MP Missing Childrens: मध्यप्रदेश के दो बड़े शहरों—ग्वालियर और भोपाल से सामने आ रहे आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और हर माता-पिता को चिंता में डालने वाले हैं।
आजकल के बच्चे छोटी-छोटी बातों पर नाराज होकर या माता-पिता की डांट से डरकर घर छोड़ रहे हैं।
इस पूरी समस्या के केंद्र में ‘मोबाइल फोन’ और ‘सोशल मीडिया’ सबसे बड़ी वजह बनकर उभरे हैं।
खेल-खेल में या गुस्से में उठाए गए बच्चों के ये कदम परिवारों को गहरे सदमे में डाल रहे हैं।

ग्वालियर में हर महीने 33 बच्चे छोड़ रहे घर
ग्वालियर में बच्चों के अचानक गायब होने या घर छोड़ने की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं।
पुलिस के पिछले डेढ़ साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो औसतन हर महीने 33 नाबालिग बच्चे घर से भाग रहे हैं।
साल 2026 में अब तक 190 बच्चे लापता हो चुके हैं, जिनमें 140 लड़कियां और 50 लड़के शामिल हैं।
हालांकि, पुलिस की मुस्तैदी के कारण इनमें से 175 बच्चों को सुरक्षित बरामद कर लिया गया है, लेकिन बाकी बच्चों की तलाश अब भी जारी है।

लड़कों की तुलना में लड़कियों के लापता होने की संख्या कहीं ज्यादा है।
जांच में सामने आया है कि इसकी सबसे बड़ी वजह सोशल मीडिया (जैसे इंस्टाग्राम, फेसबुक) पर होने वाली अनजान ऑनलाइन दोस्ती है।
छोटी सी बात और बड़ा कदम: ग्वालियर के 4 चौंकाने वाले मामले
1. मां ने फोन छीना, तो मुरैना पहुंच गया 12 साल का बच्चा: गोला का मंदिर इलाके में एक 12 साल का छात्र लगातार मोबाइल पर गेम खेल रहा था।
मां ने डांटकर फोन अपने पास रख लिया। बस इसी बात से नाराज होकर बच्चा घर से निकल गया।
पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद उसे मुरैना के पास एक हाईवे ढाबे से सुरक्षित ढूंढा।

2. दोस्त से झगड़े के बाद मां की डांट का डर: मुड़िया पहाड़ के एक 10 वर्षीय बच्चे का अपने दोस्त से झगड़ा हो गया था।
जब मां को इसकी शिकायत मिली, तो उन्होंने बच्चे को डांट दिया।
बच्चा गुस्से में घर से भाग गया, जिसे पुलिस ने बाद में सीसीटीवी फुटेज की मदद से चेतकपुरी की झुग्गियों से बरामद किया।
3. मोबाइल टूटने के डर से भागा 6 साल का मासूम: पुरानी छावनी के रुद्रपुरा में एक बेहद हैरान करने वाला मामला आया। यहां 6 साल के बच्चे से मोबाइल टूट गया था।
मां की डांट के डर से उसने पहले फोन छिपाया और फिर खुद भी घर से भाग गया।
पुलिस ने रातभर 40 किलोमीटर के दायरे में सर्च ऑपरेशन चलाया और 8 घंटे बाद बच्चे को सही-सलामत ढूंढ निकाला।

4. पढ़ाई की डांट से सीधे अहमदाबाद: चार शहर का नाका इलाके का एक किशोर पढ़ाई न करने पर पिता की डांट से नाराज हो गया था।
वह घर छोड़कर सीधे गुजरात के अहमदाबाद पहुंच गया और वहां एक दुकान पर काम करने लगा।
पुलिस ने मोबाइल लोकेशन ट्रेस कर उसे वापस लाया।

भोपाल में हर दिन लापता हो रही हैं दो नाबालिग बेटियां
राजधानी भोपाल की स्थिति और भी ज्यादा डराने वाली है। यहां बेटियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, भोपाल में पिछले तीन सालों से लगातार हर दिन औसतन दो नाबालिग लड़कियां लापता हो रही हैं।
साल- लापता नाबालिग लड़कियों के दर्ज केस

साल 2026 के शुरुआती महीनों में ही 316 मामले दर्ज हो चुके हैं।
अगर यही रफ्तार रही, तो इस साल के अंत तक यह आंकड़ा एक बार फिर 600 के पार जा सकता है, जो पुलिस और समाज दोनों के लिए एक बड़ा अलार्म है।
सोशल मीडिया और ऑनलाइन दोस्ती का मायाजाल
भोपाल पुलिस की जांच में यह बात सामने आई है कि लापता होने वाली बच्चियों में सबसे ज्यादा संख्या 12 से 17 साल की किशोरियों की है।
हालांकि, 6 से 10 साल की बच्चियां भी इस लिस्ट में शामिल हैं।
ज्यादातर मामलों में लड़कियां अपनी मर्जी या किसी जान-पहचान वाले के झांसे में आकर घर छोड़ती हैं।

सोशल मीडिया के जरिए होने वाली दोस्ती, प्रेम प्रसंग, नौकरी का लालच या फिर बड़े शहर में बेहतर जिंदगी जीने का सपना दिखाकर इन बच्चियों को बहलाया-फुसलाया जाता है।
कुछ मामलों में मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग), जबरन मजदूरी और शोषण की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
पुलिस की भूमिका और चुनौतियां
भोपाल और ग्वालियर पुलिस का कहना है कि जब भी कोई बच्चा लापता होता है, तो तुरंत एक विशेष टीम बनाई जाती है।
सीसीटीवी फुटेज खंगालने, मोबाइल ट्रैकिंग और साइबर सेल की मदद से ज्यादातर बच्चों को सुरक्षित ढूंढ भी लिया जाता है।
लेकिन पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह आती है कि कई बार बच्चे खुद अपनी मर्जी से घर छोड़कर दूर भाग जाते हैं, जिससे उनकी शुरुआती लोकेशन ट्रेस करने में वक्त लग जाता है।

एक्सपर्ट की राय: डांटने के बजाय बच्चों से बढ़ाएं संवाद
महिला डीएसपी शिखा सोनी का कहना है कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए माता-पिता को अपना नजरिया बदलना होगा।
आजकल के बच्चे बेहद संवेदनशील हैं। ऐसे में उन्हें छोटी बातों पर चिल्लाने या डांटने के बजाय प्यार से समझाने की जरूरत है।
माता-पिता को बच्चों के साथ खुलकर बातचीत (संवाद) करनी चाहिए ताकि बच्चे अपने मन की बात बाहर वालों के बजाय अपने घर में शेयर कर सकें।

इसके अलावा, बच्चे मोबाइल पर क्या देख रहे हैं और सोशल मीडिया पर किससे बात कर रहे हैं, इस पर भी नजर रखना बेहद जरूरी है।
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