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अजब MP का गजब खेल: न कार्ड न टेंडर, फिर भी परिवहन विभाग ने डकारे जनता के 100 करोड़!

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Nisha Rai
Nisha Rai
निशा राय, पिछले 14 सालों से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन्होंने दैनिक भास्कर डिजिटल (M.P.), लाइव हिंदुस्तान डिजिटल (दिल्ली), गृहशोभा-सरिता-मनोहर कहानियां डिजिटल (दिल्ली), बंसल न्यूज (M.P.) जैसे संस्थानों में काम किया है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल) से पढ़ाई कर चुकीं निशा की एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल बीट पर अच्छी पकड़ है। इन्होंने सोशल मीडिया (ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर भी काफी काम किया है। इनके पास ब्रांड प्रमोशन और टीम मैनेजमेंट का काफी अच्छा अनुभव है।

MP RTO Card Fee Scam: मध्यप्रदेश को ‘अजब-गजब’ ऐसे ही नहीं कहा जाता।

यहां का सिस्टम कई बार ऐसी मिसालें पेश करता है कि माथा चकरा जाए।

ताजा मामला मध्यप्रदेश परिवहन विभाग (MP Transport Department) का है।

जरा सोचिए, आप एक रेस्टोरेंट में जाते हैं, शाही पनीर का पैसा देते हैं, लेकिन वेटर आपसे कहता है कि “सब्जी तो खत्म हो गई है, आप उसकी फोटो देख लीजिए और मन बहला लीजिए।”

यही हाल मध्य प्रदेश के आरटीओ (RTO) दफ्तरों का है।

यहां लोग ड्राइविंग लाइसेंस और गाड़ी के रजिस्ट्रेशन (RC) के लिए पूरे पैसे दे रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें वह ‘स्मार्ट कार्ड’ नहीं मिल रहा जिसके लिए उनसे 200 रुपए अलग से वसूले जा रहे हैं।

विभाग उन्हें व्हाट्सएप या ईमेल पर एक ‘पीडीएफ’ फाइल थमा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, परिवहन विभाग में ड्राइविंग लाइसेंस और रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) को प्लास्टिक कार्ड यानी स्मार्ट कार्ड पर प्रिंट करके देने का नियम है।

इसके लिए हर आवेदक से 200 रुपए की ‘स्मार्ट कार्ड फीस’ ली जाती है।

चौंकाने वाली बात यह है कि कार्ड प्रिंट करने वाली कंपनी का टेंडर करीब दो साल पहले ही खत्म हो चुका है।

नियम के मुताबिक, जब टेंडर खत्म हुआ तो या तो नई कंपनी को काम मिलना चाहिए था, या फिर कार्ड की फीस लेना बंद कर देना चाहिए था।

लेकिन एमपी परिवहन विभाग ने बीच का रास्ता निकाला—’वसूली जारी रखो, सुविधा भूल जाओ’।

पिछले दो सालों से बिना किसी टेंडर और बिना कार्ड सप्लाई के करोड़ों रुपए जनता की जेब से निकालकर सरकारी खजाने (या विभाग के पास) जमा हो रहे हैं।

आंकड़ों का मायाजाल: 100 करोड़ की वसूली!

अगर हम इस पूरे खेल के गणित को समझें, तो यह किसी बड़े घोटाले से कम नजर नहीं आता।

मध्यप्रदेश में 55 जिले हैं।

छोटे जिलों का गणित:

एक औसत छोटे जिले में रोज लगभग 300 आवेदन आते हैं।

200 रुपए प्रति कार्ड के हिसाब से एक जिले से रोज 60 हजार रुपए वसूले जाते हैं।

महीने भर में यह आंकड़ा 15 से 18 लाख रुपए तक पहुंच जाता है।

बड़े शहरों का हाल:

इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर जैसे महानगरों में रोजाना 2000 से ज्यादा लोग आरटीओ पहुंचते हैं।

सिर्फ इन चार शहरों से ही करोड़ों की कमाई हो रही है।

कुल योग: अगर पूरे प्रदेश का औसत निकाला जाए, तो साल भर में यह वसूली 100 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर जाती है।

यानी दो साल में विभाग ने बिना कोई सेवा दिए लगभग 200 करोड़ रुपए डकार लिए हैं।

मंत्री जी का अजीबोगरीब तर्क

जब इस मामले ने तूल पकड़ा, तो प्रदेश के परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह से सवाल पूछे गए।

उनका जवाब और भी हैरान करने वाला था।

मंत्री जी ने पहले तो लाचारी जताई कि जब टेंडर ही नहीं हुआ है, तो कार्ड कहां से देंगे?

