Dhar Bhojshala Verdict: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली ‘भोजशाला’ को लेकर पिछले कई दशकों से चला आ रहा कानूनी विवाद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए धार भोजशाला को ‘वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर’ घोषित कर दिया है।
कोर्ट ने न केवल हिंदू पक्ष की दलीलों को स्वीकार किया, बल्कि एएसआई (ASI) के उन पुराने आदेशों को भी रद्द कर दिया है जो वहां नमाज की अनुमति देते थे।

क्या है कोर्ट का मुख्य आदेश?
शुक्रवार को जस्टिस की बेंच ने अपना फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि ऐतिहासिक साक्ष्यों और एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे के आधार पर यह सिद्ध होता है कि यह स्थान मूल रूप से एक मंदिर है।
कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
मंदिर घोषित:
भोजशाला अब कानूनी तौर पर वाग्देवी मंदिर माना जाएगा।
नमाज पर रोक:
मुस्लिम पक्ष द्वारा वहां नमाज पढ़ने की अनुमति वाले पुराने आदेश को कोर्ट ने खारिज कर दिया है।
मस्जिद के लिए अलग जमीन:
कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि मुस्लिम पक्ष और जैन समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें धार जिले में ही किसी अन्य स्थान पर मस्जिद और उनके धार्मिक कार्यों के लिए जमीन आवंटित की जाए।
एएसआई का नियंत्रण:
इस पूरी संपत्ति का प्रबंधन और मॉनिटरिंग ‘प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958’ के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पास ही रहेगा।

वाग्देवी की वापसी:
कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को वापस भारत लाने और उसे भोजशाला में विधि-विधान से स्थापित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।
अयोध्या केस बना फैसले का आधार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या के राम जन्मभूमि मामले में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का हवाला दिया।
कोर्ट ने माना कि जिस तरह वहां पुरातात्विक साक्ष्यों को प्राथमिकता दी गई थी, उसी तरह भोजशाला के मामले में भी एएसआई की सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेज यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह एक मंदिर है।
कोर्ट ने केवल 3 मिनट में अपना फैसला सुनाकर यह साफ कर दिया कि आस्था और इतिहास के मेल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

98 दिनों का वो वैज्ञानिक सर्वे, जिसने बदल दी दिशा
इस केस में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब साल 2024 में एएसआई ने लगातार 98 दिनों तक भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे किया।
इस सर्वे के दौरान टीम ने आधुनिक तकनीकों जैसे जीपीआर (GPR) और कार्बन डेटिंग का सहारा लिया।
- सर्वे में वहां से हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां, शिलालेख और स्तंभ मिले जिन पर संस्कृत में श्लोक अंकित थे।
- भोजशाला की बनावट राजा भोज के काल के मंदिर निर्माण की शैलियों (समरांगण सूत्रधार) से पूरी तरह मेल खाती मिली।
इन्हीं साक्ष्यों ने कोर्ट में हिंदू पक्ष की स्थिति को बेहद मजबूत कर दिया।

दोनों पक्षों के तर्क: कोर्ट में क्या हुई बहस?
हिंदू पक्ष की दलीलें:
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से याचिका दायर करने वाली रंजना अग्निहोत्री और उनके वकीलों ने तर्क दिया कि ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ (धार्मिक स्थल अधिनियम 1991) इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि भोजशाला एक एएसआई संरक्षित स्मारक है।
उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि राजा भोज ने इसे संस्कृत पाठशाला और मां सरस्वती के मंदिर के रूप में बनवाया था।

मुस्लिम पक्ष की दलीलें:
मुस्लिम पक्ष (कमाल मौला मस्जिद समिति) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने दलील दी कि यह स्थान लंबे समय से मस्जिद के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
उन्होंने एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर सवाल उठाए और कहा कि सर्वे के दौरान ली गई तस्वीरें और वीडियो स्पष्ट नहीं हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या की तरह यहां कोई स्थापित मूर्ति नहीं थी, इसलिए इसे मंदिर नहीं कहा जाना चाहिए।
जैन समाज का दावा:
दिलचस्प बात यह है कि इस विवाद में जैन समाज ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
उनका दावा था कि जो प्रतिमा वाग्देवी की बताई जा रही है, वह वास्तव में उनकी आराध्य ‘मां अंबिका’ की है।
हालांकि, कोर्ट ने सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए उन्हें भी अलग जमीन देने की बात कही है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम: छावनी में तब्दील हुआ धार
फैसले की संवेदनशीलता को देखते हुए धार जिले में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं।
* करीब 1200 अतिरिक्त पुलिसकर्मियों को जिले में तैनात किया गया है।
* रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की कंपनियों ने मोर्चा संभाल लिया है।
* पूरे शहर को 12 लेयर के सुरक्षा घेरे में रखा गया है।
* सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट रोकने के लिए साइबर सेल लगातार मॉनिटरिंग कर रही है।

आगे की राह
हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय कानून के इतिहास में एक और बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।
जहां हिंदू पक्ष इस फैसले को ‘सत्य की जीत’ बता रहा है, वहीं मुस्लिम पक्ष के पास अभी सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प मौजूद है।
फिलहाल, धार में शांति है और लोग इस फैसले को एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं।
1958 के कानून के तहत अब एएसआई को यह तय करना होगा कि मंदिर का नियमित संचालन और पूजा-अर्चना की व्यवस्था कैसी होगी।
#DharBhojshala #HighCourtVerdict #VagdeviTemple #MPNews #ASI #HistoricalDecision #BhojshalaVerdict #JusticeDelivered
