Indore BRTS Removed: इंदौर के यातायात इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है।
जबलपुर हाईकोर्ट ने मंगलवार को इंदौर BRTS (Bus Rapid Transit System) को हटाने का आदेश दिया है।
यह वही BRTS है, जिसे साल 2013 में 300 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया था।
लेकिन, अब यही प्रोजेक्ट विवादों और असुविधाओं का दूसरा नाम बन गया है।
भले ही BRTS का हटना इंदौर के ट्रैफिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम जरूर है।
वहीं यह फैसला उन हजारों यात्रियों के लिए झटका है, जो रोजाना इसके जरिए सफर करते थे।
मुख्यमंत्री की घोषणा पर लगी मुहर
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तीन महीने पहले इंदौर दौरे के दौरान जनता से वादा किया था कि BRTS को हटाया जाएगा।
उन्होंने कहा था कि जिस तरह भोपाल में BRTS हटने के बाद ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार हुआ, उसी तरह इंदौर में भी यह बदलाव जरूरी है।
मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद मामला हाईकोर्ट में भी उठा, जहां सरकार ने अपना पक्ष रखा।
अब कोर्ट ने भी सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए इसे हटाने की अनुमति दे दी है।
वहीं हाईकोर्ट के आदेश के बाद इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने भी ऐलान कर दिया है।
महापौर ने कहा कि BRTS हटाने का काम जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा।
इस कॉरिडोर को हटाने के बाद ट्रैफिक में राहत मिलेगी और सड़क चौड़ी होने से लोगों को सुगम आवागमन मिलेगा।
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इस वजह से विवादों में आया इंदौर का BRTS
इंदौर का BRTS कॉरिडोर निरंजनपुर से लेकर राजीव गांधी चौराहे तक 11.5 किलोमीटर लंबा है।
इस कॉरिडोर पर 20 बस स्टॉप और 12 मुख्य स्टेशन बनाए गए थे।
शहर के सबसे व्यस्त हिस्से से गुजरने वाला यह रूट शुरुआत में स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की मिसाल माना गया था।
लेकिन, धीरे-धीरे यह शहर के ट्रैफिक के लिए सिरदर्द बनता चला गया।
इस कॉरिडोर की वजह से सड़कें संकरी हो गईं और कई अहम चौराहों पर जाम लगने लगा।
BRTS के कारण एलआईजी चौराहे से व्हाइट चर्च तक सड़क इतनी संकरी रह गई कि वहां से भारी वाहनों का निकलना मुश्किल हो गया।
यही नहीं कई जगह फ्लाईओवर और ब्रिज बनाने में भी यह कॉरिडोर रोड़ा बन गया।
इसलिए इंदौर में BRTS हटाने से ट्रैफिक व्यवस्था में बदलाव लाएगा।
इसे शहर की पब्लिक ट्रांसपोर्ट प्रणाली के लिए भी एक नए युग की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है।
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अतीत में भी उठ चुके हैं BRTS पर सवाल
बीआरटीएस की उपयोगिता और व्यवहारिकता पर सवाल कोई नए नहीं हैं।
2013 में ही इस प्रोजेक्ट पर कोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं।
बाद में हाईकोर्ट ने पांच सदस्यीय कमेटी भी बनाई थी, जिसमें IIM और IIT के विशेषज्ञों के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता भी शामिल थे।
इस कमेटी ने भी बीआरटीएस की खामियों को उजागर किया था। लेकिन, तब इसे सुधारों के साथ जारी रखने का सुझाव दिया गया था।
फिलहाल, इस वक्त BRTS पर कुल 49 बसें चल रही हैं, जिनमें 29 CNG और 20 डीजल बसें शामिल हैं।
रोजाना करीब 55 हजार से 65 हजार लोग इन बसों में सफर करते हैं।
यह स्टूडेंट्स और नौकरीपेशा लोग हैं, जिनके लिए बीआरटीएस एक किफायती और सुविधाजनक साधन था।
इसलिए इसे हटाने के बाद सरकार और नगर निगम के सामने दोहरी चुनौती होगी।
पहला शहर की ट्रैफिक व्यवस्था सुधारना और दूसरा पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ऐसा मजबूत नेटवर्क तैयार करना, जो हर वर्ग की जरूरतों को पूरा कर सके।
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आगे की रणनीति और चुनौती
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में BRTS प्रोजेक्ट पहले ही बंद किया जा चुका है।
13 साल पहले 360 करोड़ की लागत से बना यह प्रोजेक्ट भी विवादों और ट्रैफिक अव्यवस्था की भेंट चढ़ गया था।
अब इंदौर भी भोपाल की राह पर चलते हुए अपने BRTS को अलविदा कहने जा रहा है।
इसे हटने के बाद इंदौर नगर निगम और AICTSL (Atal Indore City Transport Services Limited) के सामने नई चुनौती खड़ी होगी।
रोजाना सफर करने वाले हजारों यात्रियों के लिए वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था तैयार करनी होगी।
हालांकि, डीजल बसों को इलेक्ट्रिक बसों से रिप्लेस करने की योजना पहले से तैयार है।
लेकिन, अब नए रूट्स और नई बस सेवाओं को शुरू करने की आवश्यकता होगी।