लेकिन जब उनसे वसूली पर सवाल हुआ, तो उन्होंने कहा कि “पैसा इकट्ठा किया जा रहा है, जब टेंडर होगा तो सबको कार्ड दे दिए जाएंगे।”

अब सवाल यह है कि क्या जनता बैंक है जो सरकार को ‘एडवांस’ में पैसा जमा कराए?

क्या गारंटी है कि दो साल पहले जिसने पैसा दिया था, उसे टेंडर होने के बाद कार्ड ढूंढकर घर पहुंचाया जाएगा?

जमीन पर लोग परेशान

1. रवि वर्मा (ग्वालियर): रवि ने नई कार ली, उत्साह में आरटीओ की सारी फीस भरी। उन्हें उम्मीद थी कि चमकदार स्मार्ट कार्ड मिलेगा, जिसे वे अपने वॉलेट में रखेंगे। लेकिन उन्हें मिला सिर्फ एक मैसेज और पीडीएफ। अब पुलिस चेकिंग के दौरान उन्हें मोबाइल दिखाना पड़ता है, जो कई बार सुरक्षित नहीं होता।

2. राजेंद्र (विदिशा): राजेंद्र कहते हैं, “अगर कार्ड नहीं देना था तो 200 रुपए क्यों लिए? क्या सरकार को पता नहीं था कि टेंडर खत्म हो गया है? यह तो सीधे-सीधे धोखेबाजी है।”

3. सोनल (ग्वालियर): सोनल का लाइसेंस रिन्यू होना था। उन्होंने फीस भरी, पर महीनों बीत जाने के बाद भी कार्ड घर नहीं पहुंचा। जब आरटीओ चक्कर लगाए तो पता चला कि कार्ड तो छप ही नहीं रहे हैं।

क्यों जरूरी है प्लास्टिक कार्ड?

कई लोग कह सकते हैं कि ‘डिजिटल इंडिया’ का जमाना है, पीडीएफ से काम चला लीजिए।

लेकिन हकीकत अलग है:

ड्यूरेबिलिटी: मोबाइल की बैटरी खत्म हो सकती है, फोन चोरी हो सकता है या पीडीएफ डिलीट हो सकती है। प्लास्टिक कार्ड हमेशा जेब में रहता है।

पुलिस चेकिंग: कई बार ट्रैफिक पुलिस डिजिटल कॉपी को मानने से इनकार कर देती है या ओरिजिनल कार्ड की मांग करती है, जिससे विवाद बढ़ता है।

किराये की गाड़ियां और वेरिफिकेशन: दूसरे राज्यों में यात्रा करते समय या गाड़ी किराए पर लेते समय अक्सर फिजिकल कार्ड की मांग की जाती है।

जवाबदेही किसकी?

परिवहन विभाग का नाम पहले भी ‘सौरभ शर्मा कांड’ जैसे मामलों से उछल चुका है।

ऐसे में यह नई लापरवाही विभाग की छवि को और धूमिल कर रही है।

क्या यह सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती है या जानबूझकर किया गया वित्तीय हेरफेर?

जब सरकार एक दिन भी टैक्स या जुर्माना वसूलने में देरी नहीं करती, तो फिर जनता को सुविधा देने में दो साल की देरी क्यों?

बिना टेंडर के वसूली करना क्या कानूनन सही है?

ये वो सवाल हैं जिनका जवाब एमपी का हर वो नागरिक मांग रहा है जिसकी जेब से 200 रुपए ‘स्मार्ट कार्ड’ के नाम पर लिए गए हैं।

सरकार को चाहिए कि या तो तुरंत टेंडर प्रक्रिया पूरी कर बैकलॉग (पुराने पेंडिंग कार्ड) को खत्म करे, या फिर जब तक कार्ड उपलब्ध न हों, तब तक इस 200 रुपए की वसूली पर तत्काल रोक लगाए।

जनता का भरोसा सिस्टम पर तभी बना रहता है जब उसे उसके दिए गए पैसे के बदले वाजिब सुविधा मिले, न कि सिर्फ ‘भविष्य के वादे’ और ‘पीडीएफ’।

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