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ISRO के 100 दिग्गजों ने छोड़ी नौकरी! चंद्रयान और गगनयान मिशन पर संकट देख सरकार ने बदला 6 साल पुराना नियम

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

ISRO Scientist Resignation: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) इस समय एक अनोखी चुनौती से जूझ रहा है।

यह चुनौती अंतरिक्ष की नहीं, बल्कि अपने ही घर की है।

भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मिशन ‘गगनयान’ और ‘चंद्रयान-3’ को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले वैज्ञानिक और तकनीकी एक्सपर्ट्स लगातार नौकरी छोड़ रहे हैं।

पिछले 10 महीनों में 100 से ज्यादा वैज्ञानिकों और कर्मचारियों ने इसरो को अलविदा कह दिया है।

इस बड़े ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) से घबराकर भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (DoS) ने 14 जुलाई 2026 को एक बेहद सख्त कदम उठाया है।

अब इसरो का कोई भी ग्रुप-ए वैज्ञानिक या तकनीकी कर्मचारी अपनी मर्जी से न तो इस्तीफा दे पाएगा और न ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले सकेगा।

आखिर क्यों लगी इस्तीफों पर रोक?

सरकार के इस फैसले की सबसे बड़ी वजह यह है कि वैज्ञानिकों के अचानक जाने से गगनयान, चंद्रयान-4 और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) जैसे बेहद महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स पर बुरा असर पड़ रहा है।

सबसे ज्यादा इस्तीफे बेंगलुरु के यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) और तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से सामने आए हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि इस्तीफा देने वालों में कोई छोटे-मोटे कर्मचारी नहीं, बल्कि बड़े-बड़े प्रोजेक्ट डायरेक्टर शामिल हैं।

उदाहरण के तौर पर, VSSC में जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV Mk III/LVM3) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे वरिष्ठ वैज्ञानिक विक्टर जोसेफ टी ने भी फरवरी में इस्तीफा दे दिया था।

यह वही रॉकेट है जो भारत के गगनयान मिशन के तहत इंसानों को अंतरिक्ष में लेकर जाएगा।

ऐसे दिग्गजों के जाने से अंतरिक्ष विभाग की चिंताएं सातवें आसमान पर पहुंच गईं।

2020 का नियम बदला, अब दिल्ली दरबार करेगा फैसला

साल 2020 में सरकार ने प्रशासनिक सुधार करते हुए इसरो के अलग-अलग केंद्रों के निदेशकों (Directors) को यह अधिकार दिया था कि वे अपने स्तर पर इस्तीफा या VRS मंजूर कर सकते हैं।

लेकिन अब इस नियम को पूरी तरह पलट दिया गया है।

नए आदेश के मुताबिक, अब साइंटिस्ट/इंजीनियर-एसजी रैंक या उससे नीचे के किसी भी कर्मचारी का इस्तीफा सीधे मंजूर नहीं होगा।

केंद्र के निदेशकों को अपनी स्पष्ट सिफारिश के साथ यह फाइल सीधे दिल्ली में अंतरिक्ष विभाग को भेजनी होगी।

अंतिम फैसला विभाग के उच्च अधिकारी ही करेंगे, यानी अब नौकरी छोड़ना बेहद मुश्किल होने वाला है।

प्राइवेट कंपनियों का ‘मायाजाल’ और भारी-भरकम पैकेज

सवाल उठता है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान को छोड़कर वैज्ञानिक जा कहां रहे हैं?

इसका सीधा जवाब है- प्राइवेट स्पेस स्टार्टअप्स।

साल 2020 में जब सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला और 2023 में नई अंतरिक्ष नीति लागू की, तब से भारत में प्राइवेट स्पेस सेक्टर में बाढ़ आ गई है।

इस समय देश में 400 से ज्यादा रजिस्टर्ड स्पेस स्टार्टअप्स हैं।

इनमें पिक्सेल (Pixxel), ध्रुवा स्पेस (Dhruva Space), स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace), अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी कंपनियां शामिल हैं।

इन कंपनियों में विदेशी और घरेलू निवेशकों ने पानी की तरह पैसा बहाया है।

सिर्फ 2025 में ही इन स्टार्टअप्स में करीब 150 मिलियन डॉलर (लगभग 1250 करोड़ रुपये) का निवेश आया है।

ये स्टार्टअप्स इसरो के अनुभवी वैज्ञानिकों को सरकारी सैलरी के मुकाबले कई गुना ज्यादा बेहतर पैकेज, सुख-सुविधाएं और काम करने के नए अवसर दे रहे हैं।

यहां तक कि इसरो के पूर्व चेयरमैन डॉ. एस. सोमनाथ भी जनवरी 2025 में रिटायर होने के बाद चेन्नई के स्पेस स्टार्टअप ‘अग्निकुल कॉसमॉस’ के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में बतौर ऑब्जर्वर शामिल हो चुके हैं।

मिशन फेल होने का बढ़ा दबाव

वैज्ञानिकों की कमी और अंदरूनी उथल-पुथल का असर इसरो के ऑपरेशन्स पर भी दिखने लगा है।

इसरो का सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाने वाला PSLV एक साल के भीतर लगातार दो बार फेल हो चुका है।

पहला झटका (मई 2024): PSLV-C61/EOS-09 मिशन के दौरान उड़ान भरने के 203 सेकंड बाद रॉकेट के तीसरे चरण का प्रेशर अचानक गिर गया, जिससे करोड़ों का रडार सैटेलाइट नष्ट हो गया।

दूसरा झटका (जनवरी 2026): PSLV-C62 मिशन के दौरान तीसरे चरण में आई खराबी के कारण रॉकेट तय रास्ते से भटक गया और पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (EOS-N1) अपनी कक्षा में नहीं पहुंच पाया।

चुनौतियां बड़ी, लेकिन हौसले बुलंद

भले ही इसरो इस समय वैज्ञानिकों की कमी और हालिया असफलताओं से जूझ रहा है, लेकिन इसके बड़े प्रोजेक्ट्स रुके नहीं हैं।

भारत को अपने दम पर इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बनाने का सपना (गगनयान मिशन) अब भी पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है।

इसके साथ ही मंगलयान-2 और चांद से मिट्टी वापस लाने वाले चंद्रयान-4 मिशन पर भी काम जारी है।

सरकार की इस नई सख्ती का मकसद यही है कि अहम प्रोजेक्ट्स के बीच में कोई भी वैज्ञानिक देश का साथ छोड़कर न जाए।

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