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MP में गरमाया किसानों का मुद्दा: आंदोलन से पहले ही पुलिस ने किसी को रास्ते में रोका किसी को किया घर में कैद

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

Farmer Leaders House Arrest: मध्य प्रदेश में एक बार फिर किसानों और सरकार के बीच तनातनी का माहौल बन गया है।

अपनी 15 सूत्रीय मांगों को लेकर मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने की तैयारी कर रहे ‘राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ’ के आंदोलन को प्रशासन ने शुरू होने से ठीक पहले ही रोकने की कोशिश की है।

प्रदेश के करीब 30 जिलों से हजारों किसान और कार्यकर्ता भोपाल की ओर कूच करने वाले थे, लेकिन पुलिस की मुस्तैदी ने उन्हें उनके गृह जिलों में ही रोक दिया है।

पुलिस की कार्रवाई: घर बने जेल

ताजा जानकारी के मुताबिक, मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ अंचल सहित कई जिलों में पुलिस ने ‘हाउस अरेस्ट’ (नजरबंद) का सहारा लिया है।

देवास, रतलाम, सीहोर, नीमच और मंदसौर जैसे संवेदनशील जिलों में किसान नेताओं के घरों के बाहर पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी जा रही है।

संगठन के युवा अध्यक्ष त्रिलोक सिंह गोठी का कहना है कि प्रशासन ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के अधिकार को छीनने की कोशिश की है।

भोपाल के पास फंदा टोल नाके पर किसानों के इकट्ठा होने की योजना थी, लेकिन पुलिस ने वहां पहुंचने वाले हर रास्ते पर बैरिकेडिंग कर दी है।

किसानों की 15 मांगें: आखिर विवाद क्यों है?

किसान मजदूर महासंघ ने मुख्यमंत्री के नाम एक विस्तृत ज्ञापन तैयार किया है।

इन मांगों में खेती की लागत से लेकर सरकारी नीतियों तक के मुद्दों को शामिल किया गया है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि किसानों की प्रमुख शिकायतें क्या हैं:

1. गेहूं खरीदी और भावांतर का पेंच:

किसानों का सबसे बड़ा मुद्दा गेहूं की सरकारी खरीदी है। इस साल उपार्जन में आ रही तकनीकी और प्रशासनिक दिक्कतों से किसान परेशान हैं।

महासंघ की मांग है कि जिन किसानों को देरी के कारण मजबूरी में कम दाम पर मंडियों में अपनी फसल बेचनी पड़ी, सरकार उन्हें ‘भावांतर राशि’ (बाजार मूल्य और MSP के बीच का अंतर) देकर नुकसान की भरपाई करे।

2. कर्ज माफी और लोन की सुविधा:

किसानों का कहना है कि खराब मौसम और सही दाम न मिलने के कारण वे कर्ज के जाल में फंस गए हैं।

उन्होंने मांग की है कि प्रदेश के सभी किसानों का कर्ज पूरी तरह माफ किया जाए।

साथ ही, जो किसान ‘डिफाल्टर’ हो चुके हैं, उन्हें फिर से खाद-बीज के लिए लोन दिया जाए।

3. पराली और बिजली विभाग की मनमानी:

प्रशासन द्वारा पराली (नलवाई) जलाने पर किसानों पर केस दर्ज किए जा रहे हैं।

किसानों की मांग है कि ये मुकदमे वापस लिए जाएं क्योंकि सैटेलाइट रिपोर्ट हमेशा सही नहीं होती।

इसके अलावा, बिजली विभाग द्वारा की जा रही मनमानी वसूली और बिजली कटौती पर भी लगाम लगाने की मांग की गई है।

4. मुआवजे की मांग और भूमि अधिग्रहण:

प्राकृतिक आपदा या आग लगने से हुए फसल नुकसान का 100% मुआवजा देने की मांग प्रमुखता से उठाई गई है।

साथ ही, रेलवे लाइन या हाईटेंशन तारों के लिए अधिग्रहित की जाने वाली जमीन का मुआवजा बाजार भाव से 10 गुना देने की बात कही गई है।

5. दूध के दाम और अन्य फसलें:

दूध उत्पादकों के लिए 12 रुपये प्रति किलो फैट का रेट और सरकार द्वारा घोषित 5 रुपये प्रति लीटर बोनस की मांग की गई है।

इसके अलावा गर्मी की मूंग फसल को MSP पर खरीदने और खाद की मात्रा फसल के अनुसार बढ़ाने की मांग भी ज्ञापन में शामिल है।

आंदोलन का असर और वर्तमान स्थिति

फिलहाल, भोपाल, सीहोर, सिवनी, हरदा, बालाघाट, उज्जैन और शाजापुर जैसे जिलों में पुलिस पूरी तरह अलर्ट पर है।

कई किसान कार्यकर्ता जो गुप्त रास्तों से भोपाल की ओर बढ़ रहे थे, उन्हें रास्ते में हिरासत में लिया जा रहा है।

किसान नेताओं का कहना है कि पुलिस के दम पर आंदोलन को कुचला जा रहा है, लेकिन वे अपनी मांगों को लेकर पीछे नहीं हटेंगे।

प्रशासन का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था।

हालांकि, इस कार्रवाई ने विपक्षी दलों को भी सरकार पर निशाना साधने का मौका दे दिया है।

अब देखना यह होगा कि क्या सरकार किसानों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर इस गतिरोध को खत्म करती है या फिर यह आंदोलन आने वाले दिनों में और उग्र रूप धारण करेगा।

किसान किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। मध्य प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में जब अन्नदाता सड़कों पर होता है, तो उसका व्यापक असर पड़ता है।

15 सूत्रीय मांगों का यह समाधान केवल बातचीत के जरिए ही संभव है।

प्रशासन की ‘हाउस अरेस्ट’ वाली कार्रवाई ने भले ही फिलहाल के लिए भोपाल कूच को रोक दिया हो, लेकिन किसानों के मन में पनप रहा असंतोष सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